कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(११९)
कबीर वचन
जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥
वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥
मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥
सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥
चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥
ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥
पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥
अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥
तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥
छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥
अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥
धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥
धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥
राजावीरसिंह वचन
सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥
धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥
कबीर वचन-चौपाई
यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥
दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥
निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥
रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥
शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥
यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥
राजा वीरसिंह वचन
राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥