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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बाईसवाँ सर्ग

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बाईसवाँ सर्ग

समुद्रकी सलाहके अनुसार नलके द्वारा सागरपर सौ योजन लंबे पुलका निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम आदिसहित वानरसेनाका उस पार पहुँचकर पड़ाव डालना

तब रघुकुलतिलक श्रीरामने समुद्रसे कठोर शब्दोंमें कहा—‘महासागर! आज मैं पातालसहित तुझे सुखा डालूँगा’॥ १ ॥

‘सागर! मेरे बाणोंसे तुम्हारी सारी जलराशि दग्ध हो जायगी, तू सूख जायगा और तेरे भीतर रहनेवाले सब जीव नष्ट हो जायँगे। उस दशामें तेरे यहाँ जलके स्थानमें विशाल बालुकाराशि पैदा हो जायगी॥ २ ॥

‘समुद्र! मेरे धनुषद्वारा की गयी बाण-वर्षासे जब तेरी ऐसी दशा हो जायगी, तब वानरलोग पैदल ही चलकर तेरे उस पार पहुँच जायँगे॥ ३ ॥

‘दानवोंके निवासस्थान! तू केवल चारों ओरसे बहकर आयी हुई जलराशिका संग्रह करता है। तुझे मेरे बल और पराक्रमका पता नहीं है। किंतु याद रख, (इस उपेक्षाके कारण) तुझे मुझसे भारी संताप प्राप्त होगा’॥ ४ ॥

यों कहकर महाबली श्रीरामने एक ब्रह्मदण्डके समान भयंकर बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने श्रेष्ठ धनुषपर चढ़ाकर खींचा॥ ५ ॥

श्रीरघुनाथजीके द्वारा सहसा उस धनुषके खींचे जाते ही पृथ्वी और आकाश मानो फटने लगे और पर्वत डगमगा उठे॥ ६ ॥

सारे संसारमें अन्धकार छा गया। किसीको दिशाओंका ज्ञान न रहा। सरिताओं और सरोवरोंमें तत्काल हलचल पैदा हो गयी॥ ७ ॥

चन्द्रमा और सूर्य नक्षत्रोंके साथ तिर्यक्-गतिसे चलने लगे। सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित होनेपर भी आकाशमें अन्धकार छा गया॥ ८ ॥

उस समय आकाशमें सैकड़ों उल्काएँ प्रज्वलित होकर उसे प्रकाशित करने लगीं तथा अन्तरिक्षसे अनुपम एवं भारी गड़गड़ाहटके साथ वज्रपात होने लगे॥ ९ ॥

परिवह आदि वायुभेदोंका समूह बड़े वेगसे बहने लगा। वह मेघोंकी घटाको उड़ाता हुआ बारंबार वृक्षोंको तोड़ने, बड़े-बड़े पर्वतोंसे टकराने और उनके शिखरोंको खण्डित करके गिराने

लगा॥ १० १/२ ॥

आकाशमें महान् वेगशाली विशाल वज्र भारी गड़गड़ाहटके साथ टकराकर उस समय वैद्युत अग्निकी वर्षा करने लगे। जो प्राणी दिखायी दे रहे थे और जो नहीं दिखायी देते थे, वे सब बिजलीकी कड़कके समान भयंकर शब्द करने लगे॥ ११-१२ १/२ ॥

उनमेंसे कितने ही अभिभूत होकर धराशायी हो गये। कितने ही भयभीत और उद्विग्न हो उठे। कोऽइ व्यथासे व्याकुल हो गये और कितने ही भयके मारे जडवत् हो गये॥ १३ १/२ ॥

समुद्र अपने भीतर रहनेवाले प्राणियों, तरङ्गों, सर्पों और राक्षसोंसहित सहसा भयानक वेगसे युक्त हो गया और प्रलयकालके बिना ही तीव्रगतिसे अपनी मर्यादा लाँघकर एक-एक योजन आगे बढ़ गया॥ १४-१५ ॥

इस प्रकार नदों और नदियोंके स्वामी उस उद्धत समुद्रके मर्यादा लाँघकर बढ़ जानेपर भी शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी अपने स्थानसे पीछे नहीं हटे॥ १६ ॥

तब समुद्रके बीचसे सागर स्वयं मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ, मानो महाशैल मेरुपर्वतके अङ्गभूत उदयाचलसे सूर्यदेव उदित हुए हों॥ १७ ॥

चमकीले मुखवाले सर्पोंके साथ समुद्रका दर्शन हुआ। उसका वर्ण स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान श्याम था। उसने जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए आभूषण पहन रखे थे॥ १८ ॥

लाल रंगके फूलोंकी माला तथा लाल ही वस्त्र धारण किये थे। उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर थे। उसने सिरपर एक दिव्य पुष्पमाला धारण कर रखी थी, जो सब प्रकारके फूलोंसे बनायी गयी थी॥

सुवर्ण और तपे हुए काञ्चनके आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह अपने ही भीतर उत्पन्न हुए रत्नोंके उत्तम आभूषणोंसे विभूषित था॥ २० ॥

इसीलिये नाना प्रकारके धातुओंसे अलंकृत हिमवान् पर्वतके समान शोभा पाता था। वह अपने विशाल वक्षःस्थलपर कौस्तुभ मणिके सहोदर (सदृश) एक श्वेत प्रभासे युक्त मुख्य रत्न धारण किये हुए था, जो मोतियोंकी इकहरी मालाके मध्यभागमें प्रकाशित हो रहा था॥ २१ १/२ ॥

चञ्चल तरङ्गें उसे घेरे हुए थीं। मेघमाला और वायुसे वह व्याप्त था तथा गङ्गा और सिन्धु आदि नदियाँ उसे सब ओरसे घेरकर खड़ी थीं॥ २२ १/२ ॥

उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राह उद्भ्रान्त हो रहे थे, नाग और राक्षस घबराये हुए थे। देवताओंके समान सुन्दर रूप धारण करके आयी हुईं विभिन्न रूपवाली नदियोंके साथ शक्तिशाली नदीपति समुद्रने निकट आकर पहले धनुर्धर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधित किया और फिर हाथ जोड़कर कहा— ॥ २३–२५ ॥

‘सौम्य रघुनन्दन! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये सर्वदा अपने स्वभावमें स्थित रहते हैं। अपने सनातन मार्गको कभी नहीं छोड़ते—सदा उसीके आश्रित रहते हैं॥ २६ ॥

‘मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ—कोई मेरे पार नहीं जा सकता। यदि मेरी थाह मिल जाय तो यह विकार—मेरे स्वभावका व्यतिक्रम ही होगा। इसलिये मैं आपसे पार होनेका यह उपाय बताता हूँ॥ २७ ॥

‘राजकुमार! मैं मगर और नाक आदिसे भरे हुए अपने जलको किसी कामनासे, लोभसे अथवा भयसे किसी तरह स्तम्भित नहीं होने दूँगा॥ २८ ॥

‘श्रीराम! मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे आप मेरे पार चले जायँगे, ग्राह वानरोंको कष्ट नहीं देंगे, सारी सेना पार उतर जायगी और मुझे भी खेद नहीं होगा। मैं आसानीसे सब कुछ सह लूँगा। वानरोंके पार जानेके लिये जिस प्रकार पुल बन जाय, वैसा प्रयत्न मैं करूँगा’॥ २९ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा— ‘वरुणालय! मेरी बात सुनो। मेरा यह विशाल बाण अमोघ है। बताओ, इसे किस स्थानपर छोड़ा जाय’॥ ३० ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर और उस महान् बाणको देखकर महातेजस्वी महासागरने रघुनाथजीसे कहा— ॥ ३१ ॥

‘प्रभो! जैसे जगतमें आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तरकी ओर द्रुमकुल्य नामसे विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है॥ ३२ ॥

‘वहाँ आभीर आदि जातियोंके बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं, जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं। वे सब-के-सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं॥ ३३ ॥

‘उन पापाचारियोंका स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पापको मैं नहीं सह सकता। श्रीराम! आप अपने इस उत्तम बाणको वहीं सफल कीजिये’॥ ३४ ॥

महामना समुद्रका यह वचन सुनकर सागरके दिखाये अनुसार उसी देशमें श्रीरामचन्द्रजीने वह अत्यन्त प्रज्वलित बाण छोड़ दिया॥ ३५ ॥

वह वज्र और अशनिके समान तेजस्वी बाण जिस स्थानपर गिरा था, वह स्थान उस बाणके कारण ही पृथ्वीमें दुर्गम मरुभूमिके नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ३६ ॥

उस बाणसे पीड़ित होकर उस समय वसुधा आर्तनाद कर उठी। उसकी चोटसे जो छेद हुआ, उसमें होकर रसातलका जल ऊपरको उछलने लगा॥ ३७ ॥

वह छिद्र कुएँके समान हो गया और व्रणके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस कुएँसे सदा निकलता हुआ जल समुद्रके जलकी भाँति ही दिखायी देता है॥ ३८ ॥

उस समय वहाँ भूमिके विदीर्ण होनेका भयंकर शब्द सुनायी पड़ा। उस बाणको गिराकर वहाँके भूतलकी कुक्षिमें (तालाब-पोखरे आदिमें) वर्तमान जलको श्रीरामने सुखा दिया॥ ३९ ॥

तबसे वह स्थान तीनों लोकोंमें मरुकान्तारके नामसे ही विख्यात हो गया। जो पहले समुद्रका कुक्षिप्रदेश था, उसे सुखाकर देवोपम पराक्रमी विद्वान् दशरथनन्दन श्रीरामने उस मरुभूमिको वरदान दिया॥ ४०-४१ ॥

‘यह मरुभूमि पशुओंके लिये हितकारी होगी। यहाँ रोग कम होंगे। यह भूमि फल, मूल और रसोंसे सम्पन्न होगी। यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे, दूधकी भी बहुतायत होगी। यहाँ सुगन्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न होंगी’॥ ४२ ॥

इस प्रकार भगवान् श्रीरामके वरदानसे वह मरुप्रदेश इस तरहके बहुसंख्यक गुणोंसे सम्पन्न हो सबके लिये मङ्गलकारी मार्ग बन गया॥ ४३ ॥

उस कुक्षिस्थानके दग्ध हो जानेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीसे कहा— ॥ ४४ ॥

‘सौम्य! आपकी सेनामें जो यह नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्माका पुत्र है। इसे इसके पिताने यह वर दिया है कि ‘तुम मेरे ही समान समस्त शिल्पकलामें निपुण होओगे।’ प्रभो! आप भी तो इस विश्वके स्रष्टा विश्वकर्मा हैं। इस नलके हृदयमें आपके प्रति बड़ा प्रेम है॥ ४५ ॥

‘यह महान् उत्साही वानर अपने पिताके समान ही शिल्पकर्ममें समर्थ है, अतः यह मेरे ऊपर पुलका निर्माण करे। मैं उस पुलको धारण करूँगा’॥ ४६ ॥

यों कहकर समुद्र अदृश्य हो गया। तब वानरश्रेष्ठ नल उठकर महाबली भगवान् श्रीरामसे बोला— ॥ ४७ ॥

'प्रभो! मैं पिताकी दी हुई शक्तिको पाकर इस विस्तृत समुद्रपर सेतुका निर्माण करूँगा। महासागरने ठीक कहा है॥ ४८ ॥

'संसारमें पुरुषके लिये अकृतज्ञोंके प्रति दण्डनीतिका प्रयोग ही सबसे बड़ा अर्थसाधक है, ऐसा मेरा विश्वास है। वैसे लोगोंके प्रति क्षमा, सान्त्वना और दाननीतिके प्रयोगको धिक्कार है॥ ४९ ॥

'इस भयानक समुद्रको राजा सगरके पुत्रोंने ही बढ़ाया है। फिर भी इसने कृतज्ञतासे नहीं, दण्डके भयसे ही सेतुकर्म देखनेकी इच्छा मनमें लाकर श्रीरघुनाथजीको अपनी थाह दी है॥ ५० ॥

'मन्दराचलपर विश्वकर्माजीने मेरी माताको यह वर दिया था कि 'देवि! तुम्हारे गर्भसे मेरे ही समान पुत्र होगा'॥ ५१ ॥

'इस प्रकार मैं विश्वकर्माका औरस पुत्र हूँ और शिल्पकर्ममें उन्हींके समान हूँ। इस समुद्रने आज मुझे इन सब बातोंका स्मरण दिला दिया है। महासागरने जो कुछ कहा है, ठीक है। मैं बिना पूछे आपलोगोंसे अपने गुणोंको नहीं बता सकता था, इसीलिये अबतक चुप था॥ ५२ ॥

'मैं महासागरपर पुल बाँधनेमें समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दें'॥

तब भगवान् श्रीरामके भेजनेसे लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साहमें भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलोंमें घुस गये॥ ५४ ॥

वे पर्वतके समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वतशिखरों और वृक्षोंको तोड़ देते और उन्हें समुद्रतक खींच लाते थे॥ ५५ ॥

वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षोंसे समुद्रको पाटने लगे॥ ५६-५७ ॥

वे श्रेष्ठ वानर वहाँके वृक्षोंको जड़से उखाड़ लाते या जड़के ऊपरसे भी तोड़ लाते थे। इन्द्रध्वजके समान ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको उठाये लिये चले आते थे॥ ५८ ॥

ताड़ों, अनारकी झाड़ियों, नारियल और बहेड़ेके वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीमको भी इधर-उधरसे तोड़-तोड़कर लाने लगे॥ ५९ ॥

महाकाय महाबली वानर हाथीके समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतोंको उखाड़कर यन्त्रों (विभिन्न साधनों) द्वारा समुद्रतटपर ले आते थे॥ ६० ॥

शिलाखण्डोंको फेंकनेसे समुद्रका जल सहसा आकाशमें उठ जाता और फिर वहाँसे नीचेको गिर जाता था॥ ६१ ॥

उन वानरोंने सब ओर पत्थर गिराकर समुद्रमें हलचल मचा दी। कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे॥ ६२ ॥

नल नदों और नदियोंके स्वामी समुद्रके बीचमें महान् सेतुका निर्माण कर रहे थे। भयंकर कर्म करनेवाले वानरोंने मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माणका कार्य आरम्भ किया था॥ ६३ ॥

कोई नापनेके लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघोंके समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठोंद्वारा भिन्न-भिन्न स्थानोंमें पुल बाँध रहे थे। जिनके अग्रभाग फूलोंसे लदे थे, ऐसे वृक्षोंद्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे॥ ६४-६५ ॥

पर्वतों-जैसी बड़ी-बड़ी चट्टानें और पर्वतशिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवोंके समान दिखायी देते थे॥ ६६ ॥

उस समय उस महासागरमें फेंकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ोंके गिरनेसे बड़ा भीषण शब्द हो रहा था॥ ६७ ॥

हाथीके समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजीके साथ काममें लगे हुए थे। पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा॥ ६८ ॥

फिर दूसरे दिन भयंकर शरीरवाले महाबली वानरोंने तेजीसे काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया॥ ६९ ॥

तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काममें जुटे हुए महाकाय कपियोंने समुद्रमें इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया॥ ७० ॥

चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरोंने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया॥ ७१ ॥

तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करनेवाले उन वानर वीरोंने सुवेल पर्वतके निकटतक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा॥

इस प्रकार विश्वकर्माके बलवान् पुत्र कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नलने समुद्रमें सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया। इस कार्यमें वे अपने पिताके समान ही प्रतिभाशाली थे॥ ७३ ॥

मकरालय समुद्रमें नलके द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाशमें स्वातीपथ (छायापथ)-के समान सुशोभित होता था॥ ७४ ॥

उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस अद्भुत कार्यको देखनेके लिये आकाशमें आकर खड़े थे॥

नलके बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े उस पुलको देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था॥ ७६ ॥

वानरलोग भी इधर-उधर उछल-कूदकर गर्जना करते हुए उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुलको देख रहे थे। समस्त प्राणियोंने ही समुद्रमें सेतु बाँधनेका वह कार्य देखा॥ ७७ १/२ ॥

इस प्रकार उन सहस्र कोटि (एक खरब) महाबली एवं उत्साही वानरोंका दल पुल बाँधते-बाँधते ही समुद्रके उस पार पहुँच गया॥ ७८ १/२ ॥

वह पुल बड़ा ही विशाल, सुन्दरतासे बनाया हुआ, शोभासम्पन्न, समतल और सुसम्बद्ध था। वह महान् सेतु सागरमें सीमन्तके समान शोभा पाता था॥ ७९ १/२ ॥

पुल तैयार हो जानेपर अपने सचिवोंके साथ विभीषण गदा हाथमें लेकर समुद्रके दूसरे तटपर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़नेके लिये आवें तो उन्हें दण्ड दिया जा सके॥ ८० १/२ ॥

तदनन्तर सुग्रीवने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— 'वीरवर! आप हनुमान्के कंधेपर चढ़ जाइये और लक्ष्मण अङ्गदकी पीठपर सवार हो लें; क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा-चौड़ा है। ये दोनों वानर आकाश-मार्गसे चलनेवाले हैं। अतः ये ही दोनों आप दोनों भाइयोंको धारण कर सकेंगे'॥ ८१-८२ १/२ ॥

इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ उस सेनाके आगे-आगे चले॥

दूसरे वानर सेनाके बीचमें और अगल-बगलमें होकर चलने लगे। कितने ही वानर जलमें कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे। दूसरे पुलका मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाशमें

उछलकर गरुड़के समान उड़ते थे॥ ८४-८५ ॥

इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर-सेनाने अपने महान् घोषसे समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जनाको भी दबा दिया॥ ८६ ॥

धीरे-धीरे वानरोंकी सारी सेना नलके बनाये हुए पुलसे समुद्रके उस पार पहुँच गयी। राजा सुग्रीवने फल, मूल और जलकी अधिकता देख सागरके तटपर ही सेनाका पड़ाव डाला॥ ८७ ॥

भगवान् श्रीरामका वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियोंके साथ देवतालोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग-अलग पवित्र एवं शुभ जलसे उनका अभिषेक किया॥ ८८ ॥

फिर बोले—‘नरदेव! तुम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका सदा पालन करते रहो।’ इस प्रकार भाँति-भाँतिके मङ्गलसूचक वचनोंद्वारा राजसम्मानित श्रीरामका उन्होंने अभिवादन किया॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२ ॥