श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ अट्ठाईसवाँ सर्ग
एक सौ अट्ठाईसवाँ सर्ग
भरतका श्रीरामको राज्य लौटाना, श्रीरामकी नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरोंकी विदाई तथा ग्रन्थका माहात्म्य
तत्पश्चात् कैकेयीनन्दन भरतने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर अपने बड़े भाई सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— ॥
‘आपने मेरी माताका सम्मान किया और यह राज्य मुझे दे दिया। जैसे आपने मुझे दिया, उसी तरह मैं अब फिर आपको वापस दे रहा हूँ॥ २ ॥
‘अत्यन्त बलवान् बैल जिस बोझेको अकेला उठाता है, उसे बछड़ा नहीं उठा सकता; उसी तरह मैं भी इस भारी भारको उठानेमें असमर्थ हूँ॥ ३ ॥
‘जैसे जलके महान् वेगसे टूटे या फटे हुए बाँधको, जब कि उससे जलका प्रखर प्रवाह बह रहा हो, बाँधना अत्यन्त कठिन होता है, उसी प्रकार राज्यके खुले हुए छिद्रको ढक पाना मैं अपने लिये असम्भव मानता हूँ॥
‘शत्रुदमन वीर! जैसे गदहा घोड़ेकी और कौवा हंसकी गतिका अनुसरण नहीं कर सकता, उसी तरह मैं आपके मार्गका—रक्षणीय-रक्षणरूपी कौशलका अनुकरण नहीं कर सकता॥ ५ ॥
‘महाबाहो! नरेन्द्र! जैसे घरके भीतरके बगीचेमें एक वृक्ष लगाया गया। वह जमा और जमकर बहुत बड़ा हो गया। इतना बड़ा कि उसपर चढ़ना कठिन हो रहा था। उसका तना बहुत बड़ा और मोटा था तथा उसमें बहुत-सी शाखाएँ थीं। उस वृक्षमें फूल लगे; किंतु वह अपने फल नहीं दिखा सका था। इसी दशामें टूटकर धराशायी हो गया। लगानेवालोंने जिन फलोंके उद्देश्यसे उस वृक्षको लगाया था, उनका अनुभव वे नहीं कर सके। यही उपमा उस राजाके लिये भी हो सकती है, जिसे प्रजाने अपनी रक्षाके लिये पाल-पोसकर बड़ा किया और बड़े होनेपर वह उनकी रक्षासे मुँह मोड़ने लगे। इस कथनके तात्पर्यको आप समझें। यदि भर्त्ता होकर भी आप हम भृत्योंका भरण-पोषण नहीं करेंगे तो आप भी उस निष्फल वृक्षके समान ही समझे जायँगे॥
‘रघुनन्दन! अब तो हमारी यही इच्छा है कि जगत्के सब लोग आपका राज्याभिषेक देखें। मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति आपका तेज और प्रताप बढ़ता रहे॥ ९ ॥
‘आप विविध वाद्योंकी मधुर ध्वनि, काञ्ची तथा नूपुरोंकी झनकार और गीतके मनोहर शब्द सुनकर सोयें और जागें॥ १०॥
‘जबतक नक्षत्रमण्डल घूमता है और जबतक यह पृथ्वी स्थित है तबतक आप इस संसारके स्वामी बने रहें’॥ ११॥
भरतकी यह बात सुनकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भगवान् श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर उसे मान लिया और वे एक सुन्दर आसनपर विराजमान हुए॥ १२॥
फिर शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे निपुण नाई बुलाये गये, जिनके हाथ हलके और तेज चलनेवाले थे। उन सबने श्रीरघुनाथजीको घेर लिया॥ १३॥
पहले भरतने स्नान किया फिर महाबली लक्ष्मणने। तत्पश्चात् वानरराज सुग्रीव और राक्षसराज विभीषणने भी स्नान किया। तदनन्तर जटाका शोधन करके श्रीरामने स्नान किया, फिर विचित्र पुष्पमाला, सुन्दर अनुलेपन और बहुमूल्य पीताम्बर धारण करके आभूषणोंकी शोभासे प्रकाशित होते हुए वे सिंहासनपर विराजमान हुए॥ १४-१५॥
इक्ष्वाकुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले शोभाशाली, पराक्रमी वीर शत्रुघ्नने श्रीराम और लक्ष्मणको शृङ्गार धारण कराया॥ १६॥
उस समय राजा दशरथकी सभी मनस्विनी रानियोंने स्वयं अपने हाथोंसे सीताजीका मनोहर शृङ्गार किया॥ १७॥
पुत्रवत्सला कौसल्याने अत्यन्त हर्ष और उत्साहके साथ बड़े यत्नसे समस्त वानरपत्नियोंका सुन्दर शृङ्गार किया॥ १८॥
तत्पश्चात् शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे सारथि सुमन्त्रजी एक सर्वाङ्गसुन्दर रथ जोतकर ले आये॥ १९॥
अग्नि और सूर्यके समान देदीप्यमान उस दिव्य रथको खड़ा देख शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीराम उसपर आरूढ़ हुए॥ २०॥
सुग्रीव और हनुमान्जी दोनों देवराज इन्द्रके समान कान्तिमान् थे। दोनोंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभा पा रहे थे। वे दोनों ही स्नान करके दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित हो नगरकी ओर चले॥ २१॥
सुग्रीवकी पत्नियाँ और सीताजी समस्त आभूषणोंसे विभूषित और सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत हो नगर देखनेकी उत्सुकता मनमें लिये सवारियोंपर चलीं॥ २२ ॥
अयोध्यामें राजा दशरथके मन्त्री पुरोहित वसिष्ठजीको आगे करके श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके विषयमें आवश्यक विचार करने लगे॥ २३ ॥
अशोक, विजय और सिद्धार्थ—ये तीनों मन्त्री एकाग्रचित्त हो श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदय तथा नगरकी समृद्धिके लिये परस्पर मन्त्रणा करने लगे॥ २४ ॥
उन्होंने सेवकोंसे कहा—'विजयके योग्य जो महात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं, उनके अभिषेकके लिये जो-जो आवश्यक कार्य करना है, वह सब मङ्गलपूर्वक तुम सब लोग करो'॥ २५ ॥
इस प्रकार आदेश देकर वे मन्त्री और पुरोहितजी श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये तत्काल नगरसे बाहर निकले॥ २६ ॥
जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर यात्रा करते हैं, उसी प्रकार निष्पाप श्रीराम एक श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो अपने उत्तम नगरकी ओर चले॥ २७ ॥
उस समय भरतने सारथि बनकर घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले रखी थी। शत्रुघ्नने छत्र लगा रखा था और लक्ष्मण उस समय श्रीरामचन्द्रजीके मस्तकपर चँवर डुला रहे थे॥ २८ ॥
एक ओर लक्ष्मण थे और दूसरी ओर राक्षसराज विभीषण खड़े थे। उन्होंने चन्द्रमाके समान कान्तिमान् दूसरा श्वेत चँवर हाथमें ले रखा था॥ २९ ॥
उस समय आकाशमें खड़े हुए ऋषियों तथा मरुद्गणोंसहित देवताओंके समुदाय श्रीरामचन्द्रजीके स्तवनकी मधुर ध्वनि सुन रहे थे॥ ३० ॥
तदनन्तर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीव शत्रुञ्जय नामक पर्वताकार गजराजपर आरूढ़ हुए॥ ३१ ॥
वानरलोग नौ हजार हाथियोंपर चढ़कर यात्रा कर रहे थे। वे उस समय मानवरूप धारण किये हुए थे और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे॥ ३२ ॥
पुरुषसिंह श्रीराम शङ्खध्वनि तथा दुन्दुभियोंके गम्भीर नादके साथ प्रासादमालाओंसे अलंकृत अयोध्यापुरीकी ओर प्रस्थित हुए॥ ३३ ॥
अयोध्यावासियोंने अतिरथी श्रीरघुनाथजीको रथपर बैठकर आते देखा। उनका श्रीविग्रह दिव्यकान्तिसे प्रकाशित हो रहा था और उनके आगे-आगे अग्रगामी सैनिकोंका जत्था चल रहा
था॥ ३४ ॥
उन सबने आगे बढ़कर श्रीरघुनाथजीको बधार्इ दी और श्रीरामने भी बदलेमें उनका अभिनन्दन किया। फिर वे सब पुरवासी भाइयोंसे घिरे हुए महात्मा श्रीरामके पीछे-पीछे चलने लगे॥ ३५ ॥
जैसे नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमा सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार मन्त्रियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाजनोंसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी दिव्यकान्तिसे उद्भासित हो रहे थे॥
सबसे आगे बाजेवाले थे। वे आनन्दमग्न हो तुरही, करताल और स्वस्तिक बजाते तथा माङ्गलिक गीत गाते थे। उन सबके साथ श्रीरामचन्द्रजी नगरकी ओर बढ़ने लगे॥ ३७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके आगे अक्षत और सुवर्णसे युक्त पात्र, गौ, ब्राह्मण, कन्याएँ तथा हाथमें मिठार्इ लिये अनेकानेक मनुष्य चल रहे थे॥ ३८ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अपने मन्त्रियोंसे सुग्रीवकी मित्रता, हनुमान्जीके प्रभाव तथा अन्य वानरोंके अद्भुत पराक्रमकी चर्चा करते जा रहे थे॥ ३९ ॥
वानरोंके पुरुषार्थ और राक्षसोंके बलकी बातें सुनकर अयोध्यावासियोंको बड़ा विस्मय हुआ। श्रीरामने विभीषणके मिलनका प्रसंग भी अपने मन्त्रियोंको बताया॥ ४० ॥
यह सब बताकर वानरोंसहित तेजस्वी श्रीरामने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुर्इ अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया॥
उस समय पुरवासियोंने अपने-अपने घरपर लगी हुर्इ पताकाएँ ऊँची कर दीं। फिर श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके उपयोगमें आये हुए पिताके रमणीय भवनमें गये॥ ४२ ॥
उस समय रघुकुलनन्दन राजकुमार श्रीरामने महात्मा पिताजीके भवनमें प्रवेश करके माता कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतसे अर्थयुक्त मधुर वाणीमें कहा— ॥ ४३-४४ ॥
‘भरत! मेरा जो अशोकवाटिकासे घिरा हुआ मुक्ता एवं वैदूर्य मणियोंसे जटिल विशाल भवन है, वह सुग्रीवको दे दो’॥ ४५ ॥
उनकी आज्ञा सुनकर सत्यपराक्रमी भरतने सुग्रीवका हाथ पकड़कर उस भवनमें प्रवेश किया॥ ४६ ॥
फिर शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे अनेकानेक सेवक उसमें तिलके तेलसे जलनेवाले बहुत-से दीपक, पलंग और बिछौने लेकर शीघ्र ही गये॥ ४७ ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी भरतने सुग्रीवसे कहा— 'प्रभो! भगवान् श्रीरामके अभिषेकके निमित्त जल लानेके लिये आप अपने दूतोंको आज्ञा दीजिये'॥ ४८ ॥
तब सुग्रीवने उसी समय चार श्रेष्ठ वानरोंको सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित चार सोनेके घड़े देकर कहा—
'वानरो! तुमलोग कल प्रातःकाल ही चारों समुद्रोंके जलसे भरे हुए घड़ोंके साथ उपस्थित रहकर आवश्यक आदेशकी प्रतीक्षा करो'॥ ५० ॥
सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर हाथीके समान विशालकाय महामनस्वी वानर, जो गरुड़के समान शीघ्रगामी थे, तत्काल आकाशमें उड़ चले॥ ५१ ॥
जाम्बवान्, हनुमान्, वेगदर्शी (गवय) और ऋषभ— ये सभी वानर चारों समुद्रोंसे और पाँच सौ नदियोंसे भी सोनेके बहुत-से कलश भर लाये॥ ५२ १/२ ॥
जिनके पास रीछोंकी बहुत-सी सुन्दर सेना है वे शक्तिशाली जाम्बवान् सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सुवर्णमय कलश लेकर गये और उसमें पूर्वसमुद्रका जल भरकर ले आये॥ ५३ १/२ ॥
ऋषभ दक्षिण समुद्रसे शीघ्र ही एक सोनेका घड़ा भर लाये। वह लाल चन्दन और कपूरसे ढका हुआ था॥ ५४ १/२ ॥
वायुके समान वेगशाली गवय एक रत्ननिर्मित विशाल कलशके द्वारा पश्चिम दिशाके महासागरसे शीतल जल भर लाये॥ ५५ १/२ ॥
गरुड़ तथा वायुके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले, धर्मात्मा सर्वगुणसम्पन्न पवनपुत्र हनुमान्जी भी उत्तरवर्ती महासागरसे शीघ्र जल ले आये॥ ५६ १/२ ॥
उन श्रेष्ठ वानरोंके द्वारा लाये हुए उस जलको देखकर मन्त्रियोंसहित शत्रुघ्नने वह सारा जल श्रीरामजीके अभिषेकके लिये पुरोहित वसिष्ठजी तथा अन्य सुहृदोंको समर्पित कर दिया॥ ५७-५८ ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंसहित शुद्धचेता वृद्ध वसिष्ठजीने सीतासहित श्रीरामचन्द्रजीको रत्नमयी चौकीपर बैठाया॥ ५९ ॥
तत्पश्चात् जैसे आठ वसुओंने देवराज इन्द्रका अभिषेक कराया था, उसी प्रकार वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम और विजय—इन आठ मन्त्रियोंने स्वच्छ एवं सुगन्धित जलके द्वारा सीतासहित पुरुषप्रवर श्रीरामचन्द्रजीका अभिषेक कराया॥ ६०-६१॥
(किनके द्वारा कराया? यह बताते हैं—) सबसे पहले उन्होंने सम्पूर्ण ओषधियोंके रसों तथा पूर्वोक्त जलसे ऋत्विज् ब्राह्मणोंद्वारा, फिर सोलह कन्याओंद्वारा तत्पश्चात् मन्त्रियोंद्वारा अभिषेक करवाया। इसके बाद अन्यान्य योद्धाओं और हर्षसे भरे हुए श्रेष्ठ व्यवसायियोंको भी अभिषेकका अवसर दिया। उस समय आकाशमें खड़े हुए समस्त देवताओं और एकत्र हुए चारों लोकपालोंने भी भगवान् श्रीरामका अभिषेक किया॥ ६२-६३॥
तदनन्तर ब्रह्माजीका बनाया हुआ रत्नशोभित एवं दिव्य तेजसे देदीप्यमान किरीट, जिसके द्वारा पहले-पहल मनुजीका और फिर क्रमशः उनके सभी वंशधर राजाओंका अभिषेक हुआ था, भाँति-भाँतिके रत्नोंसे चित्रित, सुवर्णनिर्मित एवं महान् वैभवसे शोभायमान सभाभवनमें अनेक रत्नोंसे बनी हुई चौकीपर विधिपूर्वक रखा गया। फिर महात्मा वसिष्ठजीने अन्य ऋत्विज् ब्राह्मणोंके साथ उस किरीटसे और अन्यान्य आभूषणोंसे भी श्रीरघुनाथजीको विभूषित किया॥ ६४—६७॥
उस समय शत्रुघ्नजीने उनपर सुन्दर श्वेत रंगका छत्र लगाया। एक ओर वानरराज सुग्रीवने श्वेत चँवर हाथमें लिया तो दूसरी ओर राक्षसराज विभीषणने चन्द्रमाके समान चमकीला चँवर लेकर डुलाना आरम्भ किया॥
उस अवसरपर देवराज इन्द्रकी प्रेरणासे वायुदेवने सौ सुवर्णमय कमलोंसे बनी हुई एक दीप्तिमती माला और सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त मणियोंसे विभूषित मुक्ताहार राजा रामचन्द्रजीको भेंट किया॥ ६९-७० १/२॥
बुद्धिमान् श्रीरामके अभिषेककालमें देवगन्धर्व गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। भगवान् श्रीराम इस सम्मानके सर्वथा योग्य थे॥ ७१ १/२॥
श्रीरघुनाथजीके राज्याभिषेकोत्सवके समय पृथ्वी खेतीसे हरी-भरी हो गयी, वृक्षोंमें फल आ गये और फूलोंमें सुगन्ध छा गयी॥ ७२ १/२॥
महाराज श्रीरामने उस समय पहले ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े, उतनी ही दूध देनेवाली गौएँ तथा सौ साँड़ दान किये। यही नहीं, श्रीरघुनाथजीने तीस करोड़ अशर्फियाँ तथा नाना प्रकारके बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र भी ब्राह्मणोंको बाँटे॥ ७३-७४ १/२॥
तत्पश्चात् राजा श्रीरामने अपने मित्र सुग्रीवको सोनेकी एक दिव्य माला भेंट की, जो सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित हो रही थी। उसमें बहुत-सी मणियोंका संयोग था॥ ७५ १/२ ॥
इसके बाद धैर्यशाली श्रीरघुवीरने प्रसन्न हो वालिपुत्र अङ्गदको दो अङ्गद (बाजूबन्द) भेंट किये, जो नीलमसे जटित होनेके कारण विचित्र दिखायी देते थे। वे चन्द्रमाकी किरणोंसे विभूषित-से जान पड़ते थे॥ ७६ १/२ ॥
उत्तम मणियोंसे युक्त उस परम उत्तम मुक्ताहारको (जिसे वायुदेवताने भेंट किया था तथा) जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशित होता था श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके गलेमें डाल दिया। साथ ही उन्हें कभी मैले न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र तथा और भी बहुत-से सुन्दर आभूषण अर्पित किये॥ ७७-७८ ॥
विदेहनन्दिनी सीताने पतिकी ओर देखकर वायुपुत्र हनुमान्को कुछ भेंट देनेका विचार किया। वे जनकनन्दिनी अपने गलेसे उस मुक्ताहारको निकालकर बारम्बार समस्त वानरों तथा पतिकी ओर देखने लगीं॥ ७९ १/२ ॥
उनकी उस चेष्टाको समझकर श्रीरामचन्द्रजीने जानकीजीकी ओर देखकर कहा— 'सौभाग्यशालिनि! भामिनि! तुम जिसपर संतुष्ट हो, उसे यह हार दे दो'॥
तब कजरारे नेत्रोंवाली माता सीताने वायुपुत्र हनुमान्को, जिनमें तेज, धृति, यश, चतुरता, शक्ति, विनय, नीति, पुरुषार्थ, पराक्रम और उत्तम बुद्धि—ये सद्गुण सदा विद्यमान रहते हैं, वह हार दे दिया॥ ८१-८२ ॥
उस हारसे कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसी तरह शोभा पाने लगे, जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके समूह-सदृश श्वेत बादलोंकी मालासे कोऽइ पर्वत सुशोभित हो रहा हो॥ ८३ ॥
इसी प्रकार जो प्रधान-प्रधान एवं श्रेष्ठ वानर थे, उन सबका वस्त्रों और आभूषणोंद्वारा यथायोग्य सत्कार किया गया॥ ८४ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने विभीषण, सुग्रीव, हनुमान् तथा जाम्बवान् आदि सभी श्रेष्ठ वानरवीरोंका मनोवाञ्छित वस्तुओं एवं प्रचुर रत्नोंद्वारा यथायोग्य सत्कार किया। वे सब-के-सब प्रसन्नचित्त होकर जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ८५-८६ ॥
तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा श्रीरघुनाथजीने द्विविद, मैन्द और नीलकी ओर देखकर उन सबको मनोवाञ्छापूरक गुणोंसे युक्त सब प्रकारके उत्तम रत्न आदि भेंट किये॥ ८७ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीरामका राज्याभिषेक देखकर सभी महामनस्वी श्रेष्ठ वानर महाराज श्रीरामसे विदा ले किष्किन्धाको चले गये॥ ८८ ॥
वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने भी श्रीरामके राज्याभिषेकका उत्सव देखकर उनसे पूजित हो किष्किन्धापुरीमें प्रवेश किया॥ ८९ ॥
महायशस्वी धर्मात्मा विभीषण भी अपने कुलका वैभव—अपना राज्य पाकर अपने साथी श्रेष्ठ निशाचरोंके साथ लङ्कापुरीको चले गये॥ ९० ॥
अपने शत्रुओंका वध करके परम उदार महायशस्वी श्रीरघुनाथजी बड़े आनन्दसे समस्त राज्यका शासन करने लगे। उन धर्मवत्सल श्रीरामने धर्मज्ञ लक्ष्मणसे कहा—॥
‘धर्मज्ञ लक्ष्मण! पूर्ववर्ती राजाओंने चतुरङ्गिणी सेनाके साथ जिसका पालन किया था, उसी इस भूमण्डलके राज्यपर तुम मेरे साथ प्रतिष्ठित होओ। अपने पिता, पितामह और प्रपितामहोंने जिस राज्यभारको पहले धारण किया था, उसीको मेरे ही समान तुम भी युवराज-पदपर स्थित होकर धारण करो’॥ ९२ ॥
परंतु श्रीरामचन्द्रजीके सब तरहसे समझाने और नियुक्त किये जानेपर भी जब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस पदको नहीं स्वीकार किया, तब महात्मा श्रीरामने भरतको युवराज-पदपर अभिषिक्त किया॥ ९३ ॥
राजकुमार महाराज श्रीरामने अनेक बार पौण्डरीक, अश्वमेध, वाजपेय तथा अन्य नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया॥ ९४ ॥
श्रीरघुनाथजीने राज्य पाकर ग्यारह* सहस्र वर्षोंतक उसका पालन और सौ अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उन यज्ञोंमें उत्तम अश्व छोड़े गये थे तथा ऋत्विजोंको बहुत अधिक दक्षिणाएँ बाँटी गयी थीं॥
उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लम्बी थीं। उनका वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत था। वे बड़े प्रतापी नरेश थे। लक्ष्मणको साथ लेकर श्रीरामने इस पृथ्वीका शासन किया॥ ९६ ॥
अयोध्याके परम उत्तम राज्यको पाकर धर्मात्मा श्रीरामने सुहृदों, कुटुम्बीजनों तथा भाई-बन्धुओंके साथ अनेक प्रकारके यज्ञ किये॥ ९७ ॥
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी विधवाओंका विलाप नहीं सुनायी पड़ता था। सर्प आदि दुष्ट जन्तुओंका भय नहीं था और रोगोंकी भी आशङ्का नहीं थी॥ ९८ ॥
सम्पूर्ण जगत्में कहीं चोरों या लुटेरोंका नाम भी नहीं सुना जाता था। कोई भी मनुष्य अनर्थकारी कार्योंमें हाथ नहीं डालता था और बूढ़ोंको बालकोंके अन्त्येष्टि-संस्कार नहीं करने पड़ते थे॥ ९९ ॥
सब लोग सदा प्रसन्न ही रहते थे। सभी धर्मपरायण थे और श्रीरामपर ही बारंबार दृष्टि रखते हुए वे कभी एक-दूसरेको कष्ट नहीं पहुँचाते थे॥ १०० ॥
श्रीरामके राज्य-शासन करते समय लोग सहस्रों वर्षोंतक जीवित रहते थे, सहस्रों पुत्रोंके जनक होते थे और उन्हें किसी प्रकारका रोग या शोक नहीं होता था॥ १०१ ॥
श्रीरामके राज्य-शासनकालमें प्रजावर्गके भीतर केवल राम, राम, रामकी ही चर्चा होती थी। सारा जगत् श्रीराममय हो रहा था॥ १०२ ॥
श्रीरामके राज्यमें वृक्षोंकी जड़ें सदा मजबूत रहती थीं। वे वृक्ष सदा फूलों और फलोंसे लदे रहते थे। मेघ प्रजाकी इच्छा और आवश्यकताके अनुसार ही वर्षा करते थे। वायु मन्द गतिसे चलती थी, जिससे उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था॥ १०३ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णोंके लोग लोभरहित होते थे। सबको अपने ही वर्णाश्रमोचित कर्मोंसे संतोष था और सभी उन्हींके पालनमें लगे रहते थे॥ १०४ ॥
श्रीरामके शासनकालमें सारी प्रजा धर्ममें तत्पर रहती थी। झूठ नहीं बोलती थी। सब लोग उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे और सबने धर्मका आश्रय ले रखा था॥ १०५ ॥
भाइयोंसहित श्रीमान् रामने ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था॥ १०६ ॥
यह ऋषिप्रोक्त आदिकाव्य रामायण है, जिसे पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिने बनाया था। यह धर्म, यश तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला एवं राजाओंको विजय देनेवाला है॥ १०७ ॥
संसारमें जो मानव सदा इसका श्रवण करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। श्रीरामके राज्याभिषेकके प्रसंगको सुनकर मनुष्य इस जगत्में यदि पुत्रका इच्छुक हो तो पुत्र और धनका
अभिलाषी हो तो धन पाता है। राजा इस काव्यका श्रवण करनेसे पृथ्वीपर विजय पाता और शत्रुओंको अपने अधीन कर लेता है॥ १०८-१०९ ॥
जैसे माता कौसल्या श्रीरामको, सुमित्रा लक्ष्मणको और कैकेयी भरतको पाकर जीवित पुत्रोंकी माता कहलायीं, उसी प्रकार संसारकी दूसरी स्त्रियाँ भी इस आदिकाव्यके पाठ और श्रवणसे जीवित पुत्रोंकी जननी, सदा आनन्दमग्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगी॥ ११० १/२ ॥
क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामकी विजय-कथारूप इस सम्पूर्ण रामायण-काव्यको सुनकर मनुष्य दीर्घकालतक स्थिर रहनेवाली आयु पाता है॥ १११ १/२ ॥
पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिने जिसकी रचना की थी, वही यह आदिकाव्य है। जो क्रोधको जीतकर श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह बड़े-बड़े संकटोंसे पार हो जाता है॥ ११२ १/२ ॥
जो लोग पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकिद्वारा निर्मित इस काव्यको सुनते हैं, वे परदेशसे लौटकर अपने भांऽइ-बन्धुओंके साथ मिलते और आनन्दका अनुभव करते हैं। वे इस जगतमें श्रीरघुनाथजीसे समस्त मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त कर लेते हैं॥ ११३-११४ ॥
इसके श्रवणसे समस्त देवता श्रोताओंपर प्रसन्न होते हैं तथा जिसके घरमें विघ्नकारी ग्रह होते हैं, उसके वे सारे ग्रह शान्त हो जाते हैं॥ ११५ ॥
राजा इसके श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता है। परदेशमें निवास करनेवाला पुरुष सकुशल रहता और रजस्वला स्त्रियाँ (स्नानके अनन्तर सोलह दिनोंके भीतर) इसे सुनकर श्रेष्ठ पुत्रोंको जन्म देती हैं॥ ११६ ॥
जो इस प्राचीन इतिहासका पूजन और पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और बड़ी आयु पाता है॥
क्षत्रियोंको चाहिये कि वे प्रतिदिन मस्तक झुकाकर प्रणाम करके ब्राह्मणके मुखसे इस ग्रन्थका श्रवण करें। इससे उन्हें ऐश्वर्य और पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है॥ ११८ ॥
जो नित्य इस सम्पूर्ण रामायणका श्रवण एवं पाठ करता है, उसपर सनातन विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीराम सदा प्रसन्न रहते हैं॥ ११९ ॥
साक्षात् आदिदेव महाबाहु पापहारी प्रभु नारायण ही रघुकुलतिलक श्रीराम हैं तथा भगवान् शेष ही लक्ष्मण कहलाते हैं॥ १२० ॥
(लवकुश कहते हैं—) श्रोताओ! आपलोगोंका कल्याण हो। यह पूर्वघटित आख्यान ही इस प्रकार रामायणकाव्यके रूपमें वर्णित हुआ है। आपलोग पूर्ण विश्वासके साथ इसका पाठ करें। इससे आपके वैष्णवबलकी वृद्धि होगी॥ १२१ ॥
रामायणको हृदयमें धारण करने और सुननेसे सब देवता संतुष्ट होते हैं। इसके श्रवणसे पितरोंको भी सदा तृप्ति मिलती है॥ १२२ ॥
जो लोग श्रीरामचन्द्रजीमें भक्तिभाव रखकर महर्षि वाल्मीकिनिर्मित इस रामायण-संहिताको लिखते हैं, उनका स्वर्गमें निवास होता है॥ १२३ ॥
इस शुभ और गम्भीर अर्थसे युक्त काव्यको सुनकर मनुष्यके कुटुम्ब और धन-धान्यकी वृद्धि होती है। उसे श्रेष्ठ गुणवाली सुन्दरी स्त्रियाँ सुलभ होती हैं तथा इस भूतलपर वह अपने सारे मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है॥ १२४ ॥
यह काव्य आयु, आरोग्य, यश तथा भ्रातृप्रेमको बढ़ानेवाला है। यह उत्तम बुद्धि प्रदान करनेवाला और मङ्गलकारी है; अतः समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको इस उत्साहवर्द्धक इतिहासका नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ अट्ठाइसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२८ ॥
* अन्यत्र ‘दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च’ कहा गया है, उनसे एक वाक्यताके लिये यहाँ दसको ग्यारहका बोधक समझना चाहिये।