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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

आठवाँ सर्ग

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आठवाँ सर्ग

सुग्रीवका श्रीरामसे अपना दुःख निवेदन करना और श्रीरामका उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयोंमें वैर होनेका कारण पूछना

श्रीरामचन्द्रजीकी उस बातसे सुग्रीवको बड़ा संतोष हुआ। वे हर्षसे भरकर लक्ष्मणके बड़े भाई शूरवीर श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘भगवन्! इसमें संदेह नहीं कि देवताओंकी मेरे ऊपर बड़ी कृपा है—मैं सर्वथा उनके अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि आप-जैसे गुणवान् महापुरुष मेरे सखा हो गये॥

‘प्रभो! निष्पाप श्रीराम! आप-जैसे सहायकके सहयोगसे तो देवताओंका राज्य भी अवश्य ही प्राप्त किया जा सकता है; फिर अपने खोये हुए राज्यको पाना कौन बड़ी बात है॥ ३ ॥

‘रघुनन्दन! अब मैं अपने बन्धुओं और सुहृदोंके विशेष सम्मानका पात्र हो गया; क्योंकि आज रघुवंशके राजकुमार आप अग्निको साक्षी बनाकर मुझे मित्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं॥ ४ ॥

‘मैं भी आपके योग्य मित्र हूँ। इसका ज्ञान आपको धीरे-धीरे हो जायगा। इस समय आपके सामने मैं अपने गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ॥ ५ ॥

‘आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम! आप-जैसे पुण्यात्मा महात्माओंका प्रेम और धैर्य अधिकाधिक बढ़ता और अविचल होता है॥ ६ ॥

‘अच्छे स्वभाववाले मित्र अपने घरके सोने-चाँदी अथवा उत्तम आभूषणोंको अपने अच्छे मित्रोंके लिये अविभक्त ही मानते हैं—उन मित्रोंका अपने धनपर अपने ही समान अधिकार समझते हैं॥ ७ ॥

‘अतएव मित्र धनी हो या दरिद्र, सुखी हो या दुःखी अथवा निर्दोष हो या सदोष, वह मित्रके लिये सबसे बड़ा सहायक होता है॥ ८ ॥

‘अनघ! साधुपुरुष अपने मित्रका अत्यन्त उत्कृष्ट प्रेम देख आवश्यकता पड़नेपर उसके लिये धन, सुख और देशका भी परित्याग कर देते हैं’॥ ९ ॥

यह सुनकर लक्ष्मी (दिव्य कान्ति) से उपलक्षित श्रीरामचन्द्रजीने इन्द्रतुल्य तेजस्वी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सामने ही प्रिय वचन बोलनेवाले सुग्रीवसे कहा—‘सखे! तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है’॥ १० ॥

तदनन्तर (दूसरे दिन) महाबली श्रीराम और लक्ष्मणको खड़ा देख सुग्रीवने वनमें चारों ओर अपनी चञ्चल दृष्टि दौड़ायी॥ ११ ॥

उस समय वानरराजने पास ही एक सालका वृक्ष देखा, जिसमें थोड़ेसे ही सुन्दर पुष्प लगे हुए थे; परंतु उसमें पत्रोंकी बहुलता थी। उस वृक्षपर मँडराते हुए भौंरे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ १२ ॥

उसकी एक डालीको जिसमें अधिक पत्ते थे और जो पुष्पोंसे सुशोभित थी, सुग्रीवने तोड़ डाला और उसे श्रीरामके लिये बिछाकर वे स्वयं भी उनके साथ ही उसपर बैठ गये॥ १३ ॥

उन दोनोंको आसनपर विराजमान देख हनुमान्‌जीने भी सालकी एक डाल तोड़ डाली और उसपर विनयशील लक्ष्मणको बैठाया॥ १४ ॥

उस श्रेष्ठ पर्वतपर, जहाँ सब ओर सालके पुष्प बिखरे हुए थे, सुखपूर्वक बैठे हुए श्रीराम शान्त समुद्रके समान प्रसन्न दिखायी देते थे। उन्हें देखकर अत्यन्त हर्षसे भरे हुए सुग्रीवने श्रीरामसे स्निग्ध एवं सुन्दर वाणीमें वार्तालाप आरम्भ किया। उस समय आनन्दातिरेकसे उनकी वाणी लड़खड़ा जाती थी—अक्षरोंका स्पष्ट उच्चारण नहीं हो पाता था॥ १५-१६ ॥

‘प्रभो! मेरे भाईने मुझे घरसे निकालकर मेरी स्त्रीको भी छीन लिया है। मैं उसीके भयसे अत्यन्त पीड़ित एवं दुःखी होकर इस पर्वतश्रेष्ठ ऋष्यमूकपर विचरता रहता हूँ॥ १७ ॥

‘मुझे बराबर उसका त्रास बना रहता है। मैं भयमें डूबा रहकर भ्रान्तचित्त हो इस वनमें भटकता फिरता हूँ। रघुनन्दन! मेरे भाई वालीने मुझे घरसे निकालनेके बाद भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है॥ १८ ॥

‘प्रभो! आप समस्त लोकोंको अभय देनेवाले हैं। मैं वालीके भयसे दुःखी और अनाथ हूँ, अतः आपको मुझपर भी कृपा करनी चाहिये’॥ १९ ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर तेजस्वी, धर्मज्ञ एवं धर्मवत्सल भगवान् श्रीरामने उन्हें हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २० ॥

‘सखे! उपकार ही मित्रताका फल है और अपकार शत्रुताका लक्षण है; अतः मैं आज ही तुम्हारी स्त्रीका अपहरण करनेवाले उस वालीका वध करूँगा॥ २१ ॥

‘महाभाग! मेरे इन बाणोंका तेज प्रचण्ड है। सुवर्णभूषित ये शर कार्तिकेयकी उत्पत्तिके स्थानभूत शरोंके वनमें उत्पन्न हुए हैं। (इसलिये अभेद्य हैं)॥ २२ ॥

‘ये कंकपक्षीके परोंसे युक्त हैं और इन्द्रके वज्रकी भाँति अमोघ हैं। इनकी गाँठें सुन्दर और अग्रभाग तीखे हैं। ये रोषमें भरे भुजङ्गोंकी भाँति भयंकर हैं॥ २३ ॥

‘इन बाणोंसे तुम अपने वाली नामक शत्रुको, जो भाई होकर भी तुम्हारी बुराई कर रहा है, विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति मरकर पृथ्वीपर पड़ा देखोगे’॥ २४ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर वानरसेनापति सुग्रीवको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे उन्हें बारंबार साधुवाद देते हुए बोले—॥ २५ ॥

‘श्रीराम! मैं शोकसे पीड़ित हूँ और आप शोकाकुल प्राणियोंकी परमगति हैं। मित्र समझकर मैं आपसे अपना दुःख निवेदन करता हूँ॥ २६ ॥

‘मैंने आपके हाथमें हाथ देकर अग्निदेवके सामने आपको अपना मित्र बनाया है। इसलिये आप मुझे अपने प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। यह बात मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ॥ २७ ॥

‘आप मेरे मित्र हैं, इसलिये आपपर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने भीतरका दुःख, जो सदा मेरे मनको व्याकुल किये रहता है, आपको बता रहा हूँ’॥ २८ ॥

इतनी बात कहते-कहते सुग्रीवके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उनकी वाणी अश्रुगद्गद हो गयी। इसलिये वे उच्च स्वरसे बोलनेमें समर्थ न हो सके॥ २९ ॥

तत्पश्चात् सुग्रीवने सहसा बढ़े हुए नदीके वेगके समान उमड़े हुए आँसुओंके वेगको श्रीरामके समीप धैर्यपूर्वक रोका॥ ३० ॥

आँसुओंको रोककर अपने दोनों सुन्दर नेत्रोंको पोंछनेके पश्चात् तेजस्वी सुग्रीव पुनः लंबी साँस खींचकर श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ ३१ ॥

‘श्रीराम! पहलेकी बात है, बलिष्ठ वालीने कटुवचन सुनाकर बलपूर्वक मेरा तिरस्कार किया और अपने राज्य (युवराजपद) से नीचे उतार दिया॥ ३२ ॥

‘इतना ही नहीं, मेरी स्त्रीको भी, जो मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है; उसने छीन लिया और जितने मेरे सुहृद् थे, उन सबको कैदमें डाल दिया॥ ३३ ॥

‘रघुनन्दन! इसके बाद भी वह दुरात्मा वाली मेरे विनाशके लिये यत्न करता रहता है। उसके भेजे हुए बहुत-से वानरोंका मैं वध कर चुका हूँ॥ ३४ ॥

‘रघुनाथजी! आपको भी देखकर मेरे मनमें ऐसा ही संदेह हुआ था, इसीलिये डर जानेके कारण मैं पहले आपके पास न आ सका; क्योंकि भयका अवसर आनेपर प्रायः सभी डर जाते हैं॥ ३५ ॥

‘केवल ये हनुमान् आदि वानर ही मेरे सहायक हैं; अतएव महान् संकटमें पड़कर भी मैं अबतक प्राण धारण करता हूँ॥ ३६ ॥

‘इन लोगोंका मुझपर स्नेह है, अतः ये सभी वानर सब ओरसे सदा मेरी रक्षा करते रहते हैं। जहाँ जाना होता है वहाँ साथ-साथ जाते हैं और जब कहीं मैं ठहर जाता हूँ वहाँ ये नित्य मेरे साथ रहते हैं॥ ३७ ॥

‘रघुनन्दन! यह मैंने संक्षेपसे अपनी हालत बतलायी है। आपके सामने विस्तारपूर्वक कहनेसे क्या लाभ? वाली मेरा ज्येष्ठ भाई है, फिर भी इस समय मेरा शत्रु हो गया है। उसका पराक्रम सर्वत्र विख्यात है॥ ३८ ॥

‘(यद्यपि भाईका नाश भी दुःखका ही कारण है, तथापि) इस समय जो मेरा दुःख है, वह उसका नाश होनेपर ही मिट सकता है। मेरा सुख और जीवन उसके विनाशपर ही निर्भर है॥ ३९ ॥

‘श्रीराम! यही मेरे शोकके नाशका उपाय है। मैंने शोकसे पीड़ित होनेके कारण आपसे यह बात निवेदन की है; क्योंकि मित्र दुःखमें हो या सुखमें, वह अपने मित्रकी सदा ही सहायता करता है’॥ ४० ॥

यह सुनकर श्रीरामने सुग्रीवसे कहा—‘तुम दोनों भाइयोंमें वैर पड़नेका क्या कारण है, यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ॥ ४१ ॥

‘वानरराज! तुमलोगोंकी शत्रुताका कारण सुनकर तुम दोनोंकी प्रबलता और निर्बलताका निश्चय करके फिर तत्काल ही तुम्हें सुखी बनानेवाला उपाय करूँगा॥ ४२ ॥

‘जैसे वर्षाकालमें नदी आदिका वेग बहुत बढ़ जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे अपमानित होनेकी बात सुनकर मेरा प्रबल रोष बढ़ता जा रहा है और मेरे हृदयको कम्पित किये देता है॥ ४३ ॥

‘मेरे धनुष चढ़ानेके पहले ही तुम अपनी सब बातें प्रसन्नतापूर्वक कह डालो; क्योंकि ज्यों ही मैंने बाण छोड़ा, तुम्हारा शत्रु तत्काल कालके गालमें चला जायगा’॥ ४४ ॥

महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सुग्रीवको अपने चारों वानरोंके साथ अपार हर्ष हुआ॥ ४५ ॥

तदनन्तर सुग्रीवके मुखपर प्रसन्नता छा गयी और उन्होंने श्रीरामको वालीके साथ वैर होनेका यथार्थ कारण बताना आरम्भ किया॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८॥