श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उनतालीसवाँ सर्ग
उनतालीसवाँ सर्ग
राजाओंका श्रीरामके लिये भेंट देना और श्रीरामका वह सब लेकर अपने मित्रों, वानरों, रीछों और राक्षसोंको बाँट देना तथा वानर आदिका वहाँ सुखपूर्वक रहन ा
अयोध्यासे प्रस्थित हो वे महामना भूपाल सहस्रों हाथी, घोड़े तथा पैदल-समूहोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से हर्षपूर्वक आगे बढ़ने लगे॥ १ ॥
भरतकी आज्ञासे श्रीरामचन्द्रजीकी सहायताके लिये वहाँ कऽइ अक्षौहिणी सेनाएँ युद्धके लिये उद्यत होकर आयी थीं। उन सबके सैनिक और वाहन हर्ष एवं उत्साहसे भरे हुए थे॥ २ ॥
वे सभी भूपाल बलके घमंडमें भरकर आपसमें इस तरहकी बातें करने लगे— ‘हमलोगोंने युद्धमें श्रीराम और रावणको आमने-सामने खड़ा नहीं देखा॥ ३ ॥
‘भरतने (पहले तो सूचना नहीं दी) पीछे युद्ध समाप्त हो जानेपर हमें व्यर्थ ही बुला लिया। यदि सब राजा गये होते तो उनके द्वारा समस्त राक्षसोंका संहार बहुत जल्दी हो गया होता, इसमें संशय नहीं है॥ ४ ॥
‘श्रीराम और लक्ष्मणके बाहुबलसे सुरक्षित एवं निश्चिन्त हो हमलोग समुद्रके उस पार सुखपूर्वक युद्ध कर सकते थे’॥ ५ ॥
ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहते हुए वे सहस्रों नरेश बड़े हर्षके साथ अपने-अपने राज्यको गये॥
उनके अपने-अपने प्रसिद्ध राज्य समृद्धिशाली, सुख और आनन्दसे परिपूर्ण, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा रत्न आदिसे भरे-पूरे थे। उन राज्यों तथा नगरोंमें जाकर उन नरेशोंने श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे नाना प्रकारके रत्न और उपहार भेजे। घोड़े, सवारियाँ, रत्न, मतवाले हाथी, उत्तम चन्दन, दिव्य आभूषण, मणि, मोती, मूँगे, रूपवती दासियाँ, नाना प्रकारकी बकरियाँ और भेड़ें तथा तरह-तरहके बहुत-से रथ भेंट किये॥ ७—१० ॥
महाबली भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन रत्नोंको लेकर पुनः अपनी पुरीमें लौट आये। रमणीय पुरी अयोध्यामें आकर उन तीनों पुरुषप्रवर बन्धुओंने ये विचित्र रत्न श्रीरामको समर्पित कर दिये॥ ११-१२ ॥
उन सबको ग्रहण करके महात्मा श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ उपकारी वानरराज सुग्रीव और विभीषणको तथा अन्य राक्षसों और वानरोंको भी बाँट दिया; क्योंकि उन्हींसे घिरे रहकर भगवान् श्रीरामने युद्धमें विजय प्राप्त की थी॥ १३-१४॥
उन सभी महाबली वानरों और राक्षसोंने श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए वे रत्न अपने मस्तक और भुजाओंमें धारण कर लिये॥ १५ ॥
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनरेश महापराक्रमी महारथी कमलनयन श्रीरामने महाबाहु हनुमान् और अङ्गदको गोदमें बैठाकर सुग्रीवसे इस प्रकार कहा—'सुग्रीव! अङ्गद तुम्हारे सुपुत्र हैं और पवनकुमार हनुमान् मन्त्री। वानरराज! ये दोनों मेरे लिये मन्त्रीका भी काम देते थे और सदा मेरे हित-साधनमें लगे रहते थे। इसलिये और विशेषतः तुम्हारे नाते ये मेरी ओरसे विविध आदर-सत्कार एवं भेंट पानेके योग्य हैं'॥ १६—१८॥
ऐसा कहकर महायशस्वी श्रीरामने अपने शरीरसे बहुमूल्य आभूषण उतारकर उन्हें अङ्गद तथा हनुमान्के अङ्गोंमें बाँध दिया॥ १९॥
इसके बाद श्रीरघुनाथजीने महापराक्रमी वानरयूथ पतियों—नील, नल, केसरी, कुमुद, गन्धमादन, सुषेण, पनस, वीर मैन्द, द्विविद, जाम्बवान्, गवाक्ष, विनत, धूम्र, बलीमुख, प्रजङ्घ, महाबली संनाद, दरीमुख, दधिमुख और यूथप इन्द्रजानुको बुलाकर उनकी ओर दोनों नेत्रोंसे इस प्रकार देखा, मानो वे उन्हें नेत्रपुटोंद्वारा पी रहे हों। उन्होंने स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें उनसे कहा—'वानरवीरो! आपलोग मेरे सुहृद्, शरीर और भाईँ हैं। आपने ही मुझे संकटसे उबारा है। आप-जैसे श्रेष्ठ सुहृदोंको पाकर राजा सुग्रीव धन्य हैं'॥ २०—२४॥
ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने उन्हें यथायोग्य आभूषण और बहुमूल्य हीरे दिये तथा उनका आलिङ्गन किया॥ २५॥
मधुके समान पिङ्गल वर्णवाले वे वानर वहाँ सुगन्धित मधु पीते, राजभोग वस्तुओंका उपभोग करते और स्वादिष्ट फल-मूल खाते थे॥ २६ ॥
इस प्रकार निवास करते हुए उन वानरोंका वहाँ एक महीनेसे अधिक समय बीत गया; परंतु श्रीरघुनाथजीके प्रति भक्तिके कारण उन्हें वह समय एक मुहूर्तके समान ही जान पड़ा॥ २७ ॥
श्रीराम भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरों, महापराक्रमी राक्षसों तथा महाबली रीछोंके साथ बड़े आनन्दसे समय बिताते थे॥ २८ ॥
इस तरह उनका शिशिर-ऋतुका दूसरा महीना भी सुखपूर्वक बीत गया। इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंकी उस सुरम्य राजधानीमें वे वानर और राक्षस बड़े हर्ष और प्रेमसे रहते थे। श्रीरामके प्रेमपूर्वक सत्कारसे उनका वह समय सुखपूर्वक बीत रहा था॥ २९-३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९॥