श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बयालीसवाँ सर्ग
बयालीसवाँ सर्ग
अशोकवनिकामें श्रीराम और सीताका विहार, गर्भिणी सीताका तपोवन देखनेकी इच्छा प्रकट करना और श्रीरामका इसके लिये स्वीकृति देना
सुवर्णभूषित पुष्पक विमानको विदा करके महाबाहु श्रीरामने अशोकवनिका (अन्तःपुरके विहार योग्य उपवन) में प्रवेश किया॥ १ ॥
चन्दन, अगुरु, आम, तुङ्ग (नारियल), कालेयक (रक्तचन्दन) तथा देवदारु-वन सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ २ ॥
चम्पा, अशोक, पुंनाग, महुआ, कटहल, असन तथा धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले पारिजातसे वह वाटिका सुशोभित थी॥ ३ ॥
लोध्र, कदम्ब, अर्जुन, नागकेसर, छितवन, अतिमुक्तक, मन्दार, कदली तथा गुल्मों और लताओंके समूह उसमें सब ओर व्याप्त थे॥ ४ ॥
प्रियङ्गु, धूलिकदम्ब, बकुल, जामुन, अनार और कोविदार आदि वृक्ष उस उपवनको सुशोभित करते थे॥ ५ ॥
सदा फूल और फल देनेवाले रमणीय, मनोरम, दिव्य रस और गन्धसे युक्त तथा नूतन अङ्कुर-पल्लवोंसे अलंकृत वृक्ष भी उस अशोकवनिकाकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ६ ॥
वृक्ष लगानेकी कलामें कुशल मालियोंद्वारा तैयार किये गये दिव्य वृक्ष, जिनमें मनोहर पल्लव तथा पुष्प शोभा पाते थे और जिनके ऊपर मतवाले भ्रमर छा रहे थे, उस उपवनकी श्री-वृद्धि कर रहे थे॥ ७ ॥
कोकिल, भृङ्गराज आदि रंग-बिरंगे सैकड़ों पक्षी उस वाटिकाकी शोभा थे, जो आम्रकी डालियोंके अग्रभागपर बैठकर वहाँ विचित्र सुषमाकी सृष्टि कर रहे थे॥ ८ ॥
कोई वृक्ष सुवर्णके समान पीले, कोई अग्निशिखाके समान उज्ज्वल और कोई नीले अञ्जनके समान श्याम थे, जो स्वयं सुशोभित होकर उस उपवनकी शोभा बढ़ाते थे॥ ९ ॥
वहाँ अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्प और गुच्छ दृष्टिगोचर होते थे। उत्तम जलसे भरी हुई भाँति-भाँतिकी बावड़ियाँ देखी जाती थीं॥ १० ॥
जिनमें माणिक्यकी सीढ़ियाँ बनी थीं। सीढ़ियोंके बाद कुछ दूरतक जलके भीतरकी भूमि स्फटिक मणिसे बँधी हुई थी। उन बावड़ियोंके भीतर खिले हुए कमल और कुमुदोंके समूह शोभा पाते थे, चक्रवाक भी उनकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ ११ ॥
पपीहे और तोते वहाँ मीठी बोली बोल रहे थे। हंसों और सारसोंके कलरव गूँज रहे थे। फूलोंसे चितकबरे दिखायी देनेवाले तटवर्ती वृक्ष उन्हें शोभासम्पन्न बना रहे थे॥ १२ ॥
वे भाँति-भाँतिके परकोटों और शिलाओंसे भी सुशोभित थीं। वहीं वनप्रान्तमें नीलमके समान रंगवाली हरी-हरी घासें उस वाटिकाका शृङ्गार कर रही थीं। वहाँके वृक्षोंका समुदाय फूलोंके भारसे लदा हुआ था॥ १३½ ॥
वहाँ मानो परस्पर होड़ लगाकर खिले हुए पुष्पशाली वृक्षोंके झड़े हुए फूलोंसे काले-काले प्रस्तर उसी तरह चितकबरे दिखायी देते थे, जैसे तारोंके समुदायसे अलंकृत आकाश॥ १४½ ॥
जैसे इन्द्रका नन्दन और ब्रह्माजीका बनाया हुआ कुबेरका चैत्ररथ वन सुशोभित होता है, उसी प्रकार सुन्दर भवनोंसे विभूषित श्रीरामका वह क्रीडा-कानन शोभा पा रहा था॥ १५½ ॥
वहाँ अनेक ऐसे भवन बने थे, जिनके भीतर बैठनेके लिये बहुत-से आसन सजाये गये थे। वह वाटिका अनेक लतामण्डपोंसे सम्पन्न दिखायी देती थी। उस समृद्धिशालिनी अशोकवनिकामें प्रवेश करके रघुकुलनन्दन श्रीराम पुष्पराशिसे विभूषित एक सुन्दर आसनपर बैठे, जिसपर कालीन बिछा था॥ १६-१७½ ॥
जैसे देवराज इन्द्र शचीको सुधापान कराते हैं, उसी प्रकार ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने अपने हाथसे पवित्र पेय मधु लेकर सीताजीको पिलाया॥ १८½ ॥
सेवकगण श्रीरामके भोजनके लिये वहाँ तुरंत ही राजोचित भोग्य पदार्थ (भाँति-भाँतिकी रसोई) तथा नाना प्रकारके फल ले आये॥ १९½ ॥
उस समय राजा रामके समीप नृत्य और गीतकी कलामें निपुण अप्सराएँ और नाग-कन्याएँ किन्नरियोंके साथ मिलकर नृत्य करने लगीं॥ २०½ ॥
नाचने-गानेमें कुशल और चतुर बहुत-सी रूपवती स्त्रियाँ मधुपानजनित मदके वशीभूत हो श्रीरामचन्द्रजीके निकट अपनी नृत्य-कलाका प्रदर्शन करने लगीं॥ २१½ ॥
दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीराम सदा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित हुई उन मनोऽभिराम रमणियोंको उपहार आदि देकर संतुष्ट रखते थे॥ २२½ ॥
उस समय भगवान् श्रीराम सीतादेवीके साथ सिंहासनपर विराजमान हो अपने तेजसे अरुन्धतीके साथ बैठे हुए वसिष्ठजीके समान शोभा पाते थे॥ २३½ ॥
यों श्रीराम प्रतिदिन देवताके समान आनन्दित रहकर देवकन्याके समान सुन्दरी विदेहनन्दिनी सीताके साथ रमण करते थे॥ २४½ ॥
इस प्रकार सीता और रघुनाथजी चिरकालतक विहार करते रहे। इतनेहीमें सदा भोग प्रदान करनेवाला शिशिरऋतुका सुन्दर समय व्यतीत हो गया। भाँतिभाँतिके भोगोंका उपभोग करते हुए उन राजदम्पतिका वह शिशिरकाल बीत गया॥ २५-२६ ॥
धर्मज्ञ श्रीराम दिनके पूर्वभागमें धर्मके अनुसार धार्मिक कृत्य करते थे और शेष आधे दिन अन्तःपुरमें रहते थे॥ २७ ॥
सीताजी भी पूर्वाह्नकालमें देवपूजन आदि करके सब सासुओंकी समानरूपसे सेवा-पूजा करती थीं॥ २८ ॥
तत्पश्चात् विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो श्रीरामचन्द्रजीके पास चली जाती थीं। ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गमें शची सहस्त्राक्ष इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती हैं॥ २९ ॥
इन्हीं दिनों श्रीरामचन्द्रजीने अपनी पत्नीको गर्भके मङ्गलमय चिह्नसे युक्त देखकर अनुपम हर्ष प्राप्त किया और कहा— ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’॥ ३० ॥
फिर वे देवकन्याके समान सुन्दरी सीतासे बोले— ‘विदेहनन्दिनि! तुम्हारे गर्भसे पुत्र प्राप्त होनेका यह समय उपस्थित है। वरारोहे! बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ?’॥ ३१½ ॥
इसपर सीताजीने मुसकराकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘रघुनन्दन! मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनोंको देखनेकी हो रही है। देव! गङ्गातटपर रहकर फल-मूल खानेवाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, उनके समीप (कुछ दिन) रहना चाहती हूँ। काकुत्स्थ! फल-मूलका आहार करनेवाले महात्माओंके तपोवनमें एक रात निवास करूँ, यही मेरी इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा है’॥ ३२—३४½ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने सीताकी इस इच्छाको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा की और कहा— ‘विदेहनन्दिनि! निश्चिन्त रहो। कल ही वहाँ जाओगी, इसमें संशय नहीं है’॥ ३५ ॥
मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम अपने मित्रोंके साथ बीचके खण्डमें चले गये॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२॥