सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 610

( ३० )

जगजीवनबोध

ज्ञान ध्यान जिव कैसे पावैं । इतने पिशुन ताहि भरमावैं ॥
देखो दिलै करि ज्ञान विचारा । किहिविधि उतरो भवजल पारा ॥
रे कुबुद्धि दुख में मत झूले । पिछला काल बोल मति भूलै ॥
इक दिन फेरि परैगा गाढा । सुशुक बांधि यम करिहैं ठाढा ॥
तुम मति जानो अमर है काया । यह दीसै सुपनेकी माया ॥
यहि चकचौंध भुलो मति कोई । संवल फूल जैसा तन होई ॥
जैसे नींद में सुपना आवै । जागि परै तब कछू न पावै ॥
यह तन ऐसे देखो भाई । झूठे झूठ मिलैं सब आई ॥
दिनाचार चटक दिखलावै । अन्तकाल ग्रासन कूँ धावै ॥
काल जंजाल सो छूटा जाई । गुरुसे प्रीति करो रे भाई ॥
सतगुरु ऐसी युक्ति लखावै । जासे जीव परम पद पावै ॥
सुनो जीव अबूझ की बाता । जनम गवाँवै करम कमाता ॥
हर्ष मोह मैं सबहि सुनाऊँ । जेते घर में सबहि दिखाऊँ ॥
एक वर्ष लगि डोल डोलावै । पशू रूपमें जनम गँवावै ॥
उखली जीभ तोतला बोलै । मातु पिता सब हर्षित डोलै ॥
आज जंजाल बोले बहकावे । त्यों त्यों हरष हिये नहिं मावे ॥
परी करै औ ऊभा धावै । बाहर भीतर दौड़ा आवै ॥
कंचन घँघुर बेगि गढ़ाई । रेशम केरी डोर पोवाई ॥
सोना रूपा बहु पहिराया । हीरा मोती भूल भुलाया ॥
बालन सँग में खेलन जावै । नाच कूद के घरही आवै ॥
मनमें आनंद करै चँचलाई । सोच फिकर कछु व्यापे नाई ॥
करै कुतूहल मनमें सोई । दिन दिन तेज सवाया होई ॥
आकुल बोलै सोच न आने । कूर कपट कर बहु सुख गाने ॥
संकटका दिन चित्त न आवै । करै अनीति जोई मन भावै ॥
चित्तमें दुर्मति रहै अति घनी । महा दुष्ट बुद्धि पापी सनी ॥
द्वादश वर्षकी भयी है देही । अनन्त उपाय करै नर केही ॥