श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
तिरपनवाँ सर्ग
तिरपनवाँ सर्ग
श्रीरामका कार्यार्थी पुरुषोंकी उपेक्षासे राजा नृगको मिलनेवाली शापकी कथा सुनाकर लक्ष्मणको देखभालके लिये आदेश देना
लक्ष्मणके उस अत्यन्त अद्भुत वचनको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले— ॥
‘सौम्य! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। जैसे तुम मेरे मनका अनुसरण करनेवाले हो, ऐसा भाई विशेषतः इस समय मिलना कठिन है॥ २ ॥
‘शुभलक्षण लक्ष्मण! अब मेरे मनमें जो बात है, उसे सुनो और सुनकर वैसा ही करो॥ ३ ॥
‘सौम्य! सुमित्राकुमार! मुझे पुरवासियोंका काम किये बिना चार दिन बीत चुके हैं, यह बात मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण कर रही है॥ ४ ॥
‘पुरुषप्रवर! तुम प्रजा, पुरोहित और मन्त्रियोंको बुलाओ। जिन पुरुषों अथवा स्त्रियोंको कोई काम हो, उनको उपस्थित करो॥ ५ ॥
‘जो राजा प्रतिदिन पुरवासियोंके कार्य नहीं करता, वह निस्संदेह सब ओरसे निश्छिद्र अतएव वायुसंचारसे रहित घोर नरकमें पड़ता है॥ ६ ॥
‘सुना जाता है पहले इस पृथ्वीपर नृगनामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी राजा राज्य करते थे। वे भूपाल बड़े ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी तथा आचार-विचारसे पवित्र थे॥
‘उन नरदेवने किसी समय पुष्करतीर्थमें जाकर ब्राह्मणोंको सुवर्णसे भूषित तथा बछड़ोंसे युक्त एक करोड़ गौएँ दान कीं॥ ८ ॥
‘निष्पाप लक्ष्मण! उस समय दूसरी गौओंके साथ-साथ एक दरिद्र, उञ्छवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाले एवं अग्निहोत्री ब्राह्मणकी बछड़ेसहित गाय वहाँ चली गयी और राजाने संकल्प करके उसे किसी ब्राह्मणको दे दिया॥ ९ ॥
‘वह बेचारा ब्राह्मण भूखसे पीड़ित हो उस खोयी हुई गायको बहुत वर्षोंतक सारे राज्योंमें जहाँ-तहाँ ढूँढ़ता फिरा; परंतु वह उसे नहीं दिखायी दी॥ १० ॥
‘अन्तमें एक दिन कनखल पहुँचकर उसने अपनी गाय एक ब्राह्मणके घरमें देखी। वह नीरोग और हृष्ट-पुष्ट थी, किंतु उसका बछड़ा बहुत बड़ा हो गया था॥ ११ ॥
‘ब्राह्मणने अपने रखे हुए ‘शबला’ नामसे उसको पुकारा—‘शबले! आओ! आओ!’ गौने उस स्वरको सुना॥ १२ ॥
‘भूखसे पीड़ित हुए उस ब्राह्मणके उस परिचित स्वरको पहचानकर वह गौ आगे-आगे जाते हुए उस अग्नितुल्य तेजस्वी ब्राह्मणके पीछे हो ली॥ १३ ॥
‘जो ब्राह्मण उन दिनों उसका पालन करता था, वह भी तुरंत उस गायका पीछा करता हुआ गया और जाकर उन ब्रह्मर्षिसे बोला—‘ब्रह्मन्! यह गौ मेरी है। मुझे राजाओंमें श्रेष्ठ नृगने इसे दानमें दिया है’॥ १४ १/२ ॥
‘फिर तो उन दोनों विद्वान् ब्राह्मणोंमें उस गौको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया। वे दोनों परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए उन दानी नरेश नृगके पास गये॥ १५ १/२ ॥
‘वहाँ राजभवनके दरवाजेपर जाकर वे कई दिनोंतक टिके रहे, परंतु उन्हें राजाका न्याय नहीं प्राप्त हुआ (वे उनसे मिले ही नहीं)। इससे उन दोनोंको बड़ा क्रोध हुआ॥ १६ १/२ ॥
‘वे दोनों श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मण अत्यन्त संतप्त और कुपित हो राजाको शाप देते हुए यह घोर वाक्य बोले—॥
‘राजन्! अपने विवादका निर्णय करानेकी इच्छासे आये हुए प्रार्थी पुरुषोंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुम उन्हें दर्शन नहीं देते हो; इसलिये तुम सब प्राणियोंसे छिपकर रहनेवाले गिरगिट हो जाओगे और सहस्रों वर्षोंके दीर्घकालतक गड्ढेमें गिरगिट होकर ही पड़े रहोगे॥ १८-१९ १/२ ॥
‘जब यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वासुदेवनामसे विख्यात भगवान् विष्णु पुरुषरूपसे इस जगत्में अवतार लेंगे, उस समय वे ही तुम्हें इस शापसे छुड़ायेंगे, इसलिये इस समय तो तुम गिरगिट हो ही जाओगे, फिर श्रीकृष्णावतारके समयमें ही तुम्हारा उद्धार होगा। कलियुग उपस्थित होनेसे कुछ ही पहले महापराक्रमी नर और नारायण दोनों इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण होंगे’॥ २०—२२ १/२ ॥
‘इस प्रकार शाप देकर वे दोनों ब्राह्मण शान्त हो गये। उन्होंने वह बूढ़ी और दुबली गाय किसी ब्राह्मणको दे दी॥ २३ १/२ ॥
‘इस प्रकार राजा नृग उस अत्यन्त दारुण शापका उपभोग कर रहे हैं। अतः कार्यार्थी पुरुषोंका विवाद यदि निर्णीत न हो तो वह राजाओंके लिये महान् दोषकी प्राप्ति करानेवाला
होता है॥ २४ १/२ ॥
‘अतः कार्यार्थी मनुष्य शीघ्र मेरे सामने उपस्थित हों। प्रजापालनरूप पुण्यकर्मका फल क्या राजाको नहीं मिलता है? अवश्य प्राप्त होता है। अतः सुमित्रानन्दन! तुम जाओ, राजद्वारपर प्रतीक्षा करो कि कौन कार्यार्थी पुरुष आ रहा है’॥ २५-२६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥