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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कालका जीवोंको दुःखित करना और सत्य पुरुषकी आज्ञासे ज्ञानीजीका पृथ्वी-पर आना

ज्ञानसागर

( १३ )

पुरुष वचन

हंस दुखित भये काल के पास। जाइ छुड़ावहु कालकी फाँसा ॥
कहा करो जो हारो बोला। बरवस करब तौ सुकृत डोला ॥
जोग जीत तुम वेग सिधारो। भव सागर ते हंस उवारो ॥

ज्ञानीवचन

चले ज्ञानी तब मस्तक नाई। पहुँचे तहैं जहैं धरम रहाई ॥
धर्मराय ज्ञानी कहैं देखा। क्रोध भयो जनु पावक रेखा ॥
यहूँवा आये किहिं व्यवहारा। लोकहि से मोहि मारि निकारा ॥
मानेव आज्ञा छाड़िब लोका। यही जान परे तुम धोखा ॥
करो संहार सहित तोहे ज्ञानी। मरम हमार तुम कछून जानी ॥

साखी--संहार करौ पल भीतर, कहौ वचन परचार ॥

पेलौ मान सरोवरै, विध्वंसौ द्वीप सब झार ॥

चौपाई

ज्ञानी कहैं सुन धर्मनि आगर। तो कह ठौर दीन्ह भवसागर ॥
तीनौ पुर दीन्हौ तोहि राऊ। पुरुष आज्ञा आयो धरि पांडु ॥
चौरासी लक्ष जीव तोहि दीन्हा। तैं जीवन बड़ सासत कीन्हा ॥
आज्ञा पुरुष करौ परवाना। जीव लोक सब करौ पयाना ॥
पुरुष वचन मेटे फल पावहु। कियो अवज्ञा लोकसे आवहु ॥
सोह करहु रहन जो पावहु। की यहवाँ तैं वेग सिधवहु ॥
कै जीवन कहैं दीजे बांटा। बोलहु वचन धर्म तुम छांटा ॥

साखी--धरम कहैं सुन ज्ञानी, आज्ञा पुरुष की सार ॥

सेवा करत रैन दिन, पल पल सहित विचार ॥

चौपाई

आज्ञा मान लीन्ह मैं तोरा। अब सुनिये कछु विनती मोरा ॥
सो ना करब जो मोर विगारा। मांगौ वचन करौ प्रतिपारा ॥
पुरुष दीन्ह मोहे राज बुलाई। तुमहीं देव जो संशय जाई ॥

( १४ )

ज्ञानसागर

लीजे हंस जो भक्त परमाना । तीनों जुग हैं मेरे थाना ॥
चौथा जुग तबही उत्पानी । तबहि सम्हार सुनौ हो ज्ञानी॥
कैसे सम्हारो मोही समझावहु । की भक्ति जो मोहि सुनावहु॥
कहैं धर्म सुन जोग संतायन । ऐसे हंस न होय मुक्तायन ॥
हरि मन्दर मैं रचौ बनाई । तहँवा हंस करत मम नाई ॥
जो कोई गम्य न करै विचारा । सात जन्म लौं चोर हमारा ॥
सुन ज्ञानी विहँसित मन कीन्हा । कैसा हरि मंदिर का चीन्हा ॥

धर्मरायवचन

जब मम कन्या भयो प्रसंगा । मनमथ उपज्यौ भयो उमंगा ॥
चलयौ रुधिर कामिन केजबही । नख रेखा भग उपजी तबही ॥
चलयौ रुधिर ताको रज भएऊ । गर्भ प्रसंग अंड तिय ठएऊ ॥
तेहि प्रसंग तिय गुण उपराजा । तबतै अधर निरञ्जन राजा ॥
सारखी-ज्ञानी कहैं धर्म सो, छल मतौ तुम्हारै ॥
जाको मैं चेतावहुं, सो तुमहीं सो न्यार ॥

चौपाई

विनती तोर करों प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वर साला ॥
चौथा जुग अंश मम आवहि । नाम प्रताप हंस मुक्तावहि ॥

धर्मरायवचन

हे स्वामी वर आयसु होई । कछु मांगों अब दीजे सोई ॥
सो न करब जो सब जिव जाई । भवसागर खाली परजाई ॥
ऐसा मत ज्ञानी तुम ठाँनहु । आज्ञा पुरुष की तुमहु मानहु ॥
पुरुष बोल हारा मोहि पाहीं । सोनकरब जो सब जिय जाहीं ॥
कह ज्ञानी सब मैं मानी । कह्यौ वचन सो करब प्रमानी ॥
सतजुग त्रेता द्वापर जाई । कलियुग कौ प्रभाव जब आई ॥
चार अंश मैं कीन्हौ थाना । खुंट गहौ तो नहीं प्रमाना ॥

ज्ञानसागर

( १५ )

धर्मरायवचन

साखी--बाँवन नरसिंह अंश मम, परसराम बलवीर ॥
रामचन्द्र आगे करौ, तब पुनि कृष्ण शरीर ॥

चोपाई

कृष्ण देह छाँडव मैं जहियाँ । कलियुगचौथायुग होय तहियाँ ॥
तब हम करिहैं बौद्ध शरीरा । जगन्नाथ सरोवर के तीरा ॥
राजा इंद्र दवन परवाँना । मंडप काम लगावैं तवाँना ॥
मंडप तास उठन नहिं पाई । सायर उमंग खसावन आई ॥
तब ज्ञानी पूछैं यह बात । तोहि ते उपजै सायर साता ॥
जगन्नाथ तैं कष्ट बनाई । सायर कवनहुं भाँति खसाई ॥
हँस्यो धर्म कहि सतौ अपाना । कहौ करतूत सुनौ परिवाना ॥
दैत्य अनेक जीव जो मारौ । अंश मोर तेहि जाय सँहारौ ॥
राम रूप जब होय हमारा । तिनसौ होइ है द्रोह अपकार ॥
दैत्य अनेक जीव को फेरा । वालि वधे औ सायर तेरा ॥
वालि बैर मैं तुरत दिवायव । व्यादि फाँसी सो कृष्ण मरायव ॥

साखी--सायर बैर ना पावई, करि है वाऊ सौ घात ॥
मंडप उठन न पाइ है, जातैं कहो अस बात ॥

चोपाई

हे ज्ञानी अस मतौ विचारहु । प्रथमहि सागर तीर सुधारहु ॥
मोहिं थापहु मैं करहुं निहोरा । तातैं भाव जूरे नहिं मोरा ॥
मण्डप उठे अटल हो राजू । पुरुष वचन कहैं तुम कहैं लाजू ॥
पहिले थापहु मो कहैं ज्ञानी । सागर तीर बैठहु अन्तर्यामी ॥
कहे जोग जीत सुनो धर्मराई । पुरुष बोल मेटा नहिं जाई ॥
सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों जुग अंश मोर जहैं जाहीं ॥
कोई कुल हंस शब्द जो पावई । तीनों जुग जीव थोरा आवई ॥
कलियुग मोर मनुष्य शरीरा । जा कहैं सुनियों नाम कबीरा ॥