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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 159

अनुरागसागर

( ३१ )

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

असविचार पुत्रब्रह्मै समझावा । अलखनिरञ्जनहिंदरसदिखावा ॥

ब्रह्मावचन अद्याप्रति

ब्रह्मा कहे मोहि ठौर बतावो । आगा पीछा जनितुमलावो ॥
मैं नहिं मानौं तुम्हारी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥
प्रथम तुम मुहि दीनभुलावा । अब तुम कहो न दरसदिखावा ॥
तासु दरश न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥

छन्द

दरशदिखायतत्कालदीजै, मोहिनभरोसतुम्हारहो ॥
संशयनिवारयहिकालदीजै, कीजेनविलंबलगारहो ॥

अद्यावचन ब्रह्माप्रति

कह जननी सुनो ब्रह्मा, कहौं तोसों सत्तही ॥
सातस्वर्ग है माथ ताको, चरण पतालसमही ॥२२॥
सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तेहि दरशकी
जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चले शिरनाइके ॥२३॥

जननी गुन्योवचन चितमाहीं । मोरि कहौ यह मानति नाही ॥
यह कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरश ते नहिं पावै भेशा ॥
कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलखनिरञ्जन पिता तुम्हारा ॥
तासु दरश नहिं पैहै पूता । यह मैं वचन कहौं निजगूता ॥
ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा । परसन सीस ध्यानहियलावा ॥
ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवै तेही ठाई ॥
तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगारी । उत्तर दिशा बेगि चलि जाई ॥
आज्ञा मांगि विष्णु चलेबाला । पिता दरशको चले पताला ॥
इत उत चितयमहेशन डोला । सेवा करत कष्ट नहीं बोला ॥