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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तैंतीसवाँ सर्ग

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तैंतीसवाँ सर्ग

सरमाका सीताको सान्त्वना देना, रावणकी मायाका भेद खोलना, श्रीरामके आगमनका प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होनेका विश्वास दिलाना

विदेहनन्दिनी सीताको मोहमें पड़ी हुई देख सरमा नामकी राक्षसी उनके पास उसी तरह आयी, जैसे प्रेम रखनेवाली सखी अपनी प्यारी सखीके पास जाती है॥

सीता राक्षसराजकी मायासे मोहित हो बड़े दुःखमें पड़ गयी थीं। उस समय मृदुभाषिणी सरमाने उन्हें अपने वचनोंद्वारा सान्त्वना दी॥ २॥

सरमा रावणकी आज्ञासे सीताजीकी रक्षा करती थी। उसने अपनी रक्षणीया सीताके साथ मैत्री कर ली थी। वह बड़ी दयालु और दृढ-संकल्प थी॥ ३॥

सरमाने सखी सीताको देखा। उनकी चेतना नष्ट-सी हो रही थी। जैसे परिश्रमसे थकी हुई घोड़ी धरतीकी धूलमें लोटकर खड़ी हुई हो, उसी प्रकार सीता भी पृथ्वीपर लोटकर रोने और विलाप करनेके कारण धूलिधूसरित हो रही थीं॥ ४॥

उसने एक सखीके स्नेहसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीताको आश्वासन दिया—‘विदेहनन्दिनी! धैर्य धारण करो। तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये। भीरु! रावणने तुमसे जो कुछ कहा है और स्वयं तुमने उसे जो उत्तर दिया है, वह सब मैंने सखीके प्रति स्नेह होनेके कारण सुन लिया है। विशाललोचने! तुम्हारे लिये मैं रावणका भय छोड़कर अशोकवाटिकामें सूने गहन स्थानमें छिपकर सारी बातें सुन रही थी। मुझे रावणसे कोई डर नहीं है॥ ५-६॥

‘मिथिलेशकुमारी! राक्षसराज रावण जिस कारण यहाँसे घबराकर निकल गया है, उसका भी मैं वहाँ जाकर पूर्णरूपसे पता लगा आयी हूँ॥ ७॥

‘भगवान् श्रीराम अपने स्वरूपको जाननेवाले सर्वज्ञ परमात्मा हैं। उनका सोते समय वध करना किसीके लिये भी सर्वथा असम्भव है। पुरुषसिंह श्रीरामके विषयमें इस तरह उनके वध होनेकी बात युक्तिसंगत नहीं जान पड़ती॥

‘वानरलोग वृक्षोंके द्वारा युद्ध करनेवाले हैं। उनका भी इस तरह मारा जाना कदापि सम्भव नहीं है; क्योंकि जैसे देवतालोग देवराज इन्द्रसे पालित होते हैं, उसी प्रकार ये वानर श्रीरामचन्द्रजीसे भलीभाँति सुरक्षित हैं॥

‘सीते! श्रीमान् राम गोलाकार बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित, चौड़ी छातीवाले, प्रतापी, धनुर्धर, सुगठित शरीरसे युक्त और भूमण्डलमें सुविख्यात धर्मात्मा हैं। उनमें महान् पराक्रम है। वे भार्इ लक्ष्मणकी सहायतासे अपनी तथा दूसरेकी भी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। नीतिशास्त्रके ज्ञाता और कुलीन हैं। उनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं। वे शत्रुपक्षके सैन्यसमूहोंका संहार करनेकी शक्ति रखते हैं। शत्रुसूदन श्रीराम कदापि मारे नहीं गये हैं॥ १०—१२ ॥

‘रावणकी बुद्धि और कर्म दोनों ही बुरे हैं। वह समस्त प्राणियोंका विरोधी, क्रूर और मायावी है। उसने तुमपर यह मायाका प्रयोग किया था (वह मस्तक और धनुष मायाद्वारा रचे गये थे)॥ १३ ॥

‘अब तुम्हारे शोकके दिन बीत गये। सब प्रकारसे कल्याणका अवसर उपस्थित हुआ है। निश्चय ही लक्ष्मी तुम्हारा सेवन करती हैं। तुम्हारा प्रिय कार्य होने जा रहा है। उसे बताती हूँ, सुनो॥ १४ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी वानरसेनाके साथ समुद्रको लाँघकर इस पार आ रहे हैं। उन्होंने सागरके दक्षिणतटपर पड़ाव डाला है॥ १५ ॥

‘मैंने स्वयं लक्ष्मणसहित पूर्णकाम श्रीरामका दर्शन किया है। वे समुद्रतटपर ठहरी हुर्इ अपनी संगठित सेनाओंद्वारा सर्वथा सुरक्षित हैं॥ १६ ॥

‘रावणने जो-जो शीघ्रगामी राक्षस भेजे थे, वे सब यहाँ यही समाचार लाये हैं कि ‘श्रीरघुनाथजी समुद्रको पार करके आ गये’॥ १७ ॥

‘विशाललोचने! इस समाचारको सुनकर यह राक्षसराज रावण अपने सभी मन्त्रियोंके साथ गुप्त परामर्श कर रहा है’॥ १८ ॥

जब राक्षसी सरमा सीतासे ये बातें कह रही थी, उसी समय उसने युद्धके लिये पूर्णतः उद्योगशील सैनिकोंका भैरव नाद सुना॥ १९ ॥

डंडेकी चोटसे बजनेवाले धौंसेका गम्भीर नाद सुनकर मधुरभाषिणी सरमाने सीतासे कहा—॥ २० ॥

‘भीरु! यह भयानक भेरीनाद युद्धके लिये तैयारीकी सूचना दे रहा है। मेघकी गर्जनाके समान रणभेरीका गम्भीर घोष तुम भी सुन लो॥ २१ ॥

‘मतवाले हाथी सजाये जा रहे हैं। रथमें घोड़े जोते जा रहे हैं और हजारों घुड़सवार हाथमें भाला लिये दृष्टिगोचर हो रहे हैं॥ २२ ॥

‘जहाँ-तहाँसे युद्धके लिये संनद्ध हुए सहस्रों सैनिक दौड़े चले आ रहे हैं। सारी सड़कें अद्भुत वेषमें सजे और बड़े वेगसे गर्जना करते हुए सैनिकोंसे उसी तरह भरती जा रही हैं जैसे जलके असंख्य प्रवाह सागरमें मिल रहे हों॥ २३ १/२ ॥

‘नाना प्रकारकी प्रभा बिखेरनेवाले चमचमाते हुए अस्त्र-शस्त्रों, ढालों और कवचोंकी वह चमक देखो। राक्षसराज रावणका अनुगमन करनेवाले रथों, घोड़ों, हाथियों तथा रोमाञ्चित हुए वेगशाली राक्षसोंमें इस समय यह बड़ी हड़बड़ी दिखायी देती है। ग्रीष्म ऋतुमें वनको जलाते हुए दावानलका जैसा जाज्वल्यमान रूप होता है, वैसी ही प्रभा इन अस्त्र-शस्त्र आदिकी दिखायी देती है॥ २४—२६ ॥

‘हाथियोंपर बजते हुए घण्टोंका गम्भीर घोष सुनो, रथोंकी घर्घराहट सुनो और हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भाँति-भाँतिके बाजोंकी आवाज भी सुन लो॥ २७ ॥

‘हाथोंमें हथियार लिये रावणके अनुगामी राक्षसोंमें इस समय बड़ी घबराहट है। इससे यह जान लो कि उनपर कोऽइ बड़ा भारी रोमाञ्चकारी भय उपस्थित हुआ है और शोकका निवारण करनेवाली लक्ष्मी तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो रही है॥ २८ १/२ ॥

‘तुम्हारे पति कमलनयन श्रीराम क्रोधको जीत चुके हैं। उनका पराक्रम अचिन्त्य है। वे दैत्योंको परास्त करनेवाले इन्द्रकी भाँति राक्षसोंको हराकर समराङ्गणमें रावणका वध करके तुम्हें प्राप्त कर लेंगे॥ २९-३० ॥

‘जैसे शत्रुसूदन इन्द्रने उपेन्द्रकी सहायतासे शत्रुओंपर पराक्रम प्रकट किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पतिदेव श्रीराम अपने भाऽइ लक्ष्मणके सहयोगसे राक्षसोंपर अपने बलविक्रमका प्रदर्शन करेंगे॥ ३१ ॥

‘शत्रु रावणका संहार हो जानेपर मैं शीघ्र ही तुम-जैसी सतीसाध्वीको यहाँ पधारे हुए श्रीरघुनाथजीकी गोदमें समोद बैठी देखूँगी। अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा॥ ३२ ॥

‘जनकनन्दिनि! विशाल वक्षःस्थलसे विभूषित श्रीरामके मिलनेपर उनकी छातीसे लगकर तुम शीघ्र ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाओगी॥ ३३ ॥

‘देवि सीते! कर्ड महीनोंसे तुम्हारे केशोंकी एक ही वेणी जटाके रूपमें परिणत हो जो कटिप्रदेशतक लटक रही है, उसे महाबली श्रीराम शीघ्र ही अपने हाथोंसे खोलेंगे॥ ३४ ॥

‘देवि! जैसे नागिन केंचुल छोड़ती है, उसी प्रकार तुम उदित हुए पूर्णचन्द्रके समान अपने पतिका मुदित मुख देखकर शोकके आँसू बहाना छोड़ दोगी॥ ३५ ॥

‘मिथिलेशकुमारी! समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके सुख भोगनेके योग्य श्रीराम सफलमनोरथ हो तुझ प्रियतमाके साथ मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करेंगे॥

‘जैसे पृथ्वी उत्तम वर्षासे अभिषिक्त होनेपर हरीभर ी खेतीसे लहलहा उठती है, उसी प्रकार तुम महात्मा श्रीरामसे सम्मानित हो आनन्दमग्न हो जाओगी॥ ३७ ॥

‘देवि! जो गिरिवर मेरुके चारों ओर घूमते हुए अश्वकी भाँति शीघ्रतापूर्वक मण्डलाकार-गतिसे चलते हैं, उन्हीं भगवान् सूर्यकी (जो तुम्हारे कुलके देवता हैं) तुम यहाँ शरण लो; क्योंकि ये प्रजाजनोंको सुख देने तथा उनका दुःख दूर करनेमें समर्थ हैं’॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३ ॥