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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 530

(८६)

अमरसिंह बोध

भगवान वचन

यहि विधि गौ एकशत भाई । दइ विप्रनको सुनो प्रभुराई ॥
यहि विधि सेवा कीन तुम्हारी । तहू कर्म तुम हम शिर डारी ॥
सुनु राजा तोहि कहिसमझाऊं । पाप करे कस धरो छिपाऊं ॥
राजालोक कर्म बहु धरहीं । जीव मारिके भक्षण करहीं ॥
तुरी चढ़े बन खेले शिकारा । नाहक मारै जीव बिचारा ॥
मारे जीव तुमहु सुनाई । इतनो पाप कहां धरो छिपाई ॥

साखी-चार खानमें भरमहु, कीनो कर्म अपार ॥

विष्णु कहै राजा सुनो, कैसे होइ उबार ॥

चौपाई

सतगुरु ऐसी जुगति बनाई । लीला करी एक तेहि ठाई ॥
नृप शिर हाथ धरचोतेहिवारी । निकसे कागमुखमांहिअपारी ॥
बहुत काग जरे उद्र मंझारा । बहुतक भये पिंडते न्यारा ॥
लखि भगवान रहे शरमाई । फेर बात ना बोले भाई ॥
ततखन हमहूँ चले रिगाई । पहुँचे मानसरोवर जाई ॥
कामिनि शोभा बहुत अपारा । राजापरचो तब चरण मँझारा ॥
दयावंत भल लोक दिखाई । जुत्थजुत्थकामिनिअधिकाई ॥
करे ध्यान पुरुषको जहयँ । चारभानुकी शोभा जहवाँ ॥
झलके अंगकामिनिके भाई । रैन दिवस तहांजानि न जाई ॥
सिंहासन एकधर्यो तेहि ठाई । चंद्रअंश तहां बैठक पाई ॥
भाव प्रीति साहेब सो कीना । भले ज्ञानी तुम दरशन दीना ॥
बैठे एक सिंहासन दोई । राजा संग इत पुनि सोई ॥
अहो अंश दया अब होई । राजाकूँ ले जाओ सोई ॥
चन्द्रअंश तब शीश नवाई । आतुर हम तब चले रिगाई ॥
ले राजा तब शरीर समाया । भूपति बेगि उठे अकुलाया ॥
तबही राजा शीश नवाई । हमको तारो बेग गुसाई ॥