श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
चौरानबेवाँ सर्ग
चौरानबेवाँ सर्ग
लव-कुशद्वारा रामायण-काव्यका गान तथा श्रीरामका उसे भरी सभामें सुनना
रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब स्नान-संध्याके पश्चात् समिधा-होमका कार्य पूरा करके वे दोनों भाई ऋषिके बताये अनुसार वहाँ सम्पूर्ण रामायणका गान करने लगे॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजीने भी वह गान सुना, जो पूर्ववर्ती आचार्योंके बताये हुए नियमोंके अनुकूल था। संगीतकी विशेषताओंसे युक्त स्वरोंके अलापनेकी अपूर्व शैली थी॥ २ ॥
बहुसंख्यक प्रमाणों—ध्वनिपरिच्छेदके साधनभूत द्रुत, मध्य और विलम्बित—इन तीनोंकी आवृत्तियों अथवा सप्तविध स्वरोंके भेदकी सिद्धिके लिये बने हुए स्थानोंसे बँधा और वीणाकी लयसे मिलता हुआ उन दोनों बालकोंका वह मधुर गान सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा कौतूहल हुआ॥ ३ ॥
तदनन्तर पुरुषसिंह राजा श्रीरामने कर्मानुष्ठानसे अवकाश मिलनेपर बड़े-बड़े मुनियों, राजाओं, वेदवेत्ता पण्डितों, पौराणिकों, वैयाकरणों, बड़े-बूढ़े ब्राह्मणों, स्वरों और लक्षणोंके ज्ञाताओं, गीत सुननेके लिये उत्सुक द्विजों, सामुद्रिक लक्षणों तथा संगीत-विद्याके जानकारों, विशेषतः निगमागमके विद्वानों अथवा पुरवासियों, भिन्न-भिन्न छन्दोंके चरणों, उनके गुरु-लघु अक्षरों तथा उनके सम्बन्धोंका ज्ञान रखनेवाले पण्डितों, वैदिक छन्दोंके परिनिष्ठित विद्वानों, स्वरोंकी ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्राओंके विशेषज्ञों, ज्योतिष विद्याके पारंगत पण्डितों, कर्मकाण्डियों, कार्यकुशल पुरुषों, विभिन्न भाषाओं और चेष्टा तथा संकेतोंको समझनेवाले पुरुषों एवं सारे महाजनोंको बुलवाया॥ ४—७ ½ ॥
इतना ही नहीं, तर्कके प्रयोगमें निपुण नैयायिकों, युक्तिवादी एवं बहुज्ञ विद्वानों, छन्दों, पुराणों और वेदोंके ज्ञाता द्विजवरों, चित्रकलाके जानकारों, धर्मशास्त्रके अनुकूल सदाचारके ज्ञाताओं, दर्शन एवं कल्पसूत्रके विद्वानों, नृत्य और गीतमें प्रवीण पुरुषों, विभिन्न शास्त्रोंके ज्ञाताओं, नीति-निपुण पुरुषों तथा वेदान्तके अर्थको प्रकाशित करनेवाले ब्रह्मवेत्ताओंको भी वहाँ बुलवाया। इन सबको एकत्र करके भगवान् श्रीरामने रामायण-गान करनेवाले उन दोनों बालकोंको सभामें बुलाकर बिठाया॥ ८—१० ॥
सभासदोंमें श्रोताओंका हर्ष बढ़ानेवाली बातें होने लगीं। उसी समय दोनों मुनिकुमारोंने गाना आरम्भ किया॥ ११ ॥
फिर तो मधुर संगीतका तार बँध गया। बड़ा अलौकिक गान था। गेय वस्तुकी विशेषताओंके कारण सभी श्रोता मुग्ध होकर सुनने लगे। किसीको तृप्ति नहीं होती थी॥ १२ ॥
मुनियोंके समुदाय और महापराक्रमी भूपाल सभी आनन्दमग्न होकर उन दोनोंकी ओर बारम्बार इस तरह देख रहे थे, मानो उनकी रूपमाधुरीको नेत्रोंसे पी रहे हों॥ १३ ॥
वे सब एकाग्रचित्त हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे—‘इन दोनों कुमारोंकी आकृति श्रीरामचन्द्रजीसे बिलकुल मिलती-जुलती है। ये बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान जान पड़ते हैं॥ १४ ॥
‘यदि इनके सिरपर जटा न होती और ये वल्कल न पहने होते तो हमें श्रीरामचन्द्रजीमें तथा गान करनेवाले इन दोनों कुमारोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता’॥ १५ ॥
नगर और जनपदमें निवास करनेवाले मनुष्य जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय नारदजीके द्वारा प्रदर्शित प्रथम सर्ग—मूल-रामायणका आरम्भसे ही गान प्रारम्भ हुआ॥ १६ ॥
वहाँसे लेकर बीस सर्गोंतकका उन्होंने गान किया। तत्पश्चात् अपराह्नका समय हो गया। उतनी देरमें बीस सर्गोंका गान सुनकर भ्रातृवत्सल श्रीरघुनाथजीने भाई भरतसे कहा—‘काकुत्स्थ! तुम इन दोनों महात्मा बालकोंको अठारह हजार स्वर्ण-मुद्राएँ पुरस्कारके रूपमें शीघ्र प्रदान करो। इसके सिवा यदि और किसी वस्तुके लिये इनकी इच्छा हो तो उसे भी शीघ्र ही दे दो’॥ १७-१८ १/२ ॥
आज्ञा पाकर भरत शीघ्र ही उन दोनों बालकोंको अलग-अलग स्वर्ण-मुद्राएँ देने लगे; किंतु उस दिये जाते हुए सुवर्णको कुश और लवने नहीं ग्रहण किया॥ १९ १/२ ॥
वे दोनों महामनस्वी बन्धु विस्मित होकर बोले—‘इस धनकी क्या आवश्यकता है। हम वनवासी हैं। जंगली फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करते हैं। सोनाचाँदी वनमें ले जाकर क्या करेंगे?’॥ २०-२१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर सब श्रोताओंके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। श्रोता और श्रीराम सभी आश्चर्यचकित हो गये॥ २२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी यह सुननेके लिये उत्सुक हुए कि इस काव्यकी उपलब्धि कहाँसे हुई है। फिर उन महातेजस्वी रघुनाथजीने दोनों मुनिकुमारोंसे पूछा—॥
‘इस महाकाव्यकी श्लोक-संख्या कितनी है? इसके रचयिता महात्मा कविका आवासस्थान कौन-सा है? इस महान् काव्यके कर्ता कौन मुनीश्वर हैं और वे कहाँ हैं?’॥ २४ ॥
इस प्रकार पूछते हुए श्रीरघुनाथजीसे वे दोनों मुनिकुमार बोले—‘महाराज! जिस काव्यके द्वारा आपके इस सम्पूर्ण चरित्रका प्रदर्शन कराया गया है, उसके रचयिता भगवान् वाल्मीकि हैं और वे इस यज्ञस्थलमें पधारे हुए हैं॥ २५ ॥
‘उन तपस्वी कविके बनाये हुए इस महाकाव्यमें चौबीस हजार श्लोक और एक सौ उपाख्यान हैं॥ २६ ॥
‘राजन्! उन महात्माने आदिसे लेकर अन्ततक पाँच सौ सर्ग तथा छः काण्डोंका निर्माण किया है। इनके सिवा उन्होंने उत्तरकाण्डकी भी रचना की है॥ २७ ॥
‘हमारे गुरु महर्षि वाल्मीकिने ही उन सबका निर्माण किया है। उन्होंने आपके चरित्रको महाकाव्यका रूप दिया है। इसमें आपके जीवनतककी सारी बातें आ गयी हैं॥ २८ ॥
‘महारथी नरेश! यदि आपने इसे सुननेका विचार किया हो तो यज्ञ-कर्मसे अवकाश मिलनेपर इसके लिये निश्चित समय निकालिये और अपने भाइयोंके साथ बैठकर इसे नियमितरूपसे सुनिये’॥ २९ ॥
‘तब श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘बहुत अच्छा। हम इस काव्यको सुनेंगे।’ तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा ले दोनों भाई कुश और लव प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकिजी ठहरे हुए थे॥ ३० ॥
श्रीरामचन्द्रजी भी महात्मा मुनियों और राजाओंके साथ उस मधुर संगीतको सुनकर कर्मशाला (यज्ञमण्डप) में चले गये॥ ३१ ॥
इस प्रकार प्रथम दिन कतिपय सर्गोंसे युक्त सुन्दर स्वर एवं मधुर शब्दोंसे पूर्ण, ताल और लयसे सम्पन्न तथा वीणाके लयकी व्यञ्जनासे युक्त वह काव्यगान, जिसे कुश और लवने गाया था, श्रीरामने सुना॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४ ॥