श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ चौबीसवाँ सर्ग
एक सौ चौबीसवाँ सर्ग
श्रीरामका भरद्वाज-आश्रमपर उतरकर महर्षिसे मिलना और उनसे वर पाना
श्रीरामचन्द्रजीने चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर पञ्चमी तिथिको भरद्वाज-आश्रममें पहुँचकर मनको वशमें रखते हुए मुनिको प्रणाम किया॥ १ ॥
तपस्याके धनी भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके श्रीरामने उनसे पूछा—‘भगवन्! आपने अयोध्यापुरीके विषयमें भी कुछ सुना है? वहाँ सुकाल और कुशल-मङ्गल तो है न? भरत प्रजापालनमें तत्पर रहते हैं न? मेरी माताएँ जीवित हैं न?’॥ २ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर महामुनि भरद्वाजने मुस्कराकर उन रघुश्रेष्ठ श्रीरामसे प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ३ ॥
‘रघुनन्दन! भरत आपकी आज्ञाके अधीन हैं। वे जटा बढ़ाये आपके आगमनकी प्रतीक्षा करते हैं। आपकी चरणपादुकाओंको सामने रखकर सारा कार्य करते हैं। आपके घरपर और नगरमें भी सब कुशल हैं॥ ४ ॥
‘पहले जब आप महान् वनकी यात्रा कर रहे थे, उस समय आपने चीरवस्त्र धारण कर रखा था और आप दोनों भाइयोंके साथ तीसरी केवल आपकी स्त्री थी। आप राज्यसे वञ्चित किये गये थे और केवल धर्मपालनकी इच्छा मनमें ले सर्वस्व त्यागकर पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये पैदल ही जा रहे थे। सारे भोगोंसे दूर हो स्वर्गसे भूतलपर गिरे हुए देवताके समान जान पड़ते थे। शत्रुविजयी वीर! आप कैकेयीके आदेशके पालनमें तत्पर हो जंगली फल-मूलका आहार करते थे, उस समय आपको देखकर मेरे मनमें बड़ी करुणा हुई थी॥ ५–७ ॥
‘परंतु इस समय तो सारी स्थिति ही बदल गयी है। आप शत्रुपर विजय पाकर सफलमनोरथ हो मित्रों तथा बान्धवोंके साथ लौट रहे हैं। इस रूपमें आपको देखकर मुझे बड़ा सुख मिला—मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई॥
‘रघुवीर! आपने जनस्थानमें रहकर जो विपुल सुख-दुःख उठाये हैं, वे सब मुझे मालूम हैं॥ ९ ॥
‘वहाँ रहकर आप ब्राह्मणोंके कार्यमें संलग्न हो समस्त तपस्वी मुनियोंकी रक्षा करते थे। उस समय रावण आपकी इन सती-साध्वी भार्याको हर ले गया॥
‘धर्मवत्सल! मारीचका कपटमृगके रूपमें दिखायी देना, सीताका बलपूर्वक अपहरण होना, इनकी खोज करते समय आपके मार्गमें कबन्धका मिलना, आपका पम्पासरोवरके तटपर जाना, सुग्रीवके साथ आपकी मैत्रीका होना, आपके हाथसे वालीका मारा जाना, सीताकी खोज, पवनपुत्र हनुमान्का अद्भुत कर्म, सीताका पता लग जानेपर नलके द्वारा समुद्रपर सेतुका निर्माण, हर्ष और उत्साहसे भरे हुए वानर-यूथपतियोंद्वारा लङ्कापुरीका दहन, पुत्र, बन्धु, मन्त्री, सेना और सवारियोंसहित बलाभिमानी रावणका आपके द्वारा युद्धमें वध होना, उस देवकण्टक रावणके मारे जानेपर देवताओंके साथ आपका समागम होना तथा उनका आपको वर देना— ये सारी बातें मुझे तपके प्रभावसे ज्ञात हैं॥ ११—१५ १/२ ॥
‘मेरे प्रवृत्ति नामक शिष्य यहाँसे अयोध्यापुरीको जाते रहते हैं (अतः मुझे वहाँका वृत्तान्त मालूम होता रहता है), शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! यहाँ मैं भी आपको एक वर देता हूँ (आपकी जो इच्छा हो, उसे माँग लें)। आज मेरा अर्घ्य और आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करें। कल सबेरे अयोध्याको जाइयेगा’॥ १६-१७ ॥
मुनिके उस वचनको शिरोधार्य करके हर्षसे भरे हुए श्रीमान् राजकुमार श्रीरामने कहा—‘बहुत अच्छा’। फिर उन्होंने उनसे यह वर माँगा—॥ १८ ॥
‘भगवन्! यहाँसे अयोध्या जाते समय मार्गके सब वृक्षोंमें समय न होनेपर भी फल उत्पन्न हो जायँ और वे सब-के-सब मधुकी धारा टपकानेवाले हों। उनमें नाना प्रकारके बहुत-से अमृतोपम सुगन्धित फल लग जायँ’॥ १९ १/२ ॥
भरद्वाजजीने कहा—‘ऐसा ही होगा’। उनके इस प्रकार प्रतिज्ञा करते ही—उनकी उस वाणीके निकलते ही तत्काल वहाँके सारे वृक्ष स्वर्गीय वृक्षोंके समान हो गये॥ २० १/२ ॥
जिनमें फल नहीं थे, उनमें फल आ गये। जिनमें फूल नहीं थे, वे फूलोंसे सुशोभित होने लगे। सूखे हुए वृक्षोंमें भी हरे-हरे पत्ते निकल आये और सभी वृक्ष मधुकी धारा बहाने लगे। अयोध्या जानेका जो मार्ग था, उसके आस-पास तीन योजनतकके वृक्ष ऐसे ही हो गये॥ २१-२२ ॥
फिर तो वे सहस्रों श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर स्वर्गवासी देवताओंके समान अपनी रुचिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक उन बहुसंख्यक दिव्य फलोंका आस्वादन करने लगे॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२४ ॥