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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ आठवाँ सर्ग

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एक सौ आठवाँ सर्ग

श्रीरामके द्वारा रावणका वध

मातलिने श्रीरघुनाथजीको कुछ याद दिलाते हुए कहा— ‘वीरवर! आप अनजानकी तरह क्यों इस राक्षसका अनुसरण कर रहे हैं? (यह जो अस्त्र चलाता है, उसके निवारण करनेवाले अस्त्रका प्रयोगमात्र करके रह जाते हैं)॥ १ ॥

‘प्रभो! आप इसके वधके लिये ब्रह्माजीके अस्त्रका प्रयोग कीजिये। देवताओंने इसके विनाशका जो समय बताया है, वह अब आ पहुँचा है’॥ २ ॥

मातलिके इस वाक्यसे श्रीरामचन्द्रजीको उस अस्त्रका स्मरण हो आया। फिर तो उन्होंने फुफकारते हुए सर्पके समान एक तेजस्वी बाण हाथमें लिया॥ ३ ॥

यह वही बाण था, जिसे पहले शक्तिशाली भगवान् अगस्त्य ऋषिने रघुनाथजीको दिया था। वह विशाल बाण ब्रह्माजीका दिया हुआ था और युद्धमें अमोघ था॥

अमित तेजस्वी ब्रह्माजीने पहले इन्द्रके लिये उस बाणका निर्माण किया था और तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले देवेन्द्रको ही पूर्वकालमें अर्पित किया था॥ ५ ॥

उस बाणके वेगमें वायुकी, धारमें अग्नि और सूर्यकी, शरीरमें आकाशकी तथा भारीपनमें मेरु और मन्दराचलकी प्रतिष्ठा की गयी थी॥ ६ ॥

वह सम्पूर्ण भूतोंके तेजसे बनाया गया था। उससे सूर्यके समान ज्योति निकलती रहती थी। वह सुवर्णसे भूषित, सुन्दर पंखसे युक्त, स्वरूपसे जाज्वल्यमान, प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निके समान भयंकर, दीप्तिमान्, विषधर सर्पके समान विषैला, मनुष्य, हाथी और घोड़ोंको विदीर्ण कर डालनेवाला तथा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यका भेदन करनेवाला था॥ ७-८ ॥

बड़े-बड़े दरवाजों, परिघों तथा पर्वतोंको भी तोड़-फोड़ देनेकी उसमें शक्ति थी। उसका सारा शरीर नाना प्रकारके रक्तमें नहाया और चर्बीसे परिपुष्ट हुआ था। देखनेमें भी वह बड़ा भयंकर था। वज्रके समान कठोर, महान् शब्दसे युक्त, अनेकानेक युद्धोंमें शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाला, सबको त्रास देनेवाला तथा फुफकारते हुए सर्पके समान भयंकर था। युद्धमें वह यमराजका भयावह रूप धारण कर लेता था। समरभूमिमें कौए, गीध, बगुले, गीदड़ तथा पिशाचोंको वह सदा भक्ष्य प्रदान करता था॥ ९—११ ॥

वह सायक वानर-यूथपतियोंको आनन्द देनेवाला तथा राक्षसोंको दुःखमें डालनेवाला था। गरुड़के सुन्दर विचित्र और नाना प्रकारके पंख लगाकर वह पंखयुक्त बना हुआ था॥ १२ ॥

वह उत्तम बाण समस्त लोकों तथा इक्ष्वाकुवंशियोंके भयका नाशक था, शत्रुओंकी कीर्तिका अपहरण तथा अपने हर्षकी वृद्धि करनेवाला था। उस महान् सायकको वेदोक्त विधिसे अभिमन्त्रित करके महाबली श्रीरामने अपने धनुषपर रखा॥ १३-१४ ॥

श्रीरघुनाथजी जब उस उत्तम बाणका संधान करने लगे, तब सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और धरती डोलने लगी॥ १५ ॥

श्रीरामने अत्यन्त कुपित हो बड़े यत्नके साथ धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर उस मर्मभेदी बाणको रावणपर चला दिया॥ १६ ॥

वज्रधारी इन्द्रके हाथोंसे छूटे हुए वज्रके समान दुर्धर्ष और कालके समान अनिवार्य वह बाण रावणकी छातीपर जा लगा॥ १७ ॥

शरीरका अन्त कर देनेवाले उस महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाणने छूटते ही दुरात्मा रावणके हृदयको विदीर्ण कर डाला॥ १८ ॥

शरीरका अन्त करके रावणके प्राण हर लेनेवाला वह बाण उसके खूनसे रँगकर वेगपूर्वक धरतीमें समा गया॥

इस प्रकार रावणका वध करके खूनसे रँगा हुआ वह शोभाशाली बाण अपना काम पूरा करनेके पश्चात् पुनः विनीत सेवककी भाँति श्रीरामचन्द्रजीके तरकसमें लौट आया॥ २० ॥

श्रीरामके बाणोंकी चोट खाकर रावण जीवनसे हाथ धो बैठा। उसके प्राण निकलनेके साथ ही हाथसे सायकसहित धनुष भी छूटकर गिर पड़ा॥ २१ ॥

वह भयानक वेगशाली महातेजस्वी राक्षसराज प्राणहीन हो वज्रके मारे हुए वृत्रासुरकी भाँति रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २२ ॥

रावणको पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए सम्पूर्ण निशाचर स्वामीके मारे जानेसे भयभीत हो सब ओर भाग गये॥ २३ ॥

दशमुख रावणका वध हुआ देख विजयसे सुशोभित होनेवाले वानर, जो वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले थे, गर्जना करते हुए उन राक्षसोंपर टूट पड़े॥ २४ ॥

उन हर्षोल्लासित वानरोंद्वारा पीड़ित किये जानेपर वे राक्षस भयके मारे लङ्कापुरीकी ओर भाग गये; क्योंकि उनका आश्रय नष्ट हो गया था। उनके मुखपर करुणायुक्त आँसुओंकी धारा बह रही थी॥ २५ ॥

उस समय वानर विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित हो अत्यन्त हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा श्रीरघुनाथजीकी विजय और रावणके वधकी घोषणा करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ २६ ॥

इसी समय आकाशमें मधुर स्वरसे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। वायु दिव्य सुगन्ध बिखेरती हुई मन्द-मन्द गतिसे प्रवाहित होने लगी॥ २७ ॥

अन्तरिक्षसे भूतलपर श्रीरघुनाथजीके रथके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी, जो दुर्लभ तथा मनोहर थी॥

आकाशमें महामना देवताओंके मुखसे निकली हुई श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुतिसे युक्त साधुवादकी श्रेष्ठ वाणी सुनायी देने लगी॥ २९ ॥

सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले रौद्र राक्षस रावणके मारे जानेपर देवताओं और चारणोंको महान् हर्ष हुआ॥ ३० ॥

श्रीरघुनाथजीने राक्षसराजको मारकर सुग्रीव, अङ्गद तथा विभीषणको सफलमनोरथ किया और स्वयं भी उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् देवताओंको बड़ी शान्ति मिली, सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं—उनमें प्रकाश छा गया, आकाश निर्मल हो गया, पृथ्वीका काँपना बंद हुआ, हवा स्वाभाविक गतिसे चलने लगी तथा सूर्यकी प्रभा भी स्थिर हो गयी॥ ३२ ॥

सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा लक्ष्मण अपने सुहृदोंके साथ युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीकी विजयसे बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद उन सबने मिलकर नयनाभिराम श्रीरामकी विधिवत् पूजा की॥ ३३ ॥

शत्रुको मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करनेके पश्चात् स्वजनोंसहित सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी रघुकुलराजकुमार श्रीराम रणभूमिमें देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०८ ॥