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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग

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एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग

महादेवजीकी आज्ञासे श्रीराम और लक्ष्मणका विमानद्वारा आये हुए राजा दशरथको प्रणाम करना और दशरथका दोनों पुत्रों तथा सीताको आवश्यक संदेश दे इन्द्रलोकको जाना

श्रीरघुनाथजीके कहे हुए इन शुभ वचनोंको सुनकर श्रीमहादेवजी और भी शुभतर वचन बोले— ॥ १ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, महाबाहु कमलनयन! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। आपने रावण-वधरूप कार्य सम्पन्न कर दिया—यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २ ॥

‘श्रीराम! रावणजनित भय और दुःख सारे लोकोंके लिये बढ़े हुए घोर अन्धकारके समान था, जिसे आपने युद्धमें मिटा दिया॥ ३ ॥

‘महाबली वीर! अब दुःखी भरतको धीरज बँधाकर, यशस्विनी कौसल्या, कैकेयी तथा लक्ष्मणजननी सुमित्रासे मिलकर, अयोध्याका राज्य पाकर, सुहृदोंको आनन्द देकर, इक्ष्वाकुकुलमें अपना वंश स्थापित करके, अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर, सर्वोत्तम यशका उपार्जन करके तथा ब्राह्मणोंको धन देकर आपको अपने परम धाममें जाना चाहिये॥ ४—६ ॥

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! देखिये, ये आपके पिता राजा दशरथ विमानपर बैठे हुए हैं। मनुष्यलोकमें ये ही आपके महायशस्वी गुरु थे॥ ७ ॥

‘ये श्रीमान् नरेश इन्द्रलोकको प्राप्त हुए हैं। आप-जैसे सुपुत्रने इन्हें तार दिया। आप भार्इ लक्ष्मणके साथ इन्हें नमस्कार करें’॥ ८ ॥

महादेवजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने विमानमें उच्च स्थानपर बैठे हुए अपने पिताजीको प्रणाम किया॥ ९ ॥

भार्इ लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामने पिताको अच्छी तरह देखा। वे निर्मल वस्त्र धारण करके अपनी दिव्य शोभासे देदीप्यमान थे॥ १० ॥

विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथ अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र श्रीरामको देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ ११ ॥

श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए उन महाबाहु नरेशने उन्हें गोदमें बिठाकर दोनों बाँहोंमें भर लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

‘राम! मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुमसे विलग होकर मुझे स्वर्गका सुख तथा देवताओंद्वारा प्राप्त हुआ सम्मान भी अच्छा नहीं लगता॥ १३ ॥

‘आज तुम शत्रुओंका वध करके पूर्णमनोरथ हो गये और तुमने वनवासकी अवधि भी पूरी कर ली, यह सब देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १४ ॥

‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! तुम्हें वनमें भेजनेके लिये कैकेयीने जो-जो बातें कही थीं, वे सब आज भी मेरे हृदयमें बैठी हुई हैं॥ १५ ॥

‘आज लक्ष्मणसहित तुमको सकुशल देखकर और हृदयसे लगाकर मैं समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा गया हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे चन्द्रमा कुहरेसे निकल आये हों॥ १६ ॥

‘बेटा! जैसे अष्टावक्रने अपने धर्मात्मा पिता कहोल नामक ब्राह्मणको तार दिया था, वैसे ही तुम-जैसे महात्मा पुत्रने मेरा उद्धार कर दिया॥ १७ ॥

‘सौम्य! आज इन देवताओंके द्वारा मुझे मालूम हुआ कि रावणका वध करनेके लिये स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् ही तुम्हारे रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ १८ ॥

‘श्रीराम! कौसल्याका जीवन सार्थक है, जो वनसे लौटनेपर तुम-जैसे शत्रुसूदन वीर पुत्रको अपने घरमें हर्ष और उल्लासके साथ देखेंगी॥ १९ ॥

‘रघुनन्दन! वे प्रजाजन भी कृतार्थ हैं, जो अयोध्या पहुँचनेपर तुम्हें राज्यसिंहासनपर भूमिपालके रूपमें अभिषिक्त होते देखेंगे॥ २० ॥

‘भरत बड़ा ही धर्मात्मा, पवित्र और बलवान् है। वह तुममें सच्चा अनुराग रखता है। मैं उसके साथ तुम्हारा शीघ्र ही मिलन देखना चाहता हूँ॥ २१ ॥

‘सौम्य! तुमने मेरी प्रसन्नताके लिये लक्ष्मण और सीताके साथ रहते हुए वनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये॥ २२ ॥

‘अब तुम्हारे वनवासकी अवधि पूरी हो गयी। मेरी प्रतिज्ञा भी तुमने पूर्ण कर दी तथा संग्राममें रावणको मारकर देवताओंको भी संतुष्ट कर दिया॥ २३ ॥

‘शत्रुसूदन! ये सभी काम तुम कर चुके। इससे तुम्हें स्पृहणीय यश प्राप्त हुआ है। अब तुम भाइयोंके साथ राज्यपर प्रतिष्ठित हो दीर्घ आयु प्राप्त करो’॥ २४ ॥

जब राजा इस प्रकार कह चुके, तब श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर उनसे बोले— 'धर्मज्ञ महाराज! आप कैकेयी और भरतपर प्रसन्न हों—उन दोनोंपर कृपा करें॥ २५ ॥

'प्रभो! आपने जो कैकेयीसे कहा था कि मैं पुत्रसहित तेरा त्याग करता हूँ, आपका वह घोर शाप पुत्रसहित कैकेयीका स्पर्श न करे'॥ २६ ॥

तब श्रीरामसे 'बहुत अच्छा' कहकर महाराज दशरथने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और हाथ जोड़े खड़े हुए लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर फिर यह बात कही— ॥

'वत्स! तुमने विदेहनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामकी भक्तिपूर्वक सेवा करके मुझे बहुत प्रसन्न किया है। तुम्हें धर्मका फल प्राप्त हुआ है॥ २८ ॥

'धर्मज्ञ! भविष्यमें भी तुम्हें धर्मका फल प्राप्त होगा और भूमण्डलमें महान् यशकी उपलब्धि होगी। श्रीरामकी प्रसन्नतासे तुम्हें उत्तम स्वर्ग और महत्व प्राप्त होगा॥ २९ ॥

'सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम श्रीरामकी निरन्तर सेवा करते रहो। ये श्रीराम सदा सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहते हैं॥ ३० ॥

'देखो, इन्द्रसहित ये तीनों लोक, सिद्ध और महर्षि भी परमात्मस्वरूप पुरुषोत्तम रामको प्रणाम करके इनका पूजन कर रहे हैं॥ ३१ ॥

'सौम्य! शत्रुओंको संताप देनेवाले ये श्रीराम देवताओंके हृदय और परम गुह्य तत्त्व हैं। ये ही वेदोंद्वारा प्रतिपादित अव्यक्त एवं अविनाशी ब्रह्म हैं॥ ३२ ॥

'विदेहनन्दिनी सीताके साथ शान्तभावसे इनकी सेवा करते हुए तुमने सम्पूर्ण धर्माचरणका फल और महान् यश प्राप्त किया है'॥ ३३ ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर राजा दशरथने हाथ जोड़कर खड़ी हुईं पुत्रवधू सीताको 'बेटी' कहकर पुकारा और धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कहा— ॥ ३४ ॥

'विदेहनन्दिनि! तुम्हें इस त्यागको लेकर श्रीरामपर कुपित नहीं होना चाहिये; क्योंकि ये तुम्हारे हितैषी हैं और संसारमें तुम्हारी पवित्रता प्रकट करनेके लिये ही इन्होंने ऐसा व्यवहार किया है॥ ३५ ॥

'बेटी! तुमने अपने विशुद्ध चरित्रको परिलक्षित करानेके लिये जो अग्निप्रवेशरूप कार्य किया है, यह दूसरी स्त्रियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है। तुम्हारा यह कर्म अन्य नारियोंके यशको ढक लेगा॥ ३६ ॥

‘पति-सेवाके सम्बन्धमें भले ही तुम्हें कोई उपदेश देनेकी आवश्यकता न हो; किंतु इतना तो मुझे अवश्य बता देना चाहिये कि ये श्रीराम ही तुम्हारे सबसे बड़े देवता हैं’॥ ३७ ॥

इस प्रकार दोनों पुत्रों और सीताको आदेश एवं उपदेश देकर रघुवंशी राजा दशरथ विमानके द्वारा इन्द्रलोकको चले गये॥ ३८ ॥

नृपश्रेष्ठ महानुभाव दशरथ अद्भुत शोभासे सम्पन्न थे। उनका शरीर हर्षसे पुलकित हो रहा था। वे विमानपर बैठकर सीतासहित दोनों पुत्रोंसे विदा ले देवराज इन्द्रके लोकमें चले गये॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११९ ॥