श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पचपनवाँ सर्ग
पचपनवाँ सर्ग
रावणका सीताको अपने अन्तःपुरका दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जानेके लिये समझाना
इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसोंको जनस्थानमें जानेकी आज्ञा दे रावणने विपरीत बुद्धिके कारण अपनेको कृतकृत्य माना॥ १ ॥
वह विदेहकुमारी सीताका स्मरण करके काम-बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखनेके लिये उसने बड़ी उतावलीके साथ अपने रमणीय अन्तःपुरमें प्रवेश किया॥ २ ॥
उस भवनमें प्रवेश करके राक्षसोंके राजा रावणने देखा कि सीता राक्षसियोंके बीचमें बैठकर दुःखमें डूबी हुई हैं। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और वे शोकके दुस्सह भारसे अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायुके वेगसे आक्रान्त हो समुद्रमें डूबती हुई नौकाके समान जान पड़ती हैं। मृगोंके यूथसे बिछुड़कर कुत्तोंसे घिरी हुई अकेली हरिणीके समान दिखायी देती हैं॥ ३-४ १/२ ॥
शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीताके पास पहुँचकर राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृहके समान सुन्दर भवनका दर्शन कराया॥ ५-६ ॥
वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानोंसे भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जातिके पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकारके रत्न उस अन्तःपुरकी शोभा बढ़ाते थे॥ ७ ॥
उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम) से जटिल होनेके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥ ८ ॥
उस महलमें दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष होता रहता था। उस अन्तःपुरको तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे सजाया गया था। रावण सीताको साथ लेकर सोनेकी बनी हुई विचित्र सीढ़ीपर चढ़ा॥ ९ ॥
वहाँ हाथीदाँत और चाँदीकी बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोनेकी जालियोंसे ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं॥ १० ॥
उस महलमें जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्खी-चूनाके पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीवने अपने महलकी वे सारी वस्तुएँ मैथिलीको दिखायीं॥ ११ ॥
रावणने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँतिके फूलोंसे आच्छादित बहुत-सी पोखरियां भी सीताको दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोकमें डूब गयीं॥ १२ ॥
वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीताको अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभानेकी इच्छासे इस प्रकार बोला—॥ १३ ॥
‘सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरोंको छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करनेवाले इन सभी राक्षसोंका मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवामें एक हजार राक्षस रहते हैं॥ १४-१५ ॥
‘विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुमपर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणोंमें समर्पित है)। तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो॥ १६ ॥
‘सीते! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओंसे भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो—प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ॥ १७ ॥
‘मेरे इस हितकर वचनको मान लो—इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचारको मनमें लानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीड़ित हूँ, मुझपर कृपा करो॥ १८ ॥
‘समुद्रसे घिरी हुई इस लङ्काके राज्यका विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते॥ १९ ॥
‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा ऋषियोंमें भी मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रममें मेरी समानता कर सके॥ २० ॥
‘राम तो राज्यसे भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलनेवाले और मनुष्य होनेके कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी?॥ २१ ॥
‘सीते! मुझको ही अपनाओ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु! जवानी सदा रहनेवाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो॥ २२ ॥
‘वरानने! सीते! अब तुम रामके दर्शनका विचार छोड़ दो। इस राममें इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँतक आनेका मनोरथ भी कर सके॥ २३ ॥
‘आकाशमें महान् वेगसे बहनेवाली वायुको रस्सियोंमें नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्निकी निर्मल ज्वालाओंको हाथोंसे नहीं पकड़ा जा सकता॥ २४ ॥
‘शोभने! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो मेरी भुजाओंसे सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँसे ले जा सके॥ २५ ॥
‘लङ्काके इस विशाल राज्यका तुम्हीं पालन करो। मुझ-जैसे राक्षस,देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे॥ २६ ॥
‘स्नानके जलसे आर्द्र (अथवा लङ्काके राज्यपर अपना अभिषेक कराकर उसके जलसे आर्द्र ) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोदमें लगाओ। तुम्हारा पहलेका जो दुष्कर्म था, वह वनवासका कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो॥ २७ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकारके पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदिका सेवन करो॥ २८ १/२ ॥
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला पुष्पकविमान मेरे भाँइ कुबेरका था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मनके समान वेगसे चलनेवाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो॥ २९-३० १/२ ॥
‘वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमलके समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देनेवाला मुख शोकसे पीड़ित होनेके कारण शोभा नहीं पा रहा है’॥ ३१ १/२ ॥
जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परम सुन्दरी सीता देवी चन्द्रमाके समान मनोहर अपने मुखको आँचलसे ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं॥ ३२ १/२ ॥
सीता शोकसे अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्तासे उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान् रामका ध्यान करने लगी थीं। उस अवस्थामें उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला—॥ ३३ १/२ ॥
‘विदेहनन्दिनि! अपने पतिके त्याग और परपुरुषके अङ्गीकारसे जो धर्मलोपकी आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरहकी लाज व्यर्थ है। देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद्वारा* समर्थित है॥ ३४ १/२ ॥
‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणोंपर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ॥ ३५ १/२ ॥
‘मैंने कामाग्निसे संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्रीको सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’॥ ३६ १/२ ॥
मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर कालके वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥
* ऐसा कहकर रावण देवी सीताको धोखा देना चाहता है। वास्तवमें ऐसे पापपूर्ण कृत्योंका समर्थन धर्मशास्त्रोंमें कहीं नहीं है। कुमारी कन्याका बलपूर्वक अपहरण शास्त्रोंमें राक्षसविवाह कहा गया है; किंतु वह भी निन्द्य ही माना गया है, यहाँ तो वह भी नहीं है। विवाहिता सती साध्वीका अपहरण घोर पाप माना गया है। इसी पापसे सोनेकी लङ्का मिट्टीमें मिल गयी और रावण दल-बल-कुल-परिवारसहित नष्ट हो गया।