श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अस्सीवाँ सर्ग
अस्सीवाँ सर्ग
रावणकी आज्ञासे इन्द्रजित्का घोर युद्ध तथा उसके वधके विषयमें श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत
मकराक्षको मारा गया सुनकर समरविजयी रावण महान् रोषसे भरकर दाँत पीसने लगा॥ १ ॥
कुपित हुआ वह निशाचर उस समय वहाँ इस चिन्तामें पड़ गया कि अब क्या करना चाहिये। उसने अत्यन्त क्रोधसे भरकर अपने पुत्र इन्द्रजित्को युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी॥ २ ॥
वह बोला—‘वीर! तुम महापराक्रमी राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको छिपकर या प्रत्यक्षरूपसे मार डालो; क्योंकि तुम बलमें सर्वथा बढ़े-चढ़े हो॥ ३ ॥
‘जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, उस इन्द्रको भी तुम युद्धमें परास्त कर देते हो; फिर उन दो मनुष्योंको रणभूमिमें अपने सामने पाकर क्यों नहीं मार सकोगे?’॥ ४ ॥
राक्षसराज रावणके ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने पिताकी आज्ञा शिरोधार्य की और यज्ञभूमिमें जाकर अग्निकी स्थापना करके उसमें विधिपूर्वक हवन किया॥ ५ ॥
उसके अग्निमें हवन करते समय लाल वस्त्र धारण किये बहुत-सी स्त्रियाँ घबरायी हुई उस स्थानपर आयीं, जहाँ वह रावणपुत्र हवन कर रहा था॥ ६ ॥
उसके तलवार आदि शस्त्र ही सरपत—कुशास्तरणका काम दे रहे थे, बहेड़ेकी लकड़ी समिधा थी, लाल वस्त्र और लोहेका स्रुवा—ये सब वस्तुएँ उपयोगमें लायी गयी थीं॥ ७ ॥
उसने तोमरसहित शस्त्ररूपी सरपत अग्निके चारों ओर बिछा दिये। उसके बाद काले रंगके जीवित बकरेका गला पकड़कर उसे अग्निमें होम दिया॥ ८ ॥
एक ही बार किये गये उस होमसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी, उसमें धुआँ नहीं था और बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं। उस अग्निमें वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो विजयकी सूचना देते थे॥ ९ ॥
उस समय तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् अग्निदेवने स्वयं प्रकट होकर हविष्य ग्रहण किया। उनकी ज्वाला दक्षिणावर्त होकर निकल रही थी॥ १० ॥
अग्निमें आहुति दे आभिचारिक यज्ञ-सम्बन्धी देवता, दानव तथा राक्षसोंको तृप्त करनेके पश्चात् इन्द्रजित् अन्तर्धान होनेकी शक्तिसे सम्पन्न सुन्दर रथपर आरूढ़ हुआ॥ ११ ॥
चार घोड़ों, पैने बाणों तथा अपने भीतर रखे हुए विशाल धनुषसे युक्त वह उत्तम रथ बड़ी शोभा पा रहा था॥ १२ ॥
उसके सब सामान सोनेके बने हुए थे, अतः वह रथ अपने स्वरूपसे प्रज्वलित-सा जान पड़ता था। उसमें मृग, अर्धचन्द्र और पूर्णचन्द्र अङ्कित किये गये थे, जिनसे उसकी सजावट आकर्षक दिखायी देती थी॥ १३ ॥
इन्द्रजित्का ध्वज प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् था। उसमें सोनेके बड़े-बड़े कड़े पहनाये गये थे और उसे नीलमसे अलंकृत किया गया था॥ १४ ॥
उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ और ब्रह्मास्त्रसे सुरक्षित हुआ वह महाबली रावणकुमार इन्द्रजित् दूसरोंके लिये दुर्जय हो गया था॥ १५ ॥
समरविजयी इन्द्रजित् नगरसे निकलकर निर्ऋति-देवता-सम्बन्धी मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे अन्तर्धानकी शक्तिसे सम्पन्न हो इस प्रकार बोला—॥ १६ ॥
‘जो व्यर्थ ही वनमें आये हैं (अथवा झूठे ही तपस्वीका बाना धारण किये हुए हैं), उन दोनों भाई राम और लक्ष्मणको आज रणभूमिमें मारकर मैं अपने पिता रावणको उत्कृष्ट जय प्रदान करूँगा॥ १७ ॥
‘आज राम और लक्ष्मणको मारकर पृथ्वीको वानरोंसे सूनी करके मैं पिताको परम संतोष दूँगा।’ ऐसा कहकर वह अदृश्य हो गया॥ १८ ॥
तत्पश्चात् दशमुख रावणसे प्रेरित हो इन्द्रशत्रु इन्द्रजित् कुपित होकर रणभूमिमें आया। उसके हाथमें धनुष और तीखे नाराच थे॥ १९ ॥
युद्धस्थलमें आकर उस निशाचरने वानरोंके बीचमें खड़े हो बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए महापराक्रमी वीर श्रीराम और लक्ष्मणको वहाँ (ऊँचे और मोटे कंधोंसे युक्त होनेके कारण) तीन सिरवाले नागोंके समान देखा॥
‘ये ही वे दोनों हैं’ ऐसा सोचकर इन्द्रजित्ने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और जलकी वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति अपनी बाण-धाराओंसे सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया॥ २१ ॥
उसका रथ आकाशमें खड़ा था और श्रीराम तथा लक्ष्मण युद्धभूमिमें विराजमान थे। उन दोनोंकी दृष्टिसे ओझल होकर वह राक्षस उन्हें पैने बाणोंसे बींधने लगा॥ २२ ॥
उसके बाणोंके वेगसे व्याप्त हुए श्रीराम और लक्ष्मणने भी अपने-अपने धनुषपर बाणोंका संधान करके दिव्य अस्त्र प्रकट किये॥ २३ ॥
उन महाबली बन्धुओंने सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणसमूहोंसे आकाशको आच्छादित करके भी इन्द्रजित्का अपने बाणोंसे स्पर्श नहीं किया॥ २४ ॥
उस तेजस्वी राक्षसने मायासे धूमजनित अन्धकारकी सृष्टि की और आकाशको ढक दिया। साथ ही कुहरेका अन्धकार फैलाकर दिशाओंको भी ढक दिया॥ २५ ॥
उसकी प्रत्यञ्चाकी टंकार नहीं सुनायी देती थी। पहियोंकी घर्घराहट तथा घोड़ोंकी टापकी आवाज भी कानोंमें नहीं पड़ती थी और सब ओर विचरते हुए उस राक्षसका रूप भी दृष्टिगोचर नहीं होता था॥ २६ ॥
महाबाहु इन्द्रजित् उस घने अन्धकारमें जहाँ दृष्टि काम नहीं करती थी, पत्थरोंकी अद्भुत वृष्टिके समान नाराच नामक बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २७ ॥
समराङ्गणमें कुपित हुए उस रावणकुमारने वरदानमें प्राप्त हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण अङ्गोंमें घाव कर दिया॥ २८ ॥
जैसे दो पर्वतोंपर जलकी धाराएँ बरस रही हों, उसी प्रकार उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंपर नाराचोंकी मार पड़ने लगी। उसी अवस्थामें वे दोनों वीर भी सोनेके पंखोंसे सुशोभित तीखे बाण छोड़ने लगे॥ २९ ॥
वे कङ्कपत्रयुक्त बाण आकाशमें पहुँचकर रावणकुमार इन्द्रजित्को क्षत-विक्षत करके रक्तमें डूबे हुए पृथ्वीपर गिर पड़ते थे॥ ३० ॥
बाणसमूहोंसे अत्यन्त देदीप्यमान वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अपने ऊपर गिरते हुए सायकोंको अनेक भल्ल मारकर काट गिराते थे॥ ३१ ॥
जिस ओरसे तीखे बाण आते दिखायी देते, उसी ओर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण अपने उत्तम अस्त्रोंको चलाया करते थे॥ ३२ ॥
अतिरथी वीर रावणपुत्र इन्द्रजित् अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ लगाता और बड़ी फुर्तीसे अस्त्र चलाता था। उसने अपने पैने बाणोंद्वारा उन दोनों दशरथकुमारोंको घायल
कर दिया॥ ३३ ॥
उसके सोनेके पंखवाले सुदृढ़ सायकोंद्वारा अत्यन्त घायल हुए वे दोनों वीर दशरथकुमार रक्तरंजित हो खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान प्रतीत होते थे॥ ३४ ॥
इन्द्रजित्की वेगपूर्ण गति, रूप, धनुष और बाणोंको कोई देख नहीं पाता था। मेघोंकी घटामें छिपे हुए सूर्यकी भाँति उसकी कोई भी बात किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी॥ ३५ ॥
उसके द्वारा घायल और आहत होकर कितने ही वानर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे तथा सैकड़ों योद्धा मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३६ ॥
तब लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने भाईसे कहा— 'आर्य! अब मैं समस्त राक्षसोंके संहारके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करूँगा'॥ ३७ ॥
उनकी यह बात सुनकर श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे कहा— 'भाई! एकके कारण भूमण्डलके समस्त राक्षसोंका वध करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है॥ ३८ ॥
'महाबाहो! जो युद्ध न करता हो, छिपा हो, हाथ जोड़कर शरणमें आया हो, युद्धसे भाग रहा हो अथवा पागल हो गया हो, ऐसे व्यक्तिको तुम्हें नहीं मारना चाहिये। अब मैं उस इन्द्रजित्के ही वधका प्रयत्न करता हूँ। आओ, हमलोग विषैले सर्पोंकी भाँति भयंकर तथा अत्यन्त वेगशाली अस्त्रोंका प्रयोग करें॥ ३९-४० ॥
'यह मायावी राक्षस बड़ा नीच है। इसने अन्तर्धान-शक्तिसे अपने रथको छिपा लिया है। यदि यह दीख जाय तो वानरयूथपति इस राक्षसको अवश्य मार डालेंगे॥
'यदि यह पृथ्वीमें समा जाय, स्वर्गको चला जाय, रसातलमें प्रवेश करे अथवा आकाशमें ही स्थित रहे तथापि इस तरह छिपे होनेपर भी मेरे अस्त्रोंसे दग्ध होकर प्राणशून्य हो भूतलपर अवश्य गिरेगा'॥ ४२ ॥
इस प्रकार महान् अभिप्रायसे युक्त वचन कहकर वानर शिरोमणियोंसे घिरे हुए रघुकुलके प्रमुख वीर महात्मा श्रीरामचन्द्रजी उस क्रूरकर्मा भयानक राक्षसका वध करनेके लिये तत्काल ही इधर-उधर दृष्टिपात करने लगे॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८० ॥