छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
२३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| २३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| पुरा पूर्वं प्रातरनुवाकस्य शस्त्रस्य प्रारम्भाज्जघनेन गार्हपत्यस्य पश्चादुदङ्मुखः संन्नुपविश्य स वासवं वसुदैवत्यं सामाभिगायति ॥ ३ ॥ | प्रातरनुवाकसे पूर्व अर्थात् प्रातःकालमें पढ़े जाने योग्य 'शस्त्र'* नामक स्तोत्रपाठसे पूर्व गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वह यजमान वासव—वसुदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ३ ॥ |
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३ ३ पश्येम त्वा वयँरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म्आ ३ ३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥४॥
[ हे अग्ने ! ] तुम इस लोकका द्वार खोल दो; जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर लें ॥ ४ ॥
| लोकद्वारमस्य पृथिवीलोकस्य प्राप्तये द्वारमपावृणु हेऽग्ने तेन द्वारेण पश्येम त्वा त्वां राज्यायेति ॥ ४ ॥ | हे अग्ने ! तुम लोकद्वार—इस पृथिवीलोककी प्राप्तिके लिये, इसका द्वार खोल दो। उस द्वारसे हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन करें ॥४॥ |
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अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥
तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—पृथिवीमें रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ पृथिवी ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥
* जिन ऋक्-मन्त्रोंका गान नहीं किया जाता उन्हें 'शस्त्र' कहते हैं और जिन शस्त्रोंका प्रातःकाल पाठ किया जाता है उनका नाम 'प्रातरनुवाक' है।
खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २३७
| अथानन्तरं जुहोत्यनेन मन्त्रेण नमोऽग्नये प्रह्वीभूतास्तुभ्यं वयं पृथिवीक्षिते पृथिवीनिवासाय लोकक्षिते पृथिवीलोकनिवासायेत्यर्थः । लोकं मे मह्यं यजमानाय विन्द लभस्व । एष वै मम यजमानस्य लोक एता गन्तास्मि ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् वह इस मन्त्रद्वारा हवन करता है—अग्निदेवको नमस्कार है। हम पृथ्वीमें रहनेवाले और पृथ्वीलोकनिवासी तुम्हारे प्रति विनम्र होते हैं। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥ |
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै । वसवः प्रातःसवनँ संप्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥
इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके अनन्तर [पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा] 'स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला—अड़ंगे) को नष्ट करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। वसुगण उसे प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥
| अत्रास्मिँल्लोके यजमानोऽहमायुषः परस्तादूर्ध्वं मृतः सन्नित्यर्थः, स्वाहेति जुहोति । अपजह्यपनय परिघं लोकद्वारार्गलमित्येतं मन्त्रमुक्त्वोत्तिष्ठति । एवमेतैर्वसुभ्यः प्रातःसवनसंबद्धो लोको निष्क्रीतः स्यात्तत्तस्ते | यहाँ—इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेपर—आयुके पीछे अर्थात् मरनेपर [पुण्यलोक प्राप्त करूँगा] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है। 'तुम परिघ यानी लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—इस मन्त्रको कहकर उत्थान करता है। इस प्रकार इन [साम, मन्त्र, होम और उत्थान] के द्वारा वसुओंसे प्रातःसवनसे सम्बद्ध लोक मोल |