कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
तृतीयवार सिंधु मंथन
अनुरागसागर
( २९ )
तृतीयवार सिंधुमथन
त्रयसुत चले तब माथ निवायो । जो कछु कहेउ करव हम जायो॥
मध्योसिंधुकछु विलंवन कीन्हा । मिला वेद सो ब्रह्म लीन्हा ॥
चौदह रतन की निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥
तीनहु बन्धु हरषि हौ लीन्हा । विष्णु सुधा पाय उहर विषदीन्हा ॥
अथाका तोनों पुत्रोंको सृष्टिरचनेकी आज्ञा देना और सब
मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना
पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा॥
अण्डज उत्पत्ति कीन्हा माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥
ऊष्मजरखानि विष्णु व्यवहारा । शिव अस्थावर कीन्ह पसारा॥
चौरासी लख योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल कीन्हा ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊष्मज परवाना ॥
तीन तत्त्व अण्डज-निरमाई । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥
पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सँवारा ॥
ब्रह्माका वेद पढ़कर निराकारका पता पाना
ब्रह्मा वेद पढ़न तब लागा । पढ़त वेद तब भा अनुरागा ॥
कहे वेद पुरुष इक आही । हैं निरंकार रूप नहिं ताही ॥
शून्य माहिँ वहि जांत दिखावे । चितवन देह दृष्टि नहिं आवे ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहिमत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥
चतुरानन कहैं विष्णु बुझावा । आदिपुरुष मोहिं वेद लखावा ॥
पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥
ब्रह्मावचन विष्णुप्रति
अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥
कबीरवचन अथाप्रति
तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करि प्रणाम तब टेके पावा ॥
ब्रह्मावचन अथाप्रति
हे माता मोहि वेद लखावा । सिरजनहार और बतलावा ॥
( ३० )
अनुरागसागर
छन्द
ब्रह्मा कहे जननी सुनौ, कहहु कन्त तुम्हार है ॥
कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कहे जननी सुनहु ब्रह्मा, कोउ नहिं जनक तुम्हार हो ॥
हमहिते भई सब उत्पति, हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥
ब्रह्मावचन अद्याप्रति
सोरठा-ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥
कहत वेद निस्वार, पुरुष एक सौगुप्त है ॥ २२ ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कहे अद्या सुनु ब्रह्मकुमारा । मोसे नहिं कोउ क्षण न्यारा ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥
ब्रह्मावचन अद्याप्रति
मानो वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथमगुप्त तुम कसरखलीन्हा ॥
जबै वेद मोहि कहै बुझाई । अलखनिरंजन पुरुष बताई ॥
अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम कहेन किया विचारा ॥
जो तुम वेद आप कथि राखा । तोकसतुम अलखनिरंजन भाखा
आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥
अब मोसन तुम छल जनिकरहु । सांचे सांच सब कहि उच्चरहु ॥
जब ब्रह्मा यहि विधि हठाना । तब अध्यामन कीन्हतिवाना ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
केहि विधि याहि कहैं समझाई । विधि नहिं मानत मोर बड़ाई ॥
जो यदि कहाँ निरंजन वाता । केहि विधि समझे यह विख्याता ॥
प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दर्श काहु नहि पाई ॥
जबै जो यहीं अलख लखावों । केहि विधि कहिता को दिखलावों ॥
अनुरागसागर
( ३१ )
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
असविचार पुत्रब्रह्मै समझावा । अलखनिरञ्जनहिंदरसदिखावा ॥
ब्रह्मावचन अद्याप्रति
ब्रह्मा कहे मोहि ठौर बतावो । आगा पीछा जनितुमलावो ॥
मैं नहिं मानौं तुम्हारी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥
प्रथम तुम मुहि दीनभुलावा । अब तुम कहो न दरसदिखावा ॥
तासु दरश न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥
छन्द
दरशदिखायतत्कालदीजै, मोहिनभरोसतुम्हारहो ॥
संशयनिवारयहिकालदीजै, कीजेनविलंबलगारहो ॥
अद्यावचन ब्रह्माप्रति
कह जननी सुनो ब्रह्मा, कहौं तोसों सत्तही ॥
सातस्वर्ग है माथ ताको, चरण पतालसमही ॥२२॥
सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तेहि दरशकी
जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चले शिरनाइके ॥२३॥
जननी गुन्योवचन चितमाहीं । मोरि कहौ यह मानति नाही ॥
यह कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरश ते नहिं पावै भेशा ॥
कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलखनिरञ्जन पिता तुम्हारा ॥
तासु दरश नहिं पैहै पूता । यह मैं वचन कहौं निजगूता ॥
ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा । परसन सीस ध्यानहियलावा ॥
ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवै तेही ठाई ॥
तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगारी । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥
आज्ञा मांगि विष्णु चलेबाला । पिता दरशको चले पताला ॥
इत उत चितयमहेशन डोला । सेवा करत कष्ट नहीं बोला ॥