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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छत्तीसवाँ सर्ग

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छत्तीसवाँ सर्ग

राजा दशरथका श्रीरामके साथ सेना और खजाना भेजनेका आदेश, कैकेयीद्वारा इसका विरोध, सिद्धार्थका कैकेयीको समझाना तथा राजाका श्रीरामके साथ जानेकी इच्छा प्रकट करना

तब इक्ष्वाकुकुलनन्दन राजा दशरथ वहाँ अपनी प्रतिज्ञासे पीड़ित हो आँसू बहाते हुए लम्बी साँस खींचकर सुमन्त्रसे फिर इस प्रकार बोले — ॥ १ ॥

‘सूत! तुम शीघ्र ही रत्नोंसे भरी-पूरी चतुरङ्गिणी सेनाको श्रीरामके पीछे-पीछे जानेकी आज्ञा दो॥ २ ॥

‘रूपसे आजीविका चलाने और सरस वचन बोलनेवाली स्त्रियाँ तथा महाधनी एवं विक्रययोग्य द्रव्योंका प्रसारण करनेमें कुशल वैश्य राजकुमार श्रीरामकी सेनाओंको सुशोभित करें॥ ३ ॥

‘जो श्रीरामके पास रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं तथा जिन मल्लोंसे ये उनका पराक्रम देखकर प्रसन्न रहते हैं, उन सबको अनेक प्रकारका धन देकर उन्हें भी इनके साथ जानेकी आज्ञा दे दो॥ ४ ॥

‘मुख्य-मुख्य आयुध, नगरके निवासी, छकड़े तथा वनके भीतरी रहस्यको जाननेवाले व्याध ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके पीछे-पीछे जायँ॥ ५ ॥

‘वे रास्तेमें आये हुए मृगों एवं हाथियोंको पीछे लौटाते, जंगली मधुका पान करते और नाना प्रकारकी नदियोंको देखते हुए अपने राज्यका स्मरण नहीं करेंगे॥

‘श्रीराम निर्जन वनमें निवास करनेके लिये जा रहे हैं, अतः मेरा खजाना और अन्नभण्डार—ये दोनों वस्तुएँ इनके साथ जायँ॥ ७ ॥

‘ये वनके पावन प्रदेशोंमें यज्ञ करेंगे, उनमें आचार्य आदिको पर्याप्त दक्षिणा देंगे तथा ऋषियोंसे मिलकर वनमें सुखपूर्वक रहेंगे॥ ८ ॥

‘महाबाहु भरत अयोध्याका पालन करेंगे। श्रीमान् रामको सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न करके यहाँसे भेजा जाय’॥ ९ ॥

जब महाराज दशरथ ऐसी बातें कहने लगे, तब कैकेयीको बड़ा भय हुआ। उसका मुँह सूख गया और उसका स्वर भी रुँध गया॥ १०॥

वह केकयराजकुमारी विषादग्रस्त एवं त्रस्त होकर सूखे मुँहसे राजाकी ओर ही मुँह करके बोली—॥ ११॥

‘श्रेष्ठ महाराज! जिसका सारभाग पहलेसे ही पी लिया गया हो, उस आस्वादरहित सुराको जैसे उसका सेवन करनेवाले लोग नहीं ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस धनहीन और सूने राज्यको, जो कदापि सेवन करनेयोग्य नहीं रह जायगा, भरत कदापि नहीं ग्रहण करेंगे’॥ १२॥

कैकेयी लाज छोड़कर जब वह अत्यन्त दारुण वचन बोलने लगी, तब राजा दशरथने उस विशाललोचना कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १३॥

‘अनार्ये! अहितकारिणि! तू रामको वनवास देनेके दुर्वह भारमें लगाकर जब मैं उस भारको ढो रहा हूँ, उस अवस्थामें क्यों अपने वचनोंका चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीरामके साथ सेना और सामग्री भेजनेमें जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी? (अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीरामको अकेले वनमें जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती)’॥ १४॥

राजाका यह क्रोधयुक्त वचन सुनकर सुन्दरी कैकेयी उनकी अपेक्षा दूना क्रोध करके उनसे इस प्रकार बोली—॥ १५॥

‘महाराज! आपके ही वंशमें पहले राजा सगर हो गये हैं, जिन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमञ्जको निकालकर उसके लिये राज्यका दरवाजा सदाके लिये बंद कर दिया था। इसी तरह इनको भी यहाँसे निकल जाना चाहिये’॥ १६॥

उसके ऐसा कहनेपर राजा दशरथने कहा— ‘धिक्कार है।’ वहाँ जितने लोग बैठे थे सभी लाजसे गड़ गये; किंतु कैकेयी अपने कथनके अनौचित्यको अथवा राजाद्वारा दिये गये धिक्कारके औचित्यको नहीं समझ सकी॥ १७॥

उस समय वहाँ राजाके प्रधान और वयोवृद्ध मन्त्री सिद्धार्थ बैठे थे। वे बड़े ही शुद्ध स्वभाववाले और राजाके विशेष आदरणीय थे। उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १८॥

‘देवि! असमञ्ज बड़ी दुष्ट बुद्धिका राजकुमार था। वह मार्गपर खेलते हुए बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता था और ऐसे ही कार्योंसे अपना मनोरञ्जन करता था॥ १९॥

‘उसकी यह करतूत देखकर सभी नगरनिवासी कुपित हो राजाके पास जाकर बोले—‘राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले महाराज! या तो आप अकेले असमञ्जको लेकर रहिये या इन्हें निकालकर हमें इस नगरमें रहने दीजिये’॥ २०॥

‘तब राजाने उनसे पूछा—‘तुम्हें असमञ्जसे किस कारण भय हुआ है?’ राजाके पूछनेपर उन प्रजाजनोंने यह बात कही—॥ २१॥

‘महाराज! यह हमारे खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चोंको पकड़ लेते हैं और जब वे बहुत घबरा जाते हैं, तब उन्हें सरयूममें फेंक देते हैं। मूर्खतावश ऐसा करके इन्हें अनुपम आनन्द प्राप्त होता है’॥ २२॥

‘उन प्रजाजनोंकी वह बात सुनकर राजा सगरने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने उस अहितकारक दुष्ट पुत्रको त्याग दिया॥ २३॥

‘पिताने अपने उस पुत्रको पत्नी और आवश्यक सामग्रीसहित शीघ्र रथपर बिठाकर अपने सेवकोंको आज्ञा दी—‘इसे जीवनभरके लिये राज्यसे बाहर निकाल दो’॥ २४॥

‘असमञ्जने फाल और पिटारी लेकर पर्वतोंकी दुर्गम गुफाओंको ही अपने निवासके योग्य देखा और कन्द आदिके लिये वह सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगा। वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगरने उसको त्याग दिया था। श्रीरामने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पानेसे रोका जा रहा है?॥

‘हमलोग तो श्रीरामचन्द्रजीमें को◌ंइ अवगुण नहीं देखते हैं; जैसे (शुक्लपक्षकी द्वितीयाके) चन्द्रमामें मलिनताका दर्शन दुर्लभ है, उसी प्रकार इनमें को◌ंइ पाप या अपराध ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता॥ २७॥

‘अथवा देवि! यदि तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीमें को◌ंइ दोष दिखायी देता हो तो आज उसे ठीक-ठीक बताओ। उस दशामें श्रीरामको निकाल दिया जा सकता है॥ २८॥

‘जिसमें को◌ंइ दुष्टता नहीं है, जो सदा सन्मार्गमें ही स्थित है, ऐसे पुरुषका त्याग धर्मसे विरुद्ध माना जाता है। ऐसा धर्मविरोधी कर्म तो इन्द्रके भी तेजको दग्ध कर देगा॥ २९॥

‘अतः देवि! श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे तुम्हें को◌ंइ लाभ नहीं होगा। शुभानने! तुम्हें लोकनिन्दासे भी बचनेकी चेष्टा करनी चाहिये’॥ ३०॥

सिद्धार्थकी बातें सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त थके हुए स्वरसे शोकाकुल वाणीमें कैकेयीसे इस प्रकार बोले— ॥ ३१ ॥

‘पापिनि! क्या तुझे यह बात नहीं रुची? तुझे मेरे या अपने हितका भी बिलकुल ज्ञान नहीं है? तू दुःखद मार्गका आश्रय लेकर ऐसी कुचेष्टा कर रही है। तेरी यह सारी चेष्टा साधु पुरुषोंके मार्गके विपरीत है॥ ३२ ॥

‘अब मैं भी यह राज्य, धन और सुख छोड़कर श्रीरामके पीछे चला जाऊँगा। ये सब लोग भी उन्हींके साथ जायँगे। तू अकेली राजा भरतके साथ चिरकालतक सुखपूर्वक राज्य भोगती रह’॥ ३३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥