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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उन्नीसवाँ सर्ग

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उन्नीसवाँ सर्ग

अङ्गदसहित ताराका भागे हुए वानरोंसे बात करके वालीके समीप आना और उसकी दुर्दशा देखकर रोना

वानरोंका महाराज वाली बाणसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ा था। श्रीरामचन्द्रजीके युक्तियुक्त वचनोंद्वारा अपनी बातका उत्तर पाकर उसे फिर कोई जवाब न सूझा॥ १ ॥

पत्थरोंकी मार पड़नेसे उसके अङ्ग टूट-फूट गये थे। वृक्षोंके आघातसे भी वह बहुत घायल हो गया था और श्रीरामके बाणसे आक्रान्त होकर तो वह जीवनके अन्तकालमें ही पहुँच गया था। उस समय वह मूर्च्छित हो गया॥ २ ॥

उसकी पत्नी ताराने सुना कि युद्धस्थलमें वानरश्रेष्ठ वाली श्रीरामके चलाये हुए बाणसे मारे गये॥ ३ ॥

अपने स्वामीके वधका अत्यन्त भयंकर एवं अप्रिय समाचार सुनकर वह बहुत उद्विग्न हो उठी और अपने पुत्र अङ्गदको साथ ले उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली॥ ४ ॥

अङ्गदको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करनेवाले जो महाबली वानर थे, वे श्रीरामचन्द्रजीको धनुष लिये देख भयभीत होकर भाग चले॥ ५ ॥

ताराने वेगसे भागकर आते हुए उन भयभीत वानरोंको देखा। वे जिनके यूथपति मारे गये हों, उन यूथभ्रष्ट मृगोंके समान जान पड़ते थे॥ ६ ॥

वे सब वानर श्रीरामसे इस प्रकार डरे हुए थे, मानो उनके बाण इनके पीछे आ रहे हों। उन दुःखी वानरोंके पास पहुँचकर सती-साध्वी तारा और भी दुःखी हो गयी तथा उनसे इस प्रकार बोली—॥ ७ ॥

‘वानरो! तुम तो उन राजसिंह वालीके आगे-आगे चलनेवाले थे। अब उन्हें छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो दुर्गतिमें पड़कर क्यों भागे जा रहे हो?॥ ८ ॥

‘यदि राज्यके लोभसे उस क्रूर भाई सुग्रीवने श्रीरामको प्रेरित करके उनके द्वारा दूरसे चलाये हुए और दूरतक जानेवाले बाणोंद्वारा अपने भाईको मरवा दिया है तो तुमलोग क्यों भागे जा रहे हो?’॥ ९ ॥

वालीकी पत्नीका वह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरोंने कल्याणमयी तारा देवीको सम्बोधित करके सर्वसम्मतिसे स्पष्ट शब्दोंमें यह समयोचित बात कही— ॥ १० ॥

‘देवि! अभी तुम्हारा पुत्र जीवित है। तुम लौट चलो और अपने पुत्र अङ्गदकी रक्षा करो। श्रीरामका रूप धारण करके स्वयं यमराज आ पहुँचा है, जो वालीको मारकर अपने साथ ले जा रहा है॥ ११ ॥

‘वालीके चलाये हुए वृक्षों और बड़ी-बड़ी शिलाओंको अपने वज्रतुल्य बाणोंसे विदीर्ण करके श्रीरामने वालीको मार गिराया है। मानो वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके द्वारा किसी महान् पर्वतको धराशायी कर दिया हो॥ १२ ॥

‘इन्द्रके समान तेजस्वी इन वानरश्रेष्ठ वालीके मारे जानेपर यह सारी वानर-सेना श्रीरामसे पराजित-सी होकर भाग खड़ी हुई है॥ १३ ॥

‘तुम शूरवीरोंद्वारा इस नगरीकी रक्षा करो। कुमार अङ्गदका किष्किन्धाके राज्यपर अभिषेक कर दो। राजसिंहासनपर बैठे हुए वालिकुमार अङ्गदकी सभी वानर सेवा करेंगे॥ १४ ॥

‘अथवा सुमुखि! अब इस नगरमें तुम्हारा रहना हमें अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि किष्किन्धाके दुर्गम स्थानोंमें अभी सुग्रीवपक्षीय वानर शीघ्र प्रवेश करेंगे। यहाँ बहुत-से ऐसे वनचारी वानर हैं, जिनमेंसे कुछ तो अपनी स्त्रियोंके साथ हैं और कुछ स्त्रियोंसे बिछुड़े हुए हैं। उनमें राज्यविषयक लोभ पैदा हो गया है और पहले हमलोगोंके द्वारा राज्य-सुखसे वञ्चित किये गये हैं। अतः इस समय उन सबसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है’॥ १५-१६ ॥

अभी थोड़ी ही दूरतक आये हुए उन वानरोंकी यह बात सुनकर मनोहर हासवाली कल्याणी ताराने उन्हें अपने अनुरूप उत्तर दिया— ॥ १७ ॥

‘वानरो! जब मेरे महाभाग पतिदेव कपिसिंह वाली ही नष्ट हो रहे हैं, तब मुझे पुत्रसे, राज्यसे तथा अपने इस जीवनसे भी क्या प्रयोजन है?॥ १८ ॥

‘मैं तो, जिन्हें श्रीरामके चलाये हुए बाणने मार गिराया है, उन महात्मा वालीके चरणोंके समीप ही जाऊँगी’॥ १९ ॥

ऐसा कहकर शोकसे व्याकुल हुई तारा रोती और अपने दोनों हाथोंसे दुःखपूर्वक सिर एवं छाती पीटती हुई बड़े जोरसे दौड़ी॥ २० ॥

आगे बढ़ती हुई ताराने देखा, जो युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले दानवराजोंका भी वध करनेमें समर्थ थे, वे मेरे पति वानरराज वाली पृथ्वीपर पड़े हुए हैं॥ २१ ॥

वज्र चलानेवाले इन्द्रके समान जो रणभूमिमें बड़े-बड़े पर्वतोंको उठाकर फेंकते थे, जिनके वेगमें प्रचण्ड आँधीका समावेश था, जिनका सिंहनाद महान् मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको भी तिरस्कृत कर देता था तथा जो इन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे, वे ही इस समय वर्षा करके शान्त हुए बादलके समान चेष्टासे विरत हो गये हैं। जो स्वयं गर्जना करके गर्जनेवाले वीरोंके मनमें भय उत्पन्न कर देते थे, वे शूरवीर वाली एक दूसरे शूरवीरके द्वारा मार गिराये गये हैं। जैसे मांसके लिये एक सिंहने दूसरे सिंहको मार डाला हो, उसी प्रकार राज्यके लिये अपने भाईके द्वारा ही इनका वध किया गया है॥ २२-२३ ॥

जो सब लोगोंके द्वारा पूजित हो, जहाँ पताका फहरायी गयी हो तथा जिसके पास देवताकी वेदी शोभा पाती हो, उस चैत्य वृक्ष या देवालयको वहाँ छिपे हुए किसी नागको पकड़नेके लिये यदि गरुड़ने मथ डाला हो—नष्ट-भ्रष्ट कर दिया हो तो उसकी जैसी दुरवस्था देखी जाती है, वैसी ही दशा आज वालीकी हो रही है (यह सब ताराने देखा)॥ २४ ॥

आगे जानेपर उसने देखा, अपने तेजस्वी धनुषको धरतीपर टेककर उसके सहारे श्रीरामचन्द्रजी खड़े हैं। साथ ही उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं और वहीं पतिके छोटे भाई सुग्रीव भी मौजूद हैं॥ २५ ॥

उन सबको पार करके वह रणभूमिमें घायल पड़े हुए अपने पतिके पास पहुँची। उन्हें देखकर उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ २६ ॥

फिर मानो वह सोकर उठी हो, इस प्रकार ‘हा आर्यपुत्र!’ कहकर मृत्युपाशसे बँधे हुए पतिकी ओर देखती हुई रोने लगी॥ २७ ॥

उस समय कुररीके समान करुण क्रन्दन करती हुई तारा तथा उसके साथ आये हुए अङ्गदको देखकर सुग्रीवको बड़ा कष्ट हुआ। वे विषादमें डूब गये॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९॥