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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 529

बोधसागर

(८५)

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥
परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥
निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥
अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥

चित्रगुप्त वचन

चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥
तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥

साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥

मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥

चौपाई

अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥
नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥
देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥
उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥
कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥
सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥
राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥
डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥
भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥

अमरसिंह वचन

ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥
हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥
साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥
जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥
सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥