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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 560

(११६)

अमरसिंह बोध

कबीर वचन

अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥
गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥
बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥
सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥
ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥

कबीर वचन

तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥
पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥
राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥
माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥
भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥

राजा बीरसिंह वचन

राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥
सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥
एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥