सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बंकुच्छका वर्णन

बोधसागर

(८५)

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥
परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥
निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥
अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥

चित्रगुप्त वचन

चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥
तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥

साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥

मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥

चौपाई

अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥
नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥
देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥
उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥
कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥
सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥
राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥
डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥
भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥

अमरसिंह वचन

ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥
हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥
साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥
जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥
सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥

(८६)

अमरसिंह बोध

भगवान वचन

यहि विधि गौ एकशत भाई । दइ विप्रनको सुनो प्रभुराई ॥
यहि विधि सेवा कीन तुम्हारी । तहू कर्म तुम हम शिर डारी ॥
सुनु राजा तोहि कहिसमझाऊं । पाप करे कस धरो छिपाऊं ॥
राजालोक कर्म बहु धरहीं । जीव मारिके भक्षण करहीं ॥
तुरी चढ़े बन खेले शिकारा । नाहक मारै जीव बिचारा ॥
मारे जीव तुमहु सुनाई । इतनो पाप कहां धरो छिपाई ॥

साखी-चार खानमें भरमहु, कीनो कर्म अपार ॥

विष्णु कहै राजा सुनो, कैसे होइ उबार ॥

चौपाई

सतगुरु ऐसी जुगति बनाई । लीला करी एक तेहि ठाई ॥
नृप शिर हाथ धरचोतेहिवारी । निकसे कागमुखमांहिअपारी ॥
बहुत काग जरे उद्र मंझारा । बहुतक भये पिंडते न्यारा ॥
लखि भगवान रहे शरमाई । फेर बात ना बोले भाई ॥
ततखन हमहूँ चले रिगाई । पहुँचे मानसरोवर जाई ॥
कामिनि शोभा बहुत अपारा । राजापरचो तब चरण मँझारा ॥
दयावंत भल लोक दिखाई । जुत्थजुत्थकामिनिअधिकाई ॥
करे ध्यान पुरुषको जहयँ । चारभानुकी शोभा जहवाँ ॥
झलके अंगकामिनिके भाई । रैन दिवस तहांजानि न जाई ॥
सिंहासन एकधर्यो तेहि ठाई । चंद्रअंश तहां बैठक पाई ॥
भाव प्रीति साहेब सो कीना । भले ज्ञानी तुम दरशन दीना ॥
बैठे एक सिंहासन दोई । राजा संग इत पुनि सोई ॥
अहो अंश दया अब होई । राजाकूँ ले जाओ सोई ॥
चन्द्रअंश तब शीश नवाई । आतुर हम तब चले रिगाई ॥
ले राजा तब शरीर समाया । भूपति बेगि उठे अकुलाया ॥
तबही राजा शीश नवाई । हमको तारो बेग गुसाई ॥

बोधसागर

(८७)

सतगुरु बचन

राजा सुनो वचन अब मोरा । करो आरती तितुका तोरा ॥
धर्मदास सब तोहि सुनाई । अमरहिंको वैकुण्ठ दिखाई ॥

धर्मदास बचन

धर्मदास तब दोउ कर जोरा । दया करो तुम बंदीछोरा ॥
और कथा मोहि वरनि सुनाओ । दया करो जनि मोहि डुरावो ॥
धर्मदास मैं कहूं समुझाई । जो कह्यु भगति करी सो राई ॥
जेतक जीव मुक्ति पद पाई । सो अब तुमकूँ वरनि सुनाई ॥

अमरसिंह बचन

साखी-राजा शीश नमाइके, बिनति करै कर जोर ॥
हमको सतगुरु तारिये, हम सो अधम न ओर ॥

सतगुरु बचन -चौपाई

सुन हो राय तजो सुरखाई । युग कंकवत हम चल आई ॥
मानसिंह भूपति बड़ राजा । तासो कीना ज्ञान समाजा ॥
तीस लाख अरु सात हजार । इतने हंसलोक पग धारा ॥
युग परवान चौकरी गयऊ । इतने युग मोहि आवत भयऊ ॥
कहैं लेख पूछो राय सुजाना । अपने जीवको करो छुटाना ॥
छन्द-गुरुचरण पद्मपराग पावन मृदुल मंजुल सोहावनी ॥
तरु सम सील परकासते तिमिर मोह नशावनी ॥
करहिं आरती बिसरि जन उरमांहि जे नर लावहीं ॥
भक्ति ज्ञान वैराग्य प्रगटे मोक्षपद तब पावहीं ॥

अमरसिंह बचन

सोरठा-तव चरनन अनुराग, और न दूजी आस ॥
मैं किंकर पद लाग, करहु अनुग्रह दास पर ॥
छन्द-आदि ब्रह्म अर्चित अविगत आदि अदली गाइए ॥
अजर नाम अर्चित अमर अकह अविचल धाइए ॥

(८८)

अमरसिंह बोध

अक्षय नाम आनंदरूपी अखिल सम अस्थिर मही ॥

अधम उधारण अखिलपति अखंडसरूपी हौ सही ॥

सोरठा-हंस उवारण नाम, हंसराज हंसनपति ॥

हंस श्रवण सुखधाम, सारशब्द दातार गुरु ॥

चौपाई

मैं कृमि गुरुभुंगी होय आये । अमी पिलाइके रूप फिराये ॥

मैं हूं लोह कुधात कहाया । गुरु पारस मोहि हेमबनाया ॥

एक मुख महिमा कही न जाई । जो मुख कहूँ पदमसत पाई ॥

जिमि पंछीका जोडा होई । नर नारी जुग बंध है सोई ॥

जिमि मोहि शब्द दीन गुरुराई । तिमि रानीको करिय मुक्ताई ॥

तुम बैदिछोर सबै विधिलायक । हम हैं जीव अकाम अलायक ॥

तेहि ते अरज करौ प्रभु साई । करि दया जिव मुक्ताऊ भाई ॥

तानी बचन

सुनो अमर हम कहे तुम सो । करनी बने करो कछु तुम सो ॥

हम कहे सोइ सुन तुम राई । भक्ति करो अब सुरति लगाई ॥

तन मन धन साहेबको दीना । शिरके साटे भक्ती लीन्हा ॥

रंभा नाम पुरेथंकी नारी । गुरु सेवामें रहे हुशियारी ॥

राजा बचन

तब राजा गुरुसे विनती कीना । अपनाकर मोहि निजकर लीना ॥

अब साहेब परवाना दीजे । जो कछु कहो सोई हम कीजे ॥

कौन वस्तु आनू गुरुदेवा । सो साहेब भाषो मोहि भेवा ॥

जेहि विधि तरन होय भवसागर । शब्द सरूप कहो तुम नागर ॥

साखी-मुक्त लोक जाते मिले जहां पुरुष अस्थान ॥

जरा मरण व्यापे नहीं सदा पुरुषको ध्यान ॥

१ पुरेय शब्द राजा अमरसिंहका सम्बोधन है।