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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

समाप्ति

बोधसागर

(६५)

पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥
नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥
पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥
चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥
साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥
श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥
सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥
नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥
सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥
रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥
सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥
निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥
इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥
सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥
पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥
सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥
छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥
यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥
सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥
तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥
दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥
दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥
सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥
कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥
इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥

इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥

नं. ४ कबीरसागर - ३

इति श्रीधर्मदासबोध
ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

श्री-अमरसिंह बोध

A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन

बम्बई

श्रीमद्भगवद्गीता

संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः

सप्तमः अध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

१९९९

सत्य कबीराय नमः

बोधसागर

द्वितीयस्तत्रंगः

अमरसिंहबोध

★

धर्मदास वचन-बीपाई

धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥
जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥
युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥
यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥

सतगुर वचन

धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥
जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥
युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥
अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥
रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥
भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥
पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥
सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥
बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥
सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥
ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥