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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उनसठवाँ सर्ग

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उनसठवाँ सर्ग

सम्पातिका अपने पुत्र सुपार्श्वके मुखसे सुनी हुई सीता और रावणको देखनेकी घटनाका वृत्तान्त बताना

उस समय वार्तालाप करते हुए गृध्रराजके द्वारा कहे गये उस अमृतके समान स्वादिष्ट मधुर वचनको सुनकर सब वानरश्रेष्ठ हर्षसे खिल उठे॥ १ ॥

वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान् सब वानरोंके साथ सहसा भूतलसे उठकर खड़े हो गये और गृध्रराजसे इस प्रकार पूछने लगे— ॥ २ ॥

‘पक्षिराज! सीता कहाँ हैं? किसने उन्हें देखा है? और कौन उन मिथिलेशकुमारीको हरकर ले गया है? ये सब बातें बताइये और हम सब वनवासी वानरोंके आश्रयदाता होइये॥ ३ ॥

‘कौन ऐसा धृष्ट है, जो वज्रके समान वेगपूर्वक चोट करनेवाले दशरथनन्दन श्रीरामके बाणों तथा स्वयं लक्ष्मणके चलाये हुए सायकोंके पराक्रमको कुछ नहीं समझता है?’ ॥ ४ ॥

उस समय उपवास छोड़कर बैठे और सीताजीका वृत्तान्त सुननेके लिये एकाग्र हुए वानरोंको प्रसन्नता-पूर्वक पुनः आश्वासन देते हुए सम्पातिने उनसे यह बात कही— ॥ ५ ॥

‘वानरो! विदेहकुमारी सीताका जिस प्रकार अपहरण हुआ है, विशाललोचना सीता इस समय जहाँ है और जिसने मुझसे यह सब वृत्तान्त कहा है एवं जिस तरह मैंने सुना है, वह सब बताता हूँ, सुनो— ॥ ६ ॥

‘यह दुर्गम पर्वत कई योजनोंतक फैला है। दीर्घकाल हुआ, जब मैं इस पर्वतपर गिरा था। मेरी प्राणशक्ति क्षीण हो गयी थी और मैं वृद्ध था॥ ७ ॥

‘इस अवस्थामें मेरा पुत्र पक्षिप्रवर सुपार्श्व ही यथासमय आहार देकर प्रतिदिन मेरा भरण-पोषण करता है॥ ८ ॥

‘जैसे गन्धर्वोंका कामभाव तीव्र होता है, सर्पोंका क्रोध तेज होता है और मृगोंको भय अधिक होता है, उसी प्रकार हमारी जातिके लोगोंकी भूख बड़ी तीव्र होती है॥ ९ ॥

‘एक दिनकी बात है मैं भूखसे पीड़ित होकर आहार प्राप्त करना चाहता था। मेरा पुत्र मेरे लिये भोजनकी तलाशमें निकला था, किंतु सूर्यास्त होनेके बाद वह खाली हाथ लौट आया, उसे कहीं मांस नहीं मिला॥ १० ॥

‘भोजन न मिलनेसे मैंने कठोर बातें सुनाकर अपनी प्रीति बढ़ानेवाले उस पुत्रको बहुत पीड़ा दी, किंतु उसने नम्रतापूर्वक मुझे आदर देते हुए यह यथार्थ बात कही— ॥ ११ ॥

‘तात! मैं यथासमय मांस प्राप्त करनेकी इच्छासे आकाशमें उड़ा और महेन्द्र पर्वतके द्वारको रोककर खड़ा हो गया॥ १२ ॥

‘वहाँ अपनी चोंच नीची करके मैं समुद्रके भीतर विचरनेवाले सहस्रों जन्तुओंके मार्गको रोकनेके लिये अकेला ठहर गया॥ १३ ॥

‘उस समय मैंने देखा खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेकी राशिके समान काला कोई पुरुष एक स्त्रीको लेकर जा रहा है। उस स्त्रीकी कान्ति सूर्योदयकालकी प्रभाके समान प्रकाशित हो रही थी॥ १४ ॥

‘उस स्त्री और उस पुरुषको देखकर मैंने उन्हें आपके आहारके लिये लानेका निश्चय किया, किंतु उस पुरुषने नम्रतापूर्वक मधुर वाणीमें मुझसे मार्गकी याचना की॥ १५ ॥

‘पिताजी! भूतलपर नीच पुरुषोंमें भी कोई ऐसा नहीं है, जो विनयपूर्वक मीठे वचन बोलनेवालोंपर प्रहार करे। फिर मुझ-जैसा कुलीन पुरुष कैसे कर सकता है?॥ १६ ॥

‘फिर तो वह तेजसे आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा वेगपूर्वक चला गया। उसके चले जानेपर आकाशचारी प्राणी सिद्ध-चारण आदिने आकर मेरा बड़ा सम्मान किया॥ १७ ॥

‘वे महर्षि मुझसे बोले— ‘सौभाग्यकी बात है कि सीता जीवित हैं। तुम्हारी दृष्टि पड़नेपर भी स्त्रीके साथ आया हुआ वह पुरुष किसी तरह सकुशल बच गया; अतः अवश्य तुम्हारा कल्याण हो’॥ १८ ॥

‘उन परम शोभायमान सिद्ध पुरुषोंने मुझसे ऐसा कहा, तत्पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि ‘वह काला पुरुष राक्षसोंका राजा रावण था’॥ १९ ॥

‘तात! दशरथनन्दन श्रीरामकी पत्नी जनककिशोरी सीता शोकके वेगसे पराजित हो गयी थीं। उनके आभूषण गिर रहे थे और रेशमी वस्त्र भी सिरसे खिसक गया था। उनके केश खुले हुए थे और वे श्रीराम तथा लक्ष्मणका नाम ले-लेकर उन्हें पुकार रही थीं। मैं उनकी इस दयनीय दशाको देखता रह गया। यही मेरे विलम्बसे आनेका कारण है।’ इस प्रकार बातचीतकी कला जाननेवालोंमें श्रेष्ठ सुपार्श्वने मेरे सामने इन सारी बातोंका वर्णन किया। यह सब सुनकर भी मेरे हृदयमें पराक्रम कर दिखानेका कोई विचार नहीं उठा॥ २०—२२ ॥

‘बिना पंखका पक्षी कैसे कोर्इ पराक्रम कर सकता है? अपनी वाणी और बुद्धिके द्वारा साध्य जो उपकाररूप गुण है, उसे करना मेरा स्वभाव बन गया है। ऐसे स्वभावसे मैं जो कुछ कर सकता हूँ, वह कार्य तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। वह कार्य तुमलोगोंके पुरुषार्थसे ही सिद्ध होनेवाला है॥ २३१/२ ॥

‘मैं वाणी और बुद्धिके द्वारा तुम सब लोगोंका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा; क्योंकि दशरथनन्दन श्रीरामका जो कार्य है, वह मेरा ही है—इसमें संशय नहीं है॥ २४१/२ ॥

‘तुमलोग भी उत्तम बुद्धिसे युक्त, बलवान्, मनस्वी तथा देवताओंके लिये भी दुर्जय हो। इसीलिये वानरराज सुग्रीवने तुम्हें इस कार्यके लिये भेजा है॥ २५१/२ ॥

‘श्रीराम और लक्ष्मणके कङ्कपत्रसे युक्त जो बाण हैं, वे साक्षात् विधाताके बनाये हुए हैं। वे तीनों लोकोंका संरक्षण और दमन करनेके लिये पर्याप्त शक्ति रखते हैं॥

‘तुम्हारा विपक्षी दशग्रीव रावण भले ही तेजस्वी और बलवान् है, किंतु तुम-जैसे सामर्थ्यशाली वीरोंके लिये उसे परास्त करना आदि कोर्इ भी कार्य दुष्कर नहीं है॥ २७ ॥

‘अतः अब अधिक समय बितानेकी आवश्यकता नहीं है। अपनी बुद्धिके द्वारा दृढ़ निश्चय करके सीताके दर्शनके लिये उद्योग करो; क्योंकि तुम-जैसे बुद्धिमान् लोग कार्योंकी सिद्धिमें विलम्ब नहीं करते हैं’॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९ ॥