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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ चारवाँ सर्ग

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एक सौ चारवाँ सर्ग

कालका श्रीरामचन्द्रजीको ब्रह्माजीका संदेश सुनाना और श्रीरामका उसे स्वीकार करना

महाबली महान् सत्त्वशाली महाराज! पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस उद्देश्यसे मुझे यहाँ भेजा है और जिसके लिये मैं यहाँ आया हूँ; वह सब बताता हूँ; सुनिये॥ १ ॥

शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले वीर! पूर्वावस्थामें अर्थात् हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिके समय मैं मायाद्वारा आपसे उत्पन्न हुआ था, इसलिये आपका पुत्र हूँ। मुझे सर्वसंहारकारी काल कहते हैं॥ २ ॥

लोकनाथ प्रभु भगवान् पितामहने कहा है कि ‘सौम्य! आपने लोकोंकी रक्षाके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, वह पूरी हो गयी॥ ३ ॥

‘पूर्वकालमें समस्त लोकोंको मायाके द्वारा स्वयं ही अपनेमें लीन करके आपने महासमुद्रके जलमें शयन किया था। फिर इस सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया ॥ ४ ॥

‘इसके बाद विशाल फण और शरीरसे युक्त एवं जलमें शयन करनेवाले ‘अनन्त’ संज्ञक नागको मायाद्वारा प्रकट करके आपने दो महाबली जीवोंको जन्म दिया, जिनका नाम था मधु और कैटभ; इन्हींके अस्थि-समूहोंसे भरी हुई यह पर्वतोंसहित पृथिवी तत्काल प्रकट हुई, जो ‘मेदिनी’ कहलायी॥ ५-६ ॥

‘आपकी नाभिसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिसमें आपने मुझको भी उत्पन्न किया और प्रजाकी सृष्टि रचनेका सारा कार्यभार मुझपर ही रख दिया॥ ७ ॥

‘जब मुझपर यह भार रख दिया गया, तब मैंने आप जगदीश्वरकी उपासना करके प्रार्थना की— ‘प्रभो! आप सम्पूर्ण भूतोंमें रहकर उनकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप ही मुझे तेज (ज्ञान और क्रिया-शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं’॥ ८ ॥

‘तब आप मेरा अनुरोध स्वीकार करके प्राणियोंकी रक्षाके लिये अपरिमेय सनातन पुरुषरूपसे जगतपालक विष्णुके रूपमें प्रकट हुए॥ ९ ॥

‘फिर आपने ही अदितिके गर्भसे परम पराक्रमी वामनरूपमें अवतार लिया। तबसे आप अपने भाई इन्द्रादि देवताओंकी शक्ति बढ़ाते और आवश्यकता पड़नेपर उनकी रक्षाके लिये उद्यत रहते हैं॥ १० ॥

‘जगदीश्वर! जब रावणके द्वारा प्रजाका विनाश होने लगा, उस समय आपने उस निशाचरका वध करनेकी इच्छासे मनुष्य-शरीरमें अवतार लेनेका निश्चय किया॥ ११ ॥

‘और स्वयं ही ग्यारह हजार वर्षोंतक मर्त्यलोकमें निवास करनेकी अवधि निश्चित की थी॥ १२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप मनुष्य-लोकमें अपने संकल्पसे ही किसीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं। इस अवतारमें आपने अपनी जितने समयतककी आयु निश्चित की थी, वह पूरी हो गयी; अतः अब आपके लिये यह हमलोगोंके समीप आनेका समय है॥ १३ ॥

‘वीर महाराज! यदि और अधिक कालतक यहाँ रहकर प्रजाजनोंका पालन करनेकी इच्छा हो तो आप रह सकते हैं। आपका कल्याण हो। रघुनन्दन! अथवा यदि परमधाममें पधारनेका विचार हो तो अवश्य आवें। आप विष्णुदेवके स्वधाममें प्रतिष्ठित होनेपर सम्पूर्ण देवता सनाथ एवं निश्चिन्त हो जायँ— ऐसा पितामहने कहा है’॥ १४-१५ ॥

कालके मुखसे कहे गये पितामह ब्रह्माके संदेशको सुनकर श्रीरघुनाथजी हँसते हुए उस सर्वसंहारी कालसे बोले—॥ १६ ॥

‘काल! देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह परम अद्भुत वचन सुननेको मिला; इसलिये तुम्हारे आनेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १७ ॥

‘तीनों लोकोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ही मेरा यह अवतार हुआ था, वह उद्देश्य अब पूरा हो गया; इसलिये तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं जहाँसे आया था वहीं चलूँगा॥ १८ ॥

‘काल! मैंने मनसे तुम्हारा चिन्तन किया था। उसीके अनुसार तुम यहाँ आये हो; अतः इस विषयको लेकर मेरे मनमें कोई विचार नहीं है। सर्वसंहारकारी काल! मुझे सभी कार्योंमें सदा देवताओंका वशवर्ती होकर ही रहना चाहिये, जैसा कि पितामहका कथन है’॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०४ ॥