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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 157

अनुरागसागर

( २९ )

तृतीयवार सिंधुमथन

त्रयसुत चले तब माथ निवायो । जो कछु कहेउ करव हम जायो॥
मध्योसिंधुकछु विलंवन कीन्हा । मिला वेद सो ब्रह्म लीन्हा ॥
चौदह रतन की निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥
तीनहु बन्धु हरषि हौ लीन्हा । विष्णु सुधा पाय उहर विषदीन्हा ॥

अथाका तोनों पुत्रोंको सृष्टिरचनेकी आज्ञा देना और सब

मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना

पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा॥
अण्डज उत्पत्ति कीन्हा माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥
ऊष्मजरखानि विष्णु व्यवहारा । शिव अस्थावर कीन्ह पसारा॥
चौरासी लख योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल कीन्हा ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊष्मज परवाना ॥
तीन तत्त्व अण्डज-निरमाई । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥
पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सँवारा ॥

ब्रह्माका वेद पढ़कर निराकारका पता पाना

ब्रह्मा वेद पढ़न तब लागा । पढ़त वेद तब भा अनुरागा ॥
कहे वेद पुरुष इक आही । हैं निरंकार रूप नहिं ताही ॥
शून्य माहिँ वहि जांत दिखावे । चितवन देह दृष्टि नहिं आवे ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहिमत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥
चतुरानन कहैं विष्णु बुझावा । आदिपुरुष मोहिं वेद लखावा ॥
पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥

ब्रह्मावचन विष्णुप्रति

अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥
कबीरवचन अथाप्रति

तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करि प्रणाम तब टेके पावा ॥

ब्रह्मावचन अथाप्रति

हे माता मोहि वेद लखावा । सिरजनहार और बतलावा ॥