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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सौवाँ सर्ग

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सौवाँ सर्ग

केकयदेशसे ब्रह्मर्षि गार्ग्यका भेंट लेकर आना और उनके संदेशके अनुसार श्रीरामकी आज्ञासे कुमारोंसहित भरतका गन्धर्वदेशपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान

कुछ कालके पश्चात् केकयदेशके राजा युधाजित्ने अपने पुरोहित अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि गार्ग्यको, जो अङ्गिराके पुत्र थे, महात्मा श्रीरघुनाथजीके पास भेजा॥

उनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको परम उत्तम प्रेमोपहारके रूपमें अर्पण करनेके लिये उन्होंने दस हजार घोड़े, बहुत-से कम्बल (कालीन और शाल आदि), नाना प्रकारके रत्न, विचित्र-विचित्र सुन्दर वस्त्र तथा मनोहर आभूषण भी दिये थे॥ २-३ ॥

परम बुद्धिमान् श्रीमान् राघवेन्द्रने जब सुना कि मामा अश्वपति-पुत्र युधाजित्के भेजे हुए महर्षि गार्ग्य बहुमूल्य भेंट-सामग्री लिये अयोध्यामें पधार रहे हैं, तब उन्होंने भाइयोंके साथ एक कोस आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और जैसे इन्द्र बृहस्पतिकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार महर्षि गार्ग्यका पूजन (स्वागत-सत्कार) किया॥ ४-५ ॥

इस प्रकार महर्षिका आदर-सत्कार करके उस धनको ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने उनका तथा मामाके घरका सारा कुशल-समाचार पूछा। फिर जब वे महाभाग ब्रह्मर्षि सुन्दर आसनपर विराजमान हो गये, तब श्रीरामने उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ ६ १/२ ॥

‘ब्रह्मर्षे! मेरे मामाने क्या संदेश दिया है, जिसके लिये साक्षात् बृहस्पतिके समान वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप पूज्यपाद महर्षिने यहाँ पधारनेका कष्ट किया है’॥

श्रीरामका यह प्रश्न सुनकर महर्षिने उनसे अद्भुत कार्य-विस्तारका वर्णन आरम्भ किया—॥ ८ १/२ ॥

‘महाबाहो! आपके मामा नरश्रेष्ठ युधाजित्ने जो प्रेमपूर्वक संदेश दिया है, उसे यदि रुचिकर जान पड़े तो सुनिये॥ ९ १/२ ॥

‘उन्होंने कहा है कि यह जो फल-मूलोंसे सुशोभित गन्धर्वदेश सिन्धु नदीके दोनों तटोंपर बसा हुआ है, बड़ा सुन्दर प्रदेश है॥ १० १/२ ॥

‘वीर रघुनन्दन! गन्धर्वराज शैलूषकी संतानें तीन करोड़ महाबली गन्धर्व, जो युद्धकी कलामें कुशल और अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं, उस देशकी रक्षा करते हैं॥

‘काकुत्स्थ! महाबाहो! आप उन गन्धर्वोंको जीतकर वहाँ सुन्दर गन्धर्वनगर बसाइये। अपने लिये उत्तम साधनोंसे सम्पन्न दो नगरोंका निर्माण कीजिये। वह देश बहुत सुन्दर है। वहाँ दूसरे किसीकी गति नहीं है। आप उसे अपने अधिकारमें लेना स्वीकार करें। मैं आपको ऐसी सलाह नहीं देता, जो अहितकारक हो’॥ १२-१३ ॥

महर्षि और मामाका वह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतकी ओर देखा॥ १४ ॥

तदनन्तर श्रीराघवेन्द्रने उन ब्रह्मर्षिसे प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मर्षे! ये दोनों कुमार तक्ष और पुष्कल, जो भरतके वीर पुत्र हैं, उस देशमें विचरेंगे और मामासे सुरक्षित रहकर धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो उस देशका शासन करेंगे॥ १५-१६ ॥

‘ये दोनों कुमार भरतको आगे करके सेना और सेवकोंके साथ वहाँ जायँगे तथा उन गन्धर्वपुत्रोंका संहार करके अलग-अलग दो नगर बसायेंगे॥ १७ ॥

‘उन दोनों श्रेष्ठ नगरोंको बसाकर उनमें अपने दोनों पुत्रोंको स्थापित करके अत्यन्त धर्मात्मा भरत फिर मेरे पास लौट आयेंगे’॥ १८ ॥

ब्रह्मर्षिसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने भरतको वहाँ सेनाके साथ जानेकी आज्ञा दी और दोनों कुमारोंका पहले ही राज्याभिषेक कर दिया॥ १९ ॥

तत्पश्चात् सौम्य नक्षत्र (मृगशिरा) में अङ्गिराके पुत्र महर्षि गार्ग्यको आगे करके सेना और कुमारोंके साथ भरतने यात्रा की॥ २० ॥

इन्द्रद्वारा प्रेरित हुई देवसेनाके समान वह सेना नगरसे बाहर निकली। भगवान् श्रीराम भी दूरतक उसके साथ-साथ गये। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय थी॥

मांसाहारी जन्तु और बड़े-बड़े राक्षस युद्धमें रक्तपानकी इच्छासे भरतके पीछे-पीछे गये॥ २२ ॥

अत्यन्त भयंकर कई हजार मांसभक्षी भूतसमूह गन्धर्व-पुत्रोंका मांस खानेके लिये उस सेनाके साथ-साथ गये॥ २३ ॥

सिंह, बाघ, सूअर और आकाशचारी पक्षी कई हजारकी संख्यामें सेनाके आगे-आगे चले॥ २४ ॥

मार्गमें डेढ़ महीने बिताकर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई वह सेना कुशलपूर्वक केकयदेशमें जा पहुँची॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

१०० ॥