कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( १५ )
धर्मरायवचन
साखी--बाँवन नरसिंह अंश मम, परसराम बलवीर ॥
रामचन्द्र आगे करौ, तब पुनि कृष्ण शरीर ॥
चोपाई
कृष्ण देह छाँडव मैं जहियाँ । कलियुगचौथायुग होय तहियाँ ॥
तब हम करिहैं बौद्ध शरीरा । जगन्नाथ सरोवर के तीरा ॥
राजा इंद्र दवन परवाँना । मंडप काम लगावैं तवाँना ॥
मंडप तास उठन नहिं पाई । सायर उमंग खसावन आई ॥
तब ज्ञानी पूछैं यह बात । तोहि ते उपजै सायर साता ॥
जगन्नाथ तैं कष्ट बनाई । सायर कवनहुं भाँति खसाई ॥
हँस्यो धर्म कहि सतौ अपाना । कहौ करतूत सुनौ परिवाना ॥
दैत्य अनेक जीव जो मारौ । अंश मोर तेहि जाय सँहारौ ॥
राम रूप जब होय हमारा । तिनसौ होइ है द्रोह अपकार ॥
दैत्य अनेक जीव को फेरा । वालि वधे औ सायर तेरा ॥
वालि बैर मैं तुरत दिवायव । व्यादि फाँसी सो कृष्ण मरायव ॥
साखी--सायर बैर ना पावई, करि है वाऊ सौ घात ॥
मंडप उठन न पाइ है, जातैं कहो अस बात ॥
चोपाई
हे ज्ञानी अस मतौ विचारहु । प्रथमहि सागर तीर सुधारहु ॥
मोहिं थापहु मैं करहुं निहोरा । तातैं भाव जूरे नहिं मोरा ॥
मण्डप उठे अटल हो राजू । पुरुष वचन कहैं तुम कहैं लाजू ॥
पहिले थापहु मो कहैं ज्ञानी । सागर तीर बैठहु अन्तर्यामी ॥
कहे जोग जीत सुनो धर्मराई । पुरुष बोल मेटा नहिं जाई ॥
सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों जुग अंश मोर जहैं जाहीं ॥
कोई कुल हंस शब्द जो पावई । तीनों जुग जीव थोरा आवई ॥
कलियुग मोर मनुष्य शरीरा । जा कहैं सुनियों नाम कबीरा ॥