कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन
(११६)
अमरसिंह बोध
कबीर वचन
अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥
गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥
बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥
सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥
ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥
कबीर वचन
तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥
पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥
राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥
माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥
भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥
राजा बीरसिंह वचन
राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥
सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥
एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥
बोधसागर
(११७)
ब्राह्मणी वचन
छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥
गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥
हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥
करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥
कबीर वचन
सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥
कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन-बीपाई
साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥
कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥
कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥
कबीर वचन
एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥
छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥
यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥
राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥
नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥
लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥
ब्राह्मणी वचन
अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥
जगन्नाथ वचन
जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥
अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥
१ जगन्नाथपुरीको ।
(११८)
बीरसिंह बोध
ब्राह्मणी वचन
तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥
राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥
उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥
तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥
जगन्नाथ वचन
जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥
उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥
कबीर वचन
जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥
छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥
ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥
ब्राह्मणी वचन
हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥
जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥
जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥
जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥
जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥
कबीर वचन
छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥
अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥
जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥
बोधसागर
(११९)
कबीर वचन
जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥
वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥
मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥
सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥
चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥
ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥
पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥
अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥
तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥
छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥
अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥
धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥
धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥
राजावीरसिंह वचन
सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥
धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥
कबीर वचन-चौपाई
यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥
दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥
निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥
रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥
शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥
यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥
राजा वीरसिंह वचन
राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥