सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

निन्यानबेवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

निन्यानबेवाँ सर्ग

सीताके रसातल-प्रवेशके पश्चात् श्रीरामकी जीवनचर्या, रामराज्यकी स्थिति तथा माताओंके परलोक-गमन आदिका वर्णन

रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने बड़े-बड़े मुनियोंको बुलाकर अपने दोनों पुत्रोंसे कहा— 'अब तुम निःशङ्क होकर शेष रामायणका गान आरम्भ करो'॥ १ ॥

महात्मा महर्षियोंके यथास्थान बैठ जानेपर कुश और लवने भगवान्‌के भविष्य जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले उत्तरकाण्डका, जो उस महाकाव्यका एक अंश था, गान आरम्भ किया॥ २ ॥

इधर अपनी सत्यरूप सम्पत्तिके बलसे सीताजीके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर उस यज्ञके अन्तमें भगवान् श्रीरामका मन बहुत दुःखी हुआ॥ ३ ॥

विदेहकुमारीको न देखनेसे उन्हें यह सारा संसार सूना जान पड़ने लगा। शोकसे व्यथित होनेके कारण उनके मनको शान्ति नहीं मिली॥ ४ ॥

तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने सब राजाओंको, रीछों, वानरों और राक्षसोंको, जनसमुदायको तथा मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंको भी धन देकर बिदा किया। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञको समाप्त करके कमलनयन श्रीरामने सबको बिदा करनेके पश्चात् उस समय सीताका मन-ही-मन स्मरण करते हुए अयोध्यामें प्रवेश किया॥ ५-६ १/२ ॥

यज्ञ पूरा करके रघुकुलनन्दन राजा श्रीराम अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहने लगे। उन्होंने सीताके सिवा दूसरी किसी स्त्रीसे विवाह नहीं किया। प्रत्येक यज्ञमें जब-जब धर्मपत्नीकी आवश्यकता होती, श्रीरघुनाथजी सीताकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे॥ ७-८ ॥

उन्होंने दस हजार वर्षोंतक यज्ञ किये। कितने ही अश्वमेध यज्ञों और उनसे दसगुने वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिसमें असंख्य स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणाएँ दी गयी थीं॥ ९ ॥

श्रीमान् रामने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम, अतिरात्र, गोसव तथा अन्य बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिनमें अपार धनराशि खर्च की गयी॥ १० ॥

इस प्रकार राज्य करते हुए महात्मा भगवान् श्रीरघुनाथजीका बहुत बड़ा समय धर्मपालनके प्रयत्नमें ही बीता॥ ११ ॥

रीछ, वानर और राक्षस भी श्रीरामकी आज्ञाके अधीन रहते थे। भूमण्डलके सभी राजा प्रतिदिन श्रीरघुनाथजीको प्रसन्न रखते थे॥ १२ ॥

श्रीरामके राज्यमें मेघ समयपर वर्षा करते थे। सदा सुकाल ही रहता था—कभी अकाल नहीं पड़ता था। सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न दिखायी देती थीं तथा नगर और जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे रहते थे॥ १३ ॥

श्रीरामके राज्यशासन करते समय किसीकी अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। प्राणियोंको कोई रोग नहीं सताता था और संसारमें कोई उपद्रव खड़ा नहीं होता था॥ १४ ॥

इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर पुत्र-पौत्रोंसे घिरी हुईं परम यशस्विनी श्रीराममाता कौसल्या कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त हुईं॥ १५ ॥

सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीने भी उन्हींके पथका अनुसरण किया। ये सभी रानियाँ जीवनकालमें नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें साकेतधामको प्राप्त हुईं और बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ राजा दशरथसे मिलीं। उन महाभागा रानियोंको सब धर्मोंका पूरा-पूरा फल प्राप्त हुआ॥ १६-१७ ॥

श्रीरघुनाथजी समय-समयपर अपनी सभी माताओंके निमित्त बिना किसी भेदभावके तपस्वी ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिया करते थे॥ १८ ॥

धर्मात्मा श्रीराम श्राद्धमें उपयोगी उत्तमोत्तम वस्तुएँ ब्राह्मणोंको देते तथा पितरों और देवताओंको संतुष्ट करनेके लिये बड़े-बड़े दुस्तर यज्ञों (पिण्डात्मक पितृयज्ञों) का अनुष्ठान करते थे॥ १९ ॥

इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा सर्वदा विविध धर्मोंका पालन करते हुए श्रीरघुनाथजीके कई हजार वर्ष सुख-पूर्वक बीत गये॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९९ ॥