सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

चौंसठवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

चौंसठवाँ सर्ग

विश्वामित्रका रम्भाको शाप देकर पुनः घोर तपस्याके लिये दीक्षा लेना

(इन्द्र बोले—) रम्भे! देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है। इसे तुम्हें ही पूरा करना है। तू महर्षि विश्वामित्रको इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोहके वशीभूत हो जायँ॥ १ ॥

श्रीराम! बुद्धिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्रसे बोली—॥ २ ॥

‘सुरपते! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं। देव! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोधका प्रयोग करेंगे॥ ३ ॥

‘अतः देवेश्वर! मुझे उनसे बड़ा डर लगता है, आप मुझपर कृपा करें।' श्रीराम! डरी हुई रम्भाके इस प्रकार भयपूर्वक कहनेपर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ी और थर-थर काँपती हुई रम्भासे इस प्रकार बोले—‘रम्भे! तू भय न कर, तेरा भला हो, तू मेरी आज्ञा मान ले॥ ४-५ ॥

‘वैशाख मासमें जब कि प्रत्येक वृक्ष नवपल्लवोंसे परम सुन्दर शोभा धारण कर लेता है, अपनी मधुर काकलीसे सबके हृदयको खींचनेवाले कोकिल और कामदेवके साथ मैं भी तेरे पास रहूँगा॥ ६ ॥

‘भद्रे! तू अपने परम कान्तिमान् रूपको हावभाव आदि विविध गुणोंसे सम्पन्न करके उसके द्वारा विश्वामित्र मुनिको तपस्यासे विचलित कर दे'॥ ७ ॥

देवराजका यह वचन सुनकर उस मधुर मुसकानवाली सुन्दरी अप्सराने परम उत्तम रूप बनाकर विश्वामित्रको लुभाना आरम्भ किया॥ ८ ॥

विश्वामित्रने मीठी बोली बोलनेवाले कोकिलकी मधुर काकली सुनी। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर जब उस ओर दृष्टिपात किया, तब सामने रम्भा खड़ी दिखायी दी॥ ९ ॥

कोकिलके कलरव, रम्भाके अनुपम गीत और अप्रत्याशित दर्शनसे मुनिके मनमें संदेह हो गया॥ १० ॥

देवराजका वह सारा कुचक्र उनकी समझमें आ गया। फिर तो मुनिवर विश्वामित्रने क्रोधमें भरकर रम्भाको शाप देते हुए कहा—॥ ११ ॥

‘दुर्भगे रम्भे! मैं काम और क्रोधपर विजय पाना चाहता हूँ और तू आकर मुझे लुभाती है। अतः इस अपराधके कारण तू दस हजार वर्षोंतक पत्थरकी प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी॥ १२ ॥

‘रम्भे! शापका समय पूरा हो जानेके बाद एक महान् तेजस्वी और तपोबलसम्पन्न ब्राह्मण (ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ) मेरे क्रोधसे कलुषित तेरा उद्धार करेंगे’॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र अपना क्रोध न रोक सकनेके कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे॥ १४ ॥

मुनिके उस महाशापसे रम्भा तत्काल पत्थरकी प्रतिमा बन गयी। महर्षिका वह शापयुक्त वचन सुनकर कन्दर्प और इन्द्र वहाँसे खिसक गये॥ १५ ॥

श्रीराम! क्रोधसे तपस्याका क्षय हो गया और इन्द्रियाँ अभीतक काबूमें न आ सकीं, यह विचारकर उन महातेजस्वी मुनिके चित्तको शान्ति नहीं मिलती थी॥ १६ ॥

तपस्याका अपहरण हो जानेपर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘अबसे न तो क्रोध करूँगा और न किसी भी अवस्थामें मुँहसे कुछ बोलूँगा॥ १७ ॥

‘अथवा सौ वर्षोंतक मैं श्वास भी न लूँगा। इन्द्रियोंको जीतकर इस शरीरको सुखा डालूँगा॥ १८ ॥

‘जबतक अपनी तपस्यासे उपार्जित ब्राह्मणत्व मुझे प्राप्त न होगा, तबतक चाहे अनन्त वर्ष बीत जायँ, मैं बिना खाये-पीये खड़ा रहूँगा और साँसतक न लूँगा॥ १९ ॥

‘तपस्या करते समय मेरे शरीरके अवयव कदापि नष्ट नहीं होंगे।’ रघुनन्दन! ऐसा निश्चय करके मुनिवर विश्वामित्रने पुनः एक हजार वर्षोंतक तपस्या करनेके लिये दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी संसारमें कहीं तुलना नहीं है॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६४॥