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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ब्रह्माका विमान भेजकर विष्णु और महादेवको बुलाना

बोधसागर

( ७७ )

साखी-कहे गरुड समझाइके, सुनहु ब्रह्म यह बात ।
अविगत पुरुष सु और है, जाके माय न तात ॥

ब्रह्मा-वचन चौपाई

सुनि ब्रह्मा तब पूछे बानी । कैसे अविगतिकी गति जानी ॥
कौनी युक्ति साच कै मानी । साहिबकी गति कैसे जानी ॥

गरुड वचन

गरुड कहै तुम आपही ज्ञाना । जहाँ गर्व तहाँ पुरुष छिपाना ॥
गर्व गुमान में जो है पूरा । रहै सदा सो धूर अधूरा ॥
साखी-मानुषदेह अपराधि है, देह धरे अभिमान ।
ताते सबै विगुचै, भक्ति मर्म नहिं जान ॥

चौपाई

भक्ति जो आदि अंतसे आयी । जाते सकल माँड निर्मायी ॥
ताकर मर्म जो जाने नायी । ताते काल फांस निरमायी ॥

साखी-लोक वेद जानै नहीं, करै भक्ति अभिमान ।
ताते सबै विगुरचे, भक्ति करन का जान ॥
ध्वजा जो फरके शून्यमें, बाजे अनहद तूर ।
तकिया है मैदान में, पहुंचेगा कोइ शूर ॥

ब्रह्मा वचन-चौपाई

ब्रह्मा कहै गरुड सुनु भाई । अपने मुख तुम करहु बडाई ॥
इतना ब्रह्मा किया विचारा । देव विमान तुरत भये ठाढ़ा ॥
कहे ब्रह्मा तुम जाहु विमाना । लाओ विष्णु बुलाइ सयाना ॥
चला विमान विष्णु पै गयऊ । तबहि विष्णु अस पूछनलयऊ ॥
कहो विमान कहाँ पगु धारे । सत्य सत्य कहो वचन सम्हारे ॥

विमान वचन

गरुड भक्त यक आया देवा । सो नहिं माने तुम्हरी सेवा ॥

( ७८ )

गरुडबोध

सुनते विष्णु विमान चढ़ाये । चढ़ि विमान ब्रह्म लोकहि आये॥
विष्णुपुरीसे विष्णु जब आये । बैठे जाय ब्रह्माके ठाये ॥

विष्णु वचन

केहि काज पर मोहि बुलायी । सो मोहि भेद कहो समझायी ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा वचन कहै अर्थावै । कहै गरुड हम केहि चेतावै ॥
हमको मनुष्य देह करि जाने । आदि पुरुष औरै को माने ॥
भले विष्णु तुम आये भाई । अब शिवको तुम लेहु बुलाई ॥
गढ कैलास शिवका अस्थाना । तहाँको अब तुम जाहु विमाना ॥
सब देवनको आनु बुलायी । सुनहीं चर्चा गरुड की आयी ॥
महा विमान तुरत चलि गयऊ । गढ कैलास पर ठाढे भयऊ ॥
शिवशंकर को माथ नवायी । पाछे ब्रह्माका वचन सुनायी ॥
ब्रह्मा गरुड जहाँ झगर पसारा । तेहि कारण तुम सबके हँकारा ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे एक ठाई । कीन्ही चर्चा मंड मँडाई ॥
गरुड सबहि का करै उच्छेदा । सो मैं तुमहि बतायो भेदा ॥
बाजे डमरू हने निशाना । चले रुद्र तब साजि विमाना ॥
तुरत चले नहीं लाये बारी । चले रुद्र आये पगुथारी ॥
ब्रह्माको जहाँ भयउ उच्छेदा । बैठे जहाँ करे बहु भेदा ॥
इन्द्र लोक सो इन्द्र बुलाये । जेहि सँग देव सबै चलि आये ॥
सो सब चलि ब्रह्मा पहुँ आये । वासुकि देव जो आप रहाये ॥
आवत उनके नाग बहु आये । बहुते नागिन आयी बहुभाये ॥
सुर नर मुनि सब आनिबुलायी । जो जस आसन तस बैठई ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे यक ठावा । गरुड तहाँ पुनि ज्ञान सुनावा ॥

गरुड वचन

अविगतिकी गतिआहि निनारा । सब भूले कोइ पाउ न पारा ॥