श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ सत्रहवाँ सर्ग
एक सौ सत्रहवाँ सर्ग
भगवान् श्रीरामके पास देवताओंका आगमन तथा ब्रह्माद्वारा उनकी भगवत्ताका प्रतिपादन एवं स्तवन
तदनन्तर धर्मात्मा श्रीराम हाहाकार करनेवाले वानर और राक्षसोंकी बातें सुनकर मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए और आँखोंमें आँसू भरकर दो घड़ीतक कुछ सोचते रहे॥ १ ॥
इसी समय विश्रवाके पुत्र यक्षराज कुबेर, पितरोंसहित यमराज, देवताओंके स्वामी सहस्र नेत्रधारी इन्द्र, जलके अधिपति वरुण, त्रिनेत्रधारी श्रीमान् वृषभध्वज महादेव तथा सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी— ये सब देवता सूर्यतुल्य विमानोंद्वारा लङ्कापुरीमें आकर श्रीरघुनाथजीके पास गये॥ २—४ ॥
भगवान् श्रीराम उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे। वे श्रेष्ठ देवता आभूषणोंसे अलंकृत अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर उनसे बोले—॥ ५ ॥
‘श्रीराम! आप सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और सर्वव्यापक हैं। फिर इस समय आगमें गिरी हुई सीताकी उपेक्षा कैसे कर रहे हैं? आप समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ विष्णु ही हैं। इस बातको कैसे नहीं समझ रहे हैं॥ ६ ॥
‘पूर्वकालमें वसुओंके प्रजापति जो ऋतधामा नामक वसु थे, वे आप ही हैं। आप तीनों लोकोंके आदिकर्ता स्वयं प्रभु हैं॥ ७ ॥
‘रुद्रोंमें आठवें रुद्र और साध्योंमें पाँचवें साध्य भी आप ही हैं। दो अश्विनीकुमार आपके कान हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं॥ ८ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें भी आप ही दिखायी देते हैं। फिर एक साधारण मनुष्यकी भाँति आप सीताकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?’॥ ९ ॥
उन लोकपालोंके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ लोकनाथ रघुनाथ श्रीरामने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—॥ १० ॥
‘देवगण! मैं तो अपनेको मनुष्य दशरथपुत्र राम ही समझता हूँ। भगवन्! मैं जो हूँ और जहाँसे आया हूँ, वह सब आप ही मुझे बताइये’॥ ११ ॥
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने उनसे इस प्रकार कहा—'सत्यपराक्रमी श्रीरघुवीर! आप मेरी सच्ची बात सुनिये॥ १२ ॥
'आप चक्र धारण करनेवाले सर्वसमर्थ श्रीमान् भगवान् नारायण देव हैं, एक दाढ़वाले पृथ्वीधारी वराह हैं तथा देवताओंके भूत एवं भावी शत्रुओंको जीतनेवाले हैं॥ १३ ॥
'रघुनन्दन! आप अविनाशी परब्रह्म हैं। सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें सत्यरूपसे विद्यमान हैं। आप ही लोकोंके परम धर्म हैं। आप ही विष्वक्सेन तथा चार भुजाधारी श्रीहरि हैं॥ १४ ॥
'आप ही शार्ङ्गधन्वा, हृषीकेश, अन्तर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हैं। आप किसीसे पराजित नहीं होते। आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं॥ १५ ॥
'आप ही देवसेनापति तथा गाँवोंके मुखिया अथवा नेता हैं। आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलयके कारण हैं। आप ही उपेन्द्र (वामन) और मधुसूदन हैं॥ १६ ॥
'इन्द्रको भी उत्पन्न करनेवाले महेन्द्र और युद्धका अन्त करनेवाले शान्तस्वरूप पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षिगण आपको शरणदाता तथा शरणागतवत्सल बताते हैं॥ १७ ॥
'आप ही सहस्रों शाखारूप सींग तथा सैकड़ों विधिवाक्यरूप मस्तकोंसे युक्त वेदरूप महावृषभ हैं। आप ही तीनों लोकोंके आदिकर्ता और स्वयंप्रभु (परम स्वतन्त्र) हैं॥ १८ ॥
'आप सिद्ध और साध्योंके आश्रय तथा पूर्वज हैं। यज्ञ, वषट्कार और ओंकार भी आप ही हैं। आप श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं॥ १९ ॥
'आपके आविर्भाव और तिरोभावको कोऽइ नहीं जानता। आप कौन हैं—इसका भी किसीको पता नहीं है। समस्त प्राणियोंमें, गौओंमें तथा ब्राह्मणोंमें भी आप ही दिखायी देते हैं॥ २० ॥
'समस्त दिशाओंमें, आकाशमें, पर्वतोंमें और नदियोंमें भी आपकी ही सत्ता है। आपके सहस्रों चरण, सैकड़ों मस्तक और सहस्रों नेत्र हैं॥ २१ ॥
'आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंको, पृथ्वीको और समस्त पर्वतोंको धारण करते हैं। पृथ्वीका अन्त हो जानेपर आप ही जलके ऊपर महान् सर्प—शेषनागके रुपमें दिखायी देते हैं॥ २२ ॥
‘श्रीराम! आप ही तीनों लोकोंको तथा देवता, गन्धर्व और दानवोंको धारण करनेवाले विराट् पुरुष नारायण हैं। सबके हृदयमें रमण करनेवाले परमात्मन्! मैं ब्रह्मा आपका हृदय हूँ और देवी सरस्वती आपकी जिह्वा हैं॥ २३ ॥
‘प्रभो! मुझ ब्रह्माने जिनकी सृष्टि की है, वे सब देवता आपके विराट् शरीरमें रोम हैं। आपके नेत्रोंका बन्द होना रात्रि और खुलना ही दिन है॥ २४ ॥
‘वेद आपके संस्कार हैं। आपके बिना इस जगत्का अस्तित्व नहीं है। सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है। पृथ्वी आपकी स्थिरता है॥ २५ ॥
‘अग्नि आपका कोप है और चन्द्रमा प्रसन्नता है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले भगवान् विष्णु आप ही हैं। पूर्वकालमें (वामनावतारके समय) आपने ही अपने तीन पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे॥ २६ ॥
‘आपने अत्यन्त दारुण दैत्यराज बलिको बाँधकर इन्द्रको तीनों लोकोंका राजा बनाया था। सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं और आप भगवान् विष्णु हैं। आप ही सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं प्रजापति हैं॥ २७ ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ रघुवीर! आपने रावणका वध करनेके लिये ही इस लोकमें मनुष्यके शरीरमें प्रवेश किया था। हमलोगोंका कार्य आपने सम्पन्न कर दिया॥ २८ ॥
‘श्रीराम! आपके द्वारा रावण मारा गया। अब आप प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धाममें पधारिये। देव! आपका बल अमोघ है। आपके पराक्रम भी व्यर्थ होनेवाले नहीं हैं॥ २९ ॥
‘श्रीराम! आपका दर्शन अमोघ है। आपका स्तवन भी अमोघ है तथा आपमें भक्ति रखनेवाले मनुष्य भी इस भूमण्डलमें अमोघ ही होंगे॥ ३० ॥
‘आप पुराणपुरुषोत्तम हैं। दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं। जो लोग आपमें भक्ति रखेंगे, वे इस लोक और परलोकमें अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे’॥ ३१ ॥
यह परम ऋषि ब्रह्माका कहा हुआ दिव्य स्तोत्र तथा पुरातन इतिहास है। जो लोग इसका कीर्तन करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११७ ॥