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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

चौथा सर्ग

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चौथा सर्ग

हनुमान्जीका लंकापुरी एवं रावणके अन्तःपुरमें प्रवेश

इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली श्रेष्ठ राक्षसी लंकापुरीको अपने पराक्रमसे परास्त करके महातेजस्वी महाबली महान् सत्त्वशाली वानरशिरोमणि कपिकुञ्जर हनुमान् बिना दरवाजेके ही रातमें चहारदीवारी फाँद गये और लंकाके भीतर घुस गये॥ १-२ ॥

कपिराज सुग्रीवका हित करनेवाले हनुमान्जीने इस तरह लंकापुरीमें प्रवेश करके मानो शत्रुओंके सिरपर अपना बायाँ पैर रख दिया॥ ३ ॥

सत्त्वगुणसे सम्पन्न पवनपुत्र हनुमान् उस रातमें परकोटेके भीतर प्रवेश करके बिखेरे गये फूलोंसे सुशोभित राजमार्गका आश्रय ले उस रमणीय लंकापुरीकी ओर चले॥ ४१/२ ॥

जैसे आकाश श्वेत बादलोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार वह रमणीय पुरी अपने श्वेत मेघसदृश गृहोंसे उत्तम शोभा पा रही थी। वे गृह अट्टहासजनित उत्कृष्ट शब्दों तथा वाद्यघोषोंसे मुखरित थे। उनमें वज्रों तथा अंकुशोंके चित्र अङ्कित थे और हीरोंके बने हुए झरोखे उनकी शोभा बढ़ाते थे॥ ५-६ ॥

उस समय लंका श्वेत बादलोंके समान सुन्दर एवं विचित्र राक्षस-गृहोंसे प्रकाशित हो रही थी। उन गृहोंमेंसे कोई तो कमलके आकारमें बने हुए थे। कोई¹ स्वस्तिकके चिह्न या आकारसे युक्त थे और किन्हींका निर्माण वर्धमानसंज्ञक² गृहोंके रूपमें हुआ था। वे सभी सब ओरसे सजाये गये थे॥ ७१/२ ॥

वानरराज सुग्रीवका हित करनेवाले श्रीमान् हनुमान् श्रीरघुनाथजीकी कार्यसिद्धिके लिये विचित्र पुष्पमय आभरणोंसे अलंकृत लंकामें विचरने लगे। उन्होंने उस पुरीको अच्छी तरह देखा और देखकर प्रसन्नताका अनुभव किया॥ ८१/२ ॥

उन कपिश्रेष्ठने जहाँ-तहाँ एक घरसे दूसरे घरपर जाते हुए विविध आकार-प्रकारके भवन देखे तथा हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीन स्थानोंसे निकलनेवाले मन्द, मध्यम और उच्च स्वरसे विभूषित मनोहर गीत सुने॥ ९-१० ॥

उन्होंने स्वर्गीय अप्सराओंके समान सुन्दरी तथा कामवेदनासे पीड़ित कामिनियोंकी करधनी और पायजेबोंकी झनकार सुनी॥ ११ ॥

इसी तरह जहाँ-तहाँ महामनस्वी राक्षसोंके घरोंमें सीढ़ियोंपर चढ़ते समय स्त्रियोंकी काञ्ची और मंजीरकी मधुर ध्वनि तथा पुरुषोंके ताल ठोकने और गर्जनेकी भी आवाजें उन्हें सुनायी दीं॥ १२ ॥

राक्षसोंके घरोंमें बहुतोंको तो उन्होंने वहाँ मन्त्र जपते हुए सुना और कितने ही निशाचरोंको स्वाध्यायमें तत्पर देखा॥ १३ ॥

को ऽ इ राक्षसोंको उन्होंने रावणकी स्तुतिके साथ गर्जना करते और निशाचरोंकी एक बड़ी भीड़को राजमार्ग रोककर खड़ी हु ऽ इ देखा॥ १४ ॥

नगरके मध्यभागमें उन्हें रावणके बहुत-से गुप्तचर दिखायी दिये। उनमें को ऽ इ योगकी दीक्षा लिये हुए, को ऽ इ जटा बढ़ाये, को ऽ इ मूड़ मुँड़ाये, को ऽ इ गोचर्म या मृगचर्म धारण किये और को ऽ इ नंग-धड़ंग थे। को ऽ इ मुट्ठीभर कुशोंको ही अस्त्र-रूपसे धारण किये हुए थे। किन्हींका अग्निकुण्ड ही आयुध था। किन्हींके हाथमें कूट या मुद्गर था। को ऽ इ डंडेको ही हथियाररूपमें लिये हुए थे॥

किन्हींके एक ही आँख थी तो किन्हींके रूप बहुरंगे थे। कितनोंके पेट और स्तन बहुत बड़े थे। को ऽ इ बड़े विकराल थे। किन्हींके मुँह टेढ़े-मेढ़े थे। को ऽ इ विकट थे तो को ऽ इ बौने॥ १७ ॥

किन्हींके पास धनुष, खड्ग, शतघ्नी और मूसलरूप आयुध थे। किन्हींके हाथोंमें उत्तम परिघ विद्यमान थे और को ऽ इ विचित्र कवचोंसे प्रकाशित हो रहे थे॥ १८ ॥

कुछ निशाचर न तो अधिक मोटे थे, न अधिक दुर्बल, न बहुत लंबे थे न अधिक छोटे, न बहुत गोरे थे न अधिक काले तथा न अधिक कुबड़े थे न विशेष बौने ही॥ १९ ॥

को ऽ इ बड़े कुरूप थे, को ऽ इ अनेक प्रकारके रूप धारण कर सकते थे, किन्हींका रूप सुन्दर था, को ऽ इ बड़े तेजस्वी थे तथा किन्हींके पास ध्वजा, पताका और अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे॥ २० ॥

को ऽ इ शक्ति और वृक्षरूप आयुध धारण किये देखे जाते थे तथा किन्हींके पास पट्टिश, वज्र, गुलेल और पाश थे। महाकपि हनुमान्ने उन सबको देखा॥ २१ ॥

किन्हींके गलेमें फूलोंके हार थे और ललाट आदि अंग चन्दनसे चर्चित थे। को ऽ इ श्रेष्ठ आभूषणोंसे सजे हुए थे। कितने ही नाना प्रकारके वेशभूषासे संयुक्त थे और बहुतेरे स्वेच्छानुसार विचरनेवाले जान पड़ते थे॥ २२ ॥

कितने ही राक्षस तीखे शूल तथा वज्र लिये हुए थे। वे सब-के-सब महान् बलसे सम्पन्न थे। इनके सिवा कपिवर हनुमान्ने एक लाख रक्षक सेनाको राक्षसराज रावणकी आज्ञासे सावधान होकर नगरके मध्यभागकी रक्षामें संलग्न देखा। वे सारे सैनिक रावणके अन्तःपुरके अग्रभागमें स्थित थे॥ २३१/२ ॥

रक्षक सेनाके लिये जो विशाल भवन बना था, उसका फाटक बहुमूल्य सुवर्णद्वारा निर्मित हुआ था। उस आरक्षाभवनको देखकर महाकपि हनुमान्जीने राक्षसराज रावणके सुप्रसिद्ध राजमहलपर दृष्टिपात किया, जो त्रिकूट पर्वतके एक शिखरपर प्रतिष्ठित था। वह सब ओरसे श्वेत कमलोंद्वारा अलंकृत खाइयोंसे घिरा हुआ था। उसके चारों ओर बहुत ऊँचा परकोटा था, जिसने उस राजभवनको घेर रखा था। वह दिव्य भवन स्वर्गलोकके समान मनोहर था और वहाँ संगीत आदिके दिव्य शब्द गूँज रहे थे॥ २४—२६ ॥

घोड़ोंकी हिनहिनाहटकी आवाज भी वहाँ सब ओर फैली हुई थी। आभूषणोंकी रुनझुन भी कानोंमें पड़ती रहती थी। नाना प्रकारके रथ, पालकी आदि सवारी, विमान, सुन्दर हाथी, घोड़े, श्वेत बादलोंकी घटाके समान दिखायी देनेवाले चार दाँतोंसे युक्त सजे-सजाये मतवाले हाथी तथा मदमत्त पशु-पक्षियोंके संचरणसे उस राजमहलका द्वार बड़ा सुन्दर दिखायी देता था॥ २७-२८ ॥

सहस्रों महापराक्रमी निशाचर राक्षसराजके उस महलकी रक्षा करते थे। उस गुप्त भवनमें भी कपिवर हनुमान्जी जा पहुँचे॥ २९ ॥

तदनन्तर जिसके चारों ओर सुवर्ण एवं जाम्बूनदका परकोटा था, जिसका ऊपरी भाग बहुमूल्य मोती और मणियोंसे विभूषित था तथा अत्यन्त उत्तम काले अगुरु एवं चन्दनसे जिसकी अर्चना की जाती थी, रावणके उस अन्तःपुरमें हनुमान्जीने प्रवेश किया॥ ३० ॥

१-२ वाराहमिहिरकी संहितामें गृहोंके विभिन्न संस्थानों (आकृतियों) का वर्णन किया गया है। उन्हीं संस्थानोंके अनुसार उनके नाम दिये गये हैं। जहाँ स्वस्तिकसंस्थान और वर्धमानसंज्ञक गृहका उल्लेख हुआ है, इनके लक्षणोंको स्पष्ट करनेवाले वचनोंको यहाँ उद्धृत किया जाता है—

चतुःशालं चतुर्द्वारं सर्वतोभद्रसंज्ञितम्। पश्चिमद्वाररहितं नन्द्यावर्ताह्वयन्तु तत्॥
दक्षिणद्वाररहितं वर्धमानं धनप्रदम्। प्राग्द्वाररहितं स्वस्तिकाख्यं पुत्रधनप्रदम्॥

चार शालाओंसे युक्त गृहको, जिसके प्रत्येक दिशामें एक-एक करके चार द्वार हों, ‘सर्वतोभद्र’ कहते हैं। जिसमें तीन ही द्वार हों, पश्चिम दिशाकी ओर द्वार न हो, उसका नाम ‘नन्द्यावर्त’ है। जिसमें दक्षिणके सिवा अन्य तीन दिशाओंमें द्वार हों, उसे ‘वर्धमान’ गृह कहते हैं। वह धन देनेवाला होता है तथा जिसमें केवल पूर्व दिशाकी ओर द्वार न हो, उस गृहका नाम ‘स्वस्तिक’ है। वह पुत्र और धन देनेवाला होता है।

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥

४ ॥