कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३४ )
जगजीवनबोध
छाडी फल फूलनकी आसा । कोइ न आवै बागके पास । ॥
तुम समर्थ पग धारे आई । हरा हुआ बाग सब ठाई ॥
राजा कहै दया अब कीजै । मोकूँ मुक्तिदान फल दीजै ॥
मेरे मस्तक धरहू हाथा । मैं रहूँ सतगुरु तुम्हारे साथ । ॥
सतगुरु वचन
तुमको कौल भुलाना भाई । किया सो कौल गया बिसराई ॥
संकट गरभ में बाचा दीन्ह । बाहरनिकसि करमबहु कीन्ह ॥
किया कौल जब गये भुलाई । तब हम आइके चरित दिखाई ॥
बहु विधि बात कही चेताई । बाहर निकसि बुद्धि पलटाई ॥
तुमको तो कछु सूझत नाही । फन्दा मोहजाल के माहीं ॥
आवै यम दश द्वार मून्दी । तबहीं बांधि करेगा कून्दी ॥
सोच बूझ देख मन माहीं । इतने में तेरा कौन सहाहीं ॥
पिसुन मिलै सब वार न पारा । नरक बास में नाखन हारा ॥
बहु विधि तुमसों शब्द पुकारा । किया कौन नर भूल गवौरा ॥
घर घर हम सब कही पुकारी । कोइ न मानै कही हमारी ॥
हे राजा जब तू मातृगर्भमें था तब तू वचनवद्ध हुआ था कि भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेगे । उस दुःखमें तो तू पुकारता था तथा हाय हाय करता था, कि मुझको इस दुःखसे निकालो । जब तू गर्भके बाहर आया तब तू अपनी प्रतिज्ञा भूल गया और शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तूने कौन कौनसे कुकर्म न किये ? सत्यगुरुकी दयाको तू एकबारगी भूल गया, भोगविलासमें फँसकर अन्धा हो गया और मायाने तेरे ज्ञानको बिलकुल ही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेगे और तेरी मुश्कें बांधकर नरक में लेजावेंगे तब तेरा कौन मित्र सहायता करेगा ? और तुझको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तू सोच तथा समझ कि, वे लोग जिन्हें तू अपना