श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
सौवाँ सर्ग
सौवाँ सर्ग
श्रीरामका भरतको कुशल-प्रश्नके बहाने राजनीतिका उपदेश करना
जटा और चीर-वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वीपर पड़े थे, मानो प्रलयकालमें सूर्यदेव धरतीपर गिर गये हों। उनको उस अवस्थामें देखना किसी भी स्नेही सुहृद्के लिये अत्यन्त कठिन था। श्रीरामने उन्हें देखा और जैसे-तैसे किसी तरह पहचाना। उनका मुख उदास हो गया था। वे बहुत दुर्बल हो गये थे। श्रीरामने भाई भरतको अपने हाथसे पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरतको गोदमें बिठाकर श्रीरामने बड़े आदरसे पूछा— ॥ १—३ ॥
‘तात! पिताजी कहाँ थे कि तुम इस वनमें आये हो? उनके जीते-जी तो तुम वनमें नहीं आ सकते थे॥
‘मैं दीर्घकालके बाद दूरसे (नानाके घरसे) आये हुए भरतको आज इस वनमें देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है। तात! तुम क्यों वनमें आये हो?॥ ५ ॥
‘भाई! महाराज जीवित हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे अत्यन्त दुःखी होकर सहसा परलोकवासी हो गये हों और इसीलिये तुम्हें स्वयं यहाँ आना पड़ा हो?॥ ६ ॥
‘सौम्य! तुम अभी बालक हो, इसलिये परम्परासे चला आता हुआ तुम्हारा राज्य नष्ट तो नहीं हो गया? सत्यपराक्रमी तात भरत! तुम पिताजीकी सेवा-शुश्रूषा तो करते हो न?॥ ७ ॥
‘जो धर्मपर अटल रहनेवाले हैं तथा जिन्होंने राजसूय एवं अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न?॥ ८ ॥
‘तात! क्या तुम सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुलके आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजीकी यथावत् पूजा करते हो?॥ ९ ॥
‘भाई! क्या माता कौसल्या सुखसे हैं? उत्तम संतानवाली सुमित्रा प्रसन्न हैं और आर्या कैकेयी देवी भी आनन्दित हैं?॥ १० ॥
‘जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, किसीके दोष न देखनेवाले तथा शास्त्रोक्त धर्मोंपर निरन्तर दृष्टि रखनेवाले हैं, उन पुरोहितजीका तुमने पूर्णतः सत्कार किया है?॥ ११ ॥
‘हवनविधिके ज्ञाता, बुद्धिमान् और सरल स्वभाववाले जिन ब्राह्मण देवताको तुमने अग्निहोत्र-कार्यके लिये नियुक्त किया है, वे सदा ठीक समयपर आकर क्या तुम्हें यह सूचित करते हैं कि इस समय अग्निमें आहुति दे दी गयी और अब अमुक समयमें हवन करना है?॥ १२ ॥
‘तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिताके समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणोंका सम्मान करते हो?॥ १३ ॥
‘भाऽई! जो मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणोंके प्रयोग तथा मन्त्रसहित उत्तम अस्त्रोंके प्रयोगके ज्ञानसे सम्पन्न और अर्थशास्त्र (राजनीति) के अच्छे पण्डित हैं, उन आचार्य सुधन्वाका क्या तुम समादर करते हो?॥ १४ ॥
‘तात! क्या तुमने अपने ही समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन तथा बाहरी चेष्टाओंसे ही मनकी बात समझ लेनेवाले सुयोग्य व्यक्तियोंको ही मन्त्री बनाया है?॥ १५ ॥
‘रघुनन्दन! अच्छी मन्त्रणा ही राजाओंकी विजयका मूलकारण है। वह भी तभी सफल होती है, जब नीति-शास्त्रनिपुण मन्त्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें॥ १६ ॥
‘भरत! तुम असमयमें ही निन्द्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जाग जाते हो न? रातके पिछले पहरमें अर्थसिद्धिके उपायपर विचार करते हो न?॥ १७ ॥
‘(कोऽई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है; छः कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अतः मैं पूछता हूँ—) तुम किसी गूढ़ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते? अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुऽइ गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो?॥ १८ ॥
‘रघुनन्दन! जिसका साधन बहुत छोटा और फल बहुत बड़ा हो, ऐसे कार्यका निश्चय करनेके बाद तुम उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देते हो न? उसमें विलम्ब तो नहीं करते?॥ १९ ॥
‘तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जानेपर अथवा पूरे होनेके समीप पहुँचनेपर ही दूसरे राजाओंको ज्ञात होते हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारे भावी कार्यक्रमको वे पहले ही जान लेते हों?॥ २० ॥
‘तात! तुम्हारे निश्चित किये हुए विचारोंको तुम्हारे या मन्त्रियोंके प्रकट न करनेपर भी दूसरे लोग तर्क और युक्तियोंके द्वारा जान तो नहीं लेते हैं? (तथा तुमको और तुम्हारे अमात्योंको दूसरोंके गुप्त विचारोंका पता लगता रहता है न?)॥ २१ ॥
‘क्या तुम सहस्रों मूर्खोंके बदले एक पण्डितको ही अपने पास रखनेकी इच्छा रखते हो? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकटके समय महान् कल्याण कर सकता है॥ २२ ॥
‘यदि राजा हजार या दस हजार मूर्खोंको अपने पास रख ले तो भी उनसे अवसरपर कोऽइ अच्छी सहायता नहीं मिलती॥ २३ ॥
‘यदि एक मन्त्री भी मेधावी, शूर-वीर, चतुर एवं नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमारको बहुत बड़ी सम्पत्तिकी प्राप्ति करा सकता है॥ २४ ॥
‘तात! तुमने प्रधान व्यक्तियोंको प्रधान, मध्यम श्रेणीके मनुष्योंको मध्यम और छोटी श्रेणीके लोगोंको छोटे ही कामोंमें नियुक्त किया है न?॥ २५ ॥
‘जो घूस न लेते हों अथवा निष्छल हों, बाप-दादोंके समयसे ही काम करते आ रहे हों तथा बाहरभीतर से पवित्र एवं श्रेष्ठ हों, ऐसे अमात्योंको ही तुम उत्तम कार्योंमें नियुक्त करते हो न?॥ २६ ॥
‘कैकेयीकुमार! तुम्हारे राज्यकी प्रजा कठोर दण्डसे अत्यन्त उद्विग्न होकर तुम्हारे मन्त्रियोंका तिरस्कार तो नहीं करती?॥ २७ ॥
‘जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका तथा स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरतापूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती?॥ २८ ॥
‘जो साम-दाम आदि उपायोंके प्रयोगमें कुशल, राजनीतिशास्त्रका विद्वान्, विश्वासी भृत्योंको फोड़नेमें लगा हुआ, शूर (मरनेसे न डरनेवाला) तथा राजाके राज्यको हड़प लेनेकी इच्छा रखनेवाला है—ऐसे पुरुषको जो राजा नहीं मार डालता है, वह स्वयं उसके हाथसे मारा जाता है॥ २९ ॥
‘क्या तुमने सदा संतुष्ट रहनेवाले, शूर-वीर, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, पवित्र, कुलीन एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले, रणकर्मदक्ष पुरुषको ही सेनापति बनाया है?॥ ३० ॥
‘तुम्हारे प्रधान-प्रधान योद्धा (सेनापति) बलवान्, युद्धकुशल और पराक्रमी तो हैं न? क्या तुमने उनके शौर्यकी परीक्षा कर ली है? तथा क्या वे तुम्हारे द्वारा सत्कारपूर्वक सम्मान पाते रहते हैं?॥ ३१ ॥
‘सैनिकोंको देनेके लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समयपर दे देते हो न? देनेमें विलम्ब तो नहीं करते?॥ ३२ ॥
‘यदि समय बिताकर भत्ता और वेतन दिये जाते हैं तो सैनिक अपने स्वामीपर भी अत्यन्त कुपित हो जाते हैं और इसके कारण बड़ा भारी अनर्थ घटित हो जाता है॥
‘क्या उत्तम कुलमें उत्पन्न मन्त्री आदि समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिये एकचित्त होकर अपने प्राणोंका त्याग करनेके लिये उद्यत रहते हैं?॥ ३४ ॥
‘भरत! तुमने जिसे राजदूतके पदपर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देशका निवासी, विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाय, वैसी ही बात दूसरेके सामने कहनेवाला और सदसद्विवेकयुक्त है न?॥ ३५ ॥
‘क्या तुम शत्रुपक्षके अठारह^१ और अपने पक्षके पंद्रह^२ तीर्थोंकी तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख-भाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो?॥ ३६ ॥
‘शत्रुसूदन! जिन शत्रुओंको तुमने राज्यसे निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते?॥ ३७ ॥
‘तात! तुम कभी नास्तिक ब्राह्मणोंका संग तो नहीं करते हो? क्योंकि वे बुद्धिको परमार्थकी ओरसे विचलित करनेमें कुशल होते हैं तथा वास्तवमें अज्ञानी होते हुए भी अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानते हैं॥ ३८ ॥
‘उनका ज्ञान वेदके विरुद्ध होनेके कारण दूषित होता है और वे प्रमाणभूत प्रधान-प्रधान धर्मशास्त्रोंके होते हुए भी तार्किक बुद्धिका आश्रय लेकर व्यर्थ बकवाद किया करते हैं॥ ३९ ॥
‘तात! अयोध्या हमारे वीर पूर्वजोंकी निवासभूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है। उसके दरवाजे सब ओरसे सुदृढ़ हैं। वह हाथी, घोड़े और रथोंसे परिपूर्ण है। अपने-अपने कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ सदा निवास करते हैं। वे सब-के-सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं। नाना प्रकारके राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानोंसे भरी है। ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्याकी तुम भलीभाँति रक्षा तो करते हो न?॥ ४०—४२ ॥
‘रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकारके अश्वमेध आदि महायज्ञोंके बहुत-से चयन-प्रदेश (अनुष्ठानस्थल) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्यामें निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँके स्त्री-पुरुष सदा प्रसन्न
रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवोंके कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतनेमें समर्थ पशुओंकी अधिकता है, जहाँ किसी प्रकारकी हिंसा नहीं होती, जहाँ खेतीके लिये वर्षाके जलपर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियोंके जलसे ही सिंचाई हो जाती है), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओंसे रहित है, जहाँ किसी तरहका भय नहीं है, नाना प्रकारकी खानें जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्योंका सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजोंने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्यसे सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न?॥ ४३—४६॥
‘तात! कृषि और गोरक्षासे आजीविका चलानेवाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र हैं न? क्योंकि कृषि और व्यापार आदिमें संलग्न रहनेपर ही यह लोक सुखी एवं उन्नतिशील होता है॥ ४७॥
‘उन वैश्योंको इष्टकी प्राप्ति कराकर और उनके अनिष्टका निवारण करके तुम उन सब लोगोंका भरण-पोषण तो करते हो न? क्योंकि राजाको अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंका धर्मानुसार पालन करना चाहिये॥ ४८॥
‘क्या तुम अपनी स्त्रियोंको संतुष्ट रखते हो? क्या वे तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सुरक्षित रहती हैं? तुम उनपर अधिक विश्वास तो नहीं करते? उन्हें अपनी गुप्त बात तो नहीं कह देते?॥ ४९॥
‘जहाँ हाथी उत्पन्न होते हैं, वे जंगल तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हैं न? तुम्हारे पास दूध देनेवाली गौएँ तो अधिक संख्यामें हैं न? (अथवा हाथियोंको फँसानेवाली हथिनियोंकी तो तुम्हारे पास कमी नहीं है?) तुम्हें हथिनियों, घोड़ों और हाथियोंके संग्रहसे कभी तृप्ति तो नहीं होती?॥ ५०॥
‘राजकुमार! क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्नकालमें वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो प्रधान सड़कपर जा-जाकर नगरवासी मनुष्योंको दर्शन देते हो?॥ ५१॥
‘काम-काजमें लगे हुए सभी मनुष्य निडर होकर तुम्हारे सामने तो नहीं आते? अथवा वे सब सदा तुमसे दूर तो नहीं रहते? क्योंकि कर्मचारियोंके विषयमें मध्यम स्थितिका अवलम्बन करना ही अर्थसिद्धिका कारण होता है॥ ५२॥
‘क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी तथा धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं?॥ ५३॥
‘रघुनन्दन! क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? तुम्हारे खजानेका धन अपात्रोंके हाथमें तो नहीं चला जाता?॥ ५४॥
‘देवता, पितर, ब्राह्मण, अभ्यागत, योद्धा तथा मित्रोंके लिये ही तो तुम्हारा धन खर्च होता है न?॥ ५५॥
‘कभी ऐसा तो नहीं होता कि कोऽइ मनुष्य किसी श्रेष्ठ, निर्दोष और शुद्धात्मा पुरुषपर भी दोष लगा दे तथा शास्त्रज्ञानमें कुशल विद्वानोंद्वारा उसके विषयमें विचार कराये बिना ही लोभवश उसे आर्थिक दण्ड दे दिया जाता हो?॥ ५६॥
‘नरश्रेष्ठ! जो चोरीमें पकड़ा गया हो, जिसे किसीने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछसे भी जिसके चोर होनेका प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध (चोरीका माल बरामद होना आदि) और भी बहुत-से कारण (सबूत) हों, ऐसे चोरको भी तुम्हारे राज्यमें धनके लालचसे छोड़ तो नहीं दिया जाता है?॥ ५७॥
‘रघुकुलभूषण! यदि धनी और गरीबमें कोऽइ विवाद छिड़ा हो और वह राज्यके न्यायालयमें निर्णयके लिये आया हो तो तुम्हारे बहुज्ञ मन्त्री धन आदिके लोभको छोड़कर उस मामलेपर विचार करते हैं न?॥ ५८॥
‘रघुनन्दन! निरपराध होनेपर भी जिन्हें मिथ्या दोष लगाकर दण्ड दिया जाता है, उन मनुष्योंकी आँखोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे पक्षपातपूर्ण शासन करनेवाले राजाके पुत्र और पशुओंका नाश कर डालते हैं॥ ५९॥
‘राघव! क्या तुम वृद्ध पुरुषों, बालकों और प्रधान-प्रधान वैद्योंका आन्तरिक अनुराग, मधुर वचन और धनदान—इन तीनोंके द्वारा सम्मान करते हो?॥ ६०॥
‘गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणोंको नमस्कार करते हो न?॥ ६१॥
‘तुम अर्थके द्वारा धर्मको अथवा धर्मके द्वारा अर्थको हानि तो नहीं पहुँचाते? अथवा आसक्ति और लोभरूप कामके द्वारा धर्म और अर्थ दोनोंमें बाधा तो नहीं आने देते?॥ ६२॥
‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता तथा दूसरोंको वर देनेमें समर्थ भरत! क्या तुम समयका विभाग करके धर्म, अर्थ और कामका योग्य समयमें सेवन करते हो?॥ ६३॥
‘महाप्राज्ञ! सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थको जाननेवाले ब्राह्मण पुरवासी और जनपदवासी मनुष्योंके साथ तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं न?॥ ६४॥
‘नास्तिकता, असत्य-भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषोंका संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत होना, राजकार्योंके विषयमें अकेले ही विचार करना, प्रयोजनको न समझनेवाले विपरीतदर्शी मूर्खोंसे सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्योंका शीघ्र प्रारम्भ न करना, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्योंका अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओंपर एक ही साथ चढ़ाई कर देना—ये राजाके चौदह दोष हैं। तुम इन दोषोंका सदा परित्याग करते हो न?॥ ६५—६७॥
‘महाप्राज्ञ भरत! दशवर्ग,^३ पञ्चवर्ग,^४ चतुर्वर्ग,^५ सप्तवर्ग,^६ अष्टवर्ग,^७ त्रिवर्ग,^८ तीन विद्या,^९ बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको जीतना, छः गुण,^१० दैवी^११ और मानुषी बाधाएँ, राजाके नीतिपूर्ण कार्य,^१२ विंशतिवर्ग,^१३ प्रकृतिमण्डल,^१४ यात्रा (शत्रुपर आक्रमण), दण्डविधान (व्यूहरचना) तथा दो-दो गुणोंकी^१५ योनिभूत संधि और विग्रह—इन सबकी ओर तुम यथार्थ रूपसे ध्यान देते हो न? इनमेंसे त्यागनेयोग्य दोषोंको त्यागकर ग्रहण करनेयोग्य गुणोंको ग्रहण करते हो न?॥ ६८—७०॥
‘विद्वन्! क्या तुम नीतिशास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चार या तीन मन्त्रियोंके साथ—सबको एकत्र करके अथवा सबसे अलग-अलग मिलकर सलाह करते हो?॥ ७१॥
‘क्या तुम वेदोंकी आज्ञाके अनुसार काम करके उन्हें सफल करते हो? क्या तुम्हारी क्रियाएँ सफल (उद्देश्यकी सिद्धि करनेवाली) हैं? क्या तुम्हारी स्त्रियाँ भी सफल (संतानवती) हैं? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान भी विनय आदि गुणोंका उत्पादक होकर सफल हुआ है?॥ ७२॥
‘रघुनन्दन! मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हारी बुद्धिका भी ऐसा ही निश्चय है न? क्योंकि यह विचार आयु और यशको बढ़ानेवाला तथा धर्म, काम और अर्थकी सिद्धि करनेवाला है॥ ७३॥
‘हमारे पिताजी जिस वृत्तिका आश्रय लेते हैं, हमारे प्रपितामहोंने जिस आचरणका पालन किया है, सत्पुरुष भी जिसका सेवन करते हैं और जो कल्याणका मूल है, उसीका तुम पालन करते हो न?॥ ७४॥
‘रघुनन्दन! तुम स्वादिष्ट अन्न अकेले ही तो नहीं खा जाते? उसकी आशा रखनेवाले मित्रोंको भी देते हो न?॥ ७५॥
‘इस प्रकार धर्मके अनुसार दण्ड धारण करनेवाला विद्वान् राजा प्रजाओंका पालन करके समूची पृथ्वीको यथावत्रूपसे अपने अधिकारमें कर लेता है तथा देहत्याग करनेके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है’॥ ७६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १००॥
१. शत्रुपक्षके मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्तःपुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनका व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारोंको काम बतानेवाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियोंका परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक—ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये। मतान्तरसे ये अठारह तीर्थ इस प्रकार हैं—मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तःपुराध्यक्ष, कारागाराध्यक्ष, धनाध्यक्ष, राजाकी आज्ञासे सेवकोंको काम बतानेवाला, वादी-प्रतिवादीसे मामलेकी पूछताछ करनेवाला, प्राड्विवाक (वकील), धर्मासनाधिकारी (न्यायाधीश), व्यवहार-निर्णोता, सभ्य, सेनाको जीविका-निर्वाहके लिये धन देनेका अधिकारी (सेनानायक), कर्मचारियोंको काम पूरा होनेपर वेतन देनेके लिये राजासे धन लेनेवाला, नगराध्यक्ष, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक, दुष्टोंको दण्ड देनेका अधिकारी तथा जल, पर्वत, वन एवं दुर्गम भूमिकी रक्षा करनेवाला—इनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये।
२. उपर्युक्त अठारह तीर्थोंमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं।
३. कामसे उत्पन्न होनेवाले दस दोषोंको दशवर्ग कहते हैं। ये राजाके लिये त्याज्य हैं। मनुजीने उनके नाम इस प्रकार गिनाये हैं—आखेट, जुआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्दा करना, स्त्रीमें आसक्त होना, मद्यपान, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना।
४. जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग, वृक्षदुर्ग, ऽइरिणदुर्ग और धन्वदुर्ग—ये पाँच प्रकारके दुर्ग पञ्चवर्ग कहलाते हैं। इनमें आरम्भके तीन तो प्रसिद्ध ही हैं। जहाँ किसी प्रकारकी खेती नहीं होती, ऐसे प्रदेशको ऽइरिण कहते हैं। बालूसे भरी मरूभूमिको धन्व कहते हैं। गर्मीके दिनोंमें वह शत्रुओंके लिये दुर्गम होती है। इन सब दुर्गोंका यथासमय उपयोग करके राजाको आत्मरक्षा करनी चाहिये।
५. साम, दान, भेद और दण्ड—इन चार प्रकारकी नीतिको चतुर्वर्ग कहते हैं।
६. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग—ये परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अङ्ग हैं। इन्हींको सप्तवर्ग कहा गया है।
७. चुगली, साहस, द्रोह, ऽईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता—ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष अष्टवर्ग माने गये हैं। किसी-किसीके मतमें खेतीकी उन्नति करना, व्यापारको बढ़ाना, दुर्ग बनवाना, पुल निर्माण कराना, जंगलसे हाथी पकड़कर मँगवाना, खानोंपर अधिकार प्राप्त करना, अधीन राजाओंसे कर लेना और निर्जन प्रदेशको आबाद करना—ये राजाके लिये उपादेय आठ गुण ही अष्टवर्ग हैं।
८. धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साह-शक्ति, प्रभुशक्ति तथा मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग कहते हैं।
९. त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये तीन विद्याएँ हैं। इनमें तीनों वेदोंको त्रयी कहते हैं। कृषि और गोरक्षा आदि वार्ताके अन्तर्गत हैं तथा नीतिशास्त्रका नाम दण्डनीति है।
१०. संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—ये छः गुण हैं। इनमें शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाऽइ छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षाकें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बरतना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।
११. आग लगना, बाढ़ आना, बीमारी फैलना, अकाल पड़ना और महामारीका प्रकोप होना—ये पाँच दैवी बाधाएँ हैं। राज्यके अधिकारियों, चोरों, शत्रुओं और राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे तथा स्वयं राजाके लोभसे जो भय प्राप्त होता है, उसे मानवी बाधा कहते हैं।
१२. शत्रु राजाओंके सेवकोंमेंसे जिनको वेतन न मिला हो, जो अपमानित किये गये हों, जो अपने मालिकके किसी बर्तावसे कुपित हों तथा जिन्हें भय दिखाकर डराया गया हो, ऐसे लोगोंको मनचाही वस्तु देकर फोड़ लेना राजाका कृत्य (नीतिपूर्ण कार्य) माना गया है॥
१३. बालक, वृद्ध, दीर्घकालका रोगी, जातिच्युत, डरपोक, भीरु मनुष्योंको साथ रखनेवाला, लोभी-लालची लोगोंको आश्रय देनेवाला, मन्त्री, सेनापति आदि प्रकृतियोंको असंतुष्ट रखनेवाला, विषयोंमें आसक्त, चञ्चलचित्त मनुष्योंसे सलाह लेनेवाला, देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला, दैवका मारा हुआ, भाग्यके भरोसे पुरुषार्थ न करनेवाला, दुर्भिक्षसे पीड़ित, सैनिक-कष्टसे युक्त (सेनारहित), स्वदेशमें न रहनेवाला, अधिक शत्रुओंवाला, अकाल (क्रूर ग्रहदशा आदिसे युक्त) और सत्यधर्मसे रहित—ये बीस प्रकारके राजा संधिके योग्य नहीं माने गये हैं। इन्हींको विंशतिवर्गके नामसे कहा गया है।
१४. राज्यके स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना—राज्यके इन सात अङ्गोंको ही प्रकृतिमण्डल कहते हैं। किसी-किसीके मतमें मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना और दण्ड— ये पाँच प्रकृतियाँ अलग हैं और बारह राजाओंके समूहको मण्डल कहा है।
१५. द्वैधीभाव और समाश्रय—ये इनकी योनिसंधि हैं और यान तथा आसन इनकी योनिविग्रह हैं, अर्थात् प्रथम दो संघिमूलक और अन्तिम दो विग्रहमूलक हैं।