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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 24

( १४ )

ज्ञानसागर

लीजे हंस जो भक्त परमाना । तीनों जुग हैं मेरे थाना ॥
चौथा जुग तबही उत्पानी । तबहि सम्हार सुनौ हो ज्ञानी॥
कैसे सम्हारो मोही समझावहु । की भक्ति जो मोहि सुनावहु॥
कहैं धर्म सुन जोग संतायन । ऐसे हंस न होय मुक्तायन ॥
हरि मन्दर मैं रचौ बनाई । तहँवा हंस करत मम नाई ॥
जो कोई गम्य न करै विचारा । सात जन्म लौं चोर हमारा ॥
सुन ज्ञानी विहँसित मन कीन्हा । कैसा हरि मंदिर का चीन्हा ॥

धर्मरायवचन

जब मम कन्या भयो प्रसंगा । मनमथ उपज्यौ भयो उमंगा ॥
चलयौ रुधिर कामिन केजबही । नख रेखा भग उपजी तबही ॥
चलयौ रुधिर ताको रज भएऊ । गर्भ प्रसंग अंड तिय ठएऊ ॥
तेहि प्रसंग तिय गुण उपराजा । तबतै अधर निरञ्जन राजा ॥
सारखी-ज्ञानी कहैं धर्म सो, छल मतौ तुम्हारै ॥
जाको मैं चेतावहुं, सो तुमहीं सो न्यार ॥

चौपाई

विनती तोर करों प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वर साला ॥
चौथा जुग अंश मम आवहि । नाम प्रताप हंस मुक्तावहि ॥

धर्मरायवचन

हे स्वामी वर आयसु होई । कछु मांगों अब दीजे सोई ॥
सो न करब जो सब जिव जाई । भवसागर खाली परजाई ॥
ऐसा मत ज्ञानी तुम ठाँनहु । आज्ञा पुरुष की तुमहु मानहु ॥
पुरुष बोल हारा मोहि पाहीं । सोनकरब जो सब जिय जाहीं ॥
कह ज्ञानी सब मैं मानी । कह्यौ वचन सो करब प्रमानी ॥
सतजुग त्रेता द्वापर जाई । कलियुग कौ प्रभाव जब आई ॥
चार अंश मैं कीन्हौ थाना । खुंट गहौ तो नहीं प्रमाना ॥