श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
चौंतीसवाँ सर्ग
चौंतीसवाँ सर्ग
वालीके द्वारा रावणका पराभव तथा रावणका उन्हें अपना मित्र बनाना
अर्जुनसे छुटकारा पाकर राक्षसराज रावण निर्वेदरहित हो पुनः सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगा॥ १ ॥
राक्षस हो या मनुष्य, जिसको भी वह बलमें बढ़ा-चढ़ा सुनता था, उसीके पास पहुँचकर अभिमानी रावण उसे युद्धके लिये ललकारता था॥ २ ॥
तदनन्तर एक दिन वह वालीद्वारा पालित किष्किन्धापुरीमें जाकर सुवर्णमालाधारी वालीको युद्धके लिये ललकारने लगा॥ ३ ॥
उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए रावणसे वालीके मन्त्री तार, ताराके पिता सुषेण तथा युवराज अङ्गद एवं सुग्रीवने कहा— ॥ ४ ॥
‘राक्षसराज! इस समय वाली तो बाहर गये हुए हैं। वे ही आपकी जोड़के हो सकते हैं। दूसरा कौन वानर आपके सामने ठहर सकता है॥ ५ ॥
‘रावण! चारों समुद्रोंसे सन्ध्योपासन करके वाली अब आते ही होंगे। आप दो घड़ी ठहर जाइये॥ ६ ॥
‘राजन्! देखिये, ये जो शङ्खके समान उज्ज्वल हड्डियोंके ढेर लग रहे हैं, ये वालीके साथ युद्धकी इच्छासे आये हुए आप-जैसे वीरोंके ही हैं। वानरराज वालीके तेजसे ही इन सबका अन्त हुआ है॥ ७ ॥
‘राक्षस रावण! यदि आपने अमृतका रस पी लिया हो तो भी जब आप वालीसे टक्कर लेंगे, तब वही आपके जीवनका अन्तिम क्षण होगा॥ ८ ॥
‘विश्रवाकुमार! वाली सम्पूर्ण आश्चर्यके भण्डार हैं। आप इस समय इनका दर्शन करेंगे। केवल इसी मुहूर्ततक उनकी प्रतीक्षाके लिये ठहरिये; फिर तो आपके लिये जीवन दुर्लभ हो जायगा॥ ९ ॥
‘अथवा यदि आपको मरनेके लिये बहुत जल्दी लगी हो तो दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाइये। वहाँ आपको पृथ्वीपर स्थित हुए अग्निदेवके समान वालीका दर्शन होगा’॥ १० ॥
तब लोकोंको रुलानेवाले रावणने तारको भला-बुरा कहकर पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो दक्षिण समुद्रकी ओर प्रस्थान किया॥ ११॥
वहाँ रावणने सुवर्णगिरिके समान ऊँचे वालीको संध्योपासन करते हुए देखा। उनका मुख प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे उद्भासित हो रहा था॥ १२ ॥
उन्हें देखकर काजलके समान काला रावण पुष्पकसे उतर पड़ा और वालीको पकड़नेके लिये जल्दी-जल्दी उनकी ओर बढ़ने लगा। उस समय वह अपने पैरोंकी आहट नहीं होने देता था॥ १३ ॥
दैवयोगसे वालीने भी रावणको देख लिया; किंतु वे उसके पापपूर्ण अभिप्रायको जानकर भी घबराये नहीं॥ १४ ॥
जैसे सिंह खरगोशको और गरुड़ सर्पको देखकर भी उसकी परवा नहीं करता, उसी प्रकार वालीने पापपूर्ण विचार रखनेवाले रावणको देखकर भी चिन्ता नहीं की॥ १५ ॥
उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि जब पापात्मा रावण मुझे पकड़नेकी इच्छासे निकट आयेगा, तब मैं इसे काँखमें दबाकर लटका लूँगा और इसे लिये-दिये शेष तीन महासागरोंपर भी हो आऊँगा॥ १६ ॥
इसकी जाँघ, हाथ-पैर और वस्त्र खिसकते होंगे। यह मेरी काँखमें दबा होगा और उस दशामें लोग मेरे शत्रुको गरुड़के पंजेमें दबे हुए सर्पके समान लटकते देखेंगे॥ १७ ॥
ऐसा निश्चय करके वाली मौन ही रहे और वैदिक मन्त्रोंका जप करते हुए गिरिराज सुमेरुकी भाँति खड़े रहे॥ १८ ॥
इस प्रकार बलके अभिमानसे भरे हुए वे वानरराज और राक्षसराज दोनों एक-दूसरेको पकड़ना चाहते थे। दोनों ही इसके लिये प्रयत्नशील थे और दोनों ही वह काम बनानेकी घातमें लगे थे॥ १९ ॥
रावणके पैरोंकी हलकी-सी आहटसे वाली यह समझ गये कि अब रावण हाथ बढ़ाकर मुझे पकड़ना चाहता है। फिर तो दूसरी ओर मुँह किये होनेपर भी वालीने उसे उसी तरह सहसा पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेता है॥ २० ॥
पकड़नेकी इच्छावाले उस राक्षसराजको वालीने स्वयं ही पकड़कर अपनी काँखमें लटका लिया और बड़े वेगसे वे आकाशमें उछले॥ २१ ॥
रावण अपने नखोंसे बारम्बार वालीको बकोटता और पीड़ा देता रहा, तो भी जैसे वायु बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वाली रावणको बगलमें दबाये लिये फिरते थे॥ २२ ॥
इस प्रकार रावणके हर लिये जानेपर उसके मन्त्री उसे वालीसे छुड़ानेके लिये कोलाहल करते हुए उनके पीछे-पीछे दौड़ते रहे॥ २३ ॥
पीछे-पीछे राक्षस चलते थे और आगे-आगे वाली। इस अवस्थामें वे आकाशके मध्यभागमें पहुँचकर मेघसमूहोंसे अनुगत हुए आकाशवर्ती अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पाते थे॥ २४ ॥
वे श्रेष्ठ राक्षस बहुत प्रयत्न करनेपर भी वालीके पासतक न पहुँच सके। उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे उत्पन्न हुई वायुके थपेड़ोंसे थककर वे खड़े हो गये॥ २५ ॥
वालीके मार्गसे उड़ते हुए बड़े-बड़े पर्वत भी हट जाते थे; फिर रक्त-मांसमय शरीर धारण करनेवाला और जीवनकी रक्षा चाहनेवाला प्राणी उनके मार्गसे हट जाय, इसके लिये तो कहना ही क्या है॥ २६ ॥
जितनी देरमें वाली समुद्रोंतक पहुँचते थे, उतनी देरमें तीव्रगामी पक्षियोंके समूह भी नहीं पहुँच पाते थे। उन महावेगशाली वानरराजने क्रमशः सभी समुद्रोंके तटपर पहुँचकर संध्या-वन्दन किया॥ २७ ॥
समुद्रोंकी यात्रा करते हुए आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ वालीकी सभी खेचर प्राणी पूजा एवं प्रशंसा करते थे। वे रावणको बगलमें दबाये हुए पश्चिम समुद्रके तटपर आये॥ २८ ॥
वहाँ स्नान, संध्योपासन और जप करके वे वानरवीर दशाननको लिये-दिये उत्तर समुद्रके तटपर जा पहुँचे॥ २९ ॥
वायु और मनके समान वेगवाले वे महावानर वाली कई सहस्र योजनतक रावणको ढोते रहे। फिर अपने उस शत्रुके साथ ही वे उत्तर समुद्रके किनारे गये॥
उत्तरसागरके तटपर संध्योपासना करके दशाननका भार वहन करते हुए वाली पूर्व दिशावर्ती महासागरके किनारे गये॥ ३१ ॥
वहाँ भी संध्योपासना सम्पन्न करके वे इन्द्रपुत्र वानरराज वाली दशमुख रावणको बगलमें दबाये फिर किष्किन्धापुरीके निकट आये॥ ३२ ॥
इस तरह चारों समुद्रोंमें संध्योपासनाका कार्य पूरा करके रावणको ढोनेके कारण थके हुए वानरराज वाली किष्किन्धाके उपवनमें आ पहुँचे॥ ३३॥
वहाँ आकर उन कपिश्रेष्ठने रावणको अपनी काँखसे छोड़ दिया और बारम्बार हँसते हुए पूछा— ‘कहो जी, तुम कहाँसे आये हो’॥ ३४॥
रावणकी आँखें श्रमके कारण चञ्चल हो रही थीं। वालीके इस अद्भुत पराक्रमको देखकर उसे महान् आश्चर्य हुआ और उस राक्षसराजने उन वानरराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ३५॥
‘महेन्द्रके समान पराक्रमी वानरेन्द्र! मैं राक्षसेन्द्र रावण हूँ और युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ आया था, सो वह युद्ध तो आपसे मिल ही गया॥ ३६॥
‘अहो! आपमें अद्भुत बल है, अद्भुत पराक्रम है और आश्चर्यजनक गम्भीरता है। आपने मुझे पशुकी तरह पकड़कर चारों समुद्रोंपर घुमाया है॥ ३७॥
‘वानरवीर! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा शूरवीर होगा, जो मुझे इस प्रकार बिना थके-माँदे शीघ्रतापूर्वक ढो सके॥ ३८॥
‘वानरराज! ऐसी गति तो मन, वायु और गरुड़— इन तीन भूतोंकी ही सुनी गयी है। निःसंदेह इस जगतमें चौथे आप भी ऐसे तीव्र वेगवाले हैं॥ ३९॥
‘कपिश्रेष्ठ! मैंने आपका बल देख लिया। अब मैं अग्निको साक्षी बनाकर आपके साथ सदाके लिये स्नेहपूर्ण मित्रता कर लेना चाहता हूँ॥ ४०॥
‘वानरराज! स्त्री, पुत्र, नगर, राज्य, भोग, वस्त्र और भोजन—इन सभी वस्तुओंपर हम दोनोंका साझेका अधिकार होगा’॥ ४१॥
तब वानरराज और राक्षसराज दोनोंने अग्नि प्रज्वलित करके एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर आपसमें भाईचारेका सम्बन्ध जोड़ा॥ ४२॥
फिर वे दोनों वानर और राक्षस एक-दूसरेका हाथ पकड़े बड़ी प्रसन्नताके साथ किष्किन्धापुरीके भीतर गये, मानो दो सिंह किसी गुफामें प्रवेश कर रहे हों॥ ४३॥
रावण वहाँ सुग्रीवकी तरह सम्मानित हो महीनेभर रहा। फिर तीनों लोकोंको उखाड़ फेंकनेकी इच्छा रखनेवाले उसके मन्त्री आकर उसे लिवा ले गये॥ ४४॥
प्रभो! इस प्रकार यह घटना पहले घटित हो चुकी है। वालीने रावणको हराया और फिर अग्निके समीप उसे अपना भाई बना लिया॥ ४५॥
श्रीराम! वालीमें बहुत अधिक और अनुपम बल था, परंतु आपने उसको भी अपनी बाणाग्निसे उसी तरह दग्ध कर डाला, जैसे आग पतिंगेको जला देती है॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥