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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ बीसवाँ सर्ग

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एक सौ बीसवाँ सर्ग

श्रीरामके अनुरोधसे इन्द्रका मरे हुए वानरोंको जीवित करना, देवताओंका प्रस्थान और वानरसेनाका विश्राम

महाराज दशरथके लौट जानेपर पाकशासन इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़े खड़े हुए श्रीरघुनाथजीसे कहा— ॥ १ ॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तुम्हें जो हमारा दर्शन हुआ, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये और हम तुमपर बहुत प्रसन्न हैं। इसलिये तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह मुझसे कहो’॥

महात्मा इन्द्रने जब प्रसन्न होकर ऐसी बात कही, तब श्रीरघुनाथजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने हर्षसे भरकर कहा— ॥ ३ ॥

‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक प्रार्थना करूँगा। आप मेरी उस प्रार्थनाको सफल करें॥ ४ ॥

‘मेरे लिये युद्धमें पराक्रम करके जो यमलोकको चले गये हैं, वे सब वानर नया जीवन पाकर उठ खड़े हों॥ ५ ॥

‘मानद! जो वानर मेरे लिये अपने स्त्री-पुत्रोंसे बिछुड़ गये हैं, उन सबको मैं प्रसन्नचित्त देखना चाहता हूँ॥ ६ ॥

‘पुरंदर! वे पराक्रमी और शूरवीर थे तथा मृत्युको कुछ भी नहीं गिनते थे। उन्होंने मेरे लिये बड़ा प्रयत्न किया है और अन्तमें कालके गालमें चले गये हैं। आप उन सबको जीवित कर दें॥ ७ ॥

‘जो वानर सदा मेरा प्रिय करनेमें लगे रहते थे और मौतको कुछ नहीं समझते थे, वे सब आपकी कृपासे फिर मुझसे मिलें—यह वर मैं चाहता हूँ॥ ८ ॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले देवराज! मैं उन वानर, लंगूर और भालुओंको नीरोग, व्रणहीन और बल-पौरुषसे सम्पन्न देखना चाहता हूँ॥ ९ ॥

‘ये वानर जिस स्थानपर रहें, वहाँ असमयमें भी फल-मूल और पुष्पोंकी भरमार रहे तथा निर्मल जलवाली नदियाँ बहती रहें’॥ १० ॥

महात्मा श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर महेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक यों उत्तर दिया—॥ ११ ॥

‘तात! रघुवंशविभूषण! आपने जो वर माँगा है, यह बहुत बड़ा है, तथापि मैंने कभी दो तरहकी बात नहीं की है; इसलिये यह वर अवश्य सफल होगा॥ १२ ॥

‘जो युद्धमें मारे गये हैं और राक्षसोंने जिनके मस्तक तथा भुजाएँ काट डाली हैं, वे सब वानर, भालू और लंगूर जी उठें॥ १३ ॥

‘नींद टूटनेपर सोकर उठे हुए मनुष्योंकी भाँति वे सभी वानर नीरोग, व्रणहीन तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न होकर उठ बैठेंगे॥ १४ ॥

‘सभी परमानन्दसे युक्त हो अपने सुहृदों, बान्धवों, जाति-भाइयों तथा स्वजनोंसे मिलेंगे॥ १५ ॥

‘महाधनुर्धर वीर! ये वानर जहाँ रहेंगे, वहाँ असमयमें भी वृक्ष फल-फूलोंसे लद जायँगे और नदियाँ जलसे भरी रहेंगी’॥ १६ ॥

इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर वे सब श्रेष्ठ वानर जिनके सब अङ्ग पहले घावोंसे भरे थे, उस समय घावरहित हो गये और सभी सोकर जगे हुएकी भाँति सहसा उठकर खड़े हो गये॥ १७ ॥

उन्हें इस प्रकार जीवित होते देख सब वानर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि यह क्या बात हो गयी? श्रीरामचन्द्रजीको सफलमनोरथ हुआ देख समस्त श्रेष्ठ देवता अत्यन्त प्रसन्न हो लक्ष्मणसहित श्रीरामकी स्तुति करके बोले—‘राजन्! अब आप यहाँसे अयोध्याको पधारें और समस्त वानरोंको बिदा कर दें॥ १८-१९ ॥

‘ये मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीता सदा आपमें अनुराग रखती हैं। इन्हें सान्त्वना दीजिये और भाई भरत आपके शोकसे पीड़ित हो व्रत कर रहे हैं, अतः उनसे जाकर मिलिये॥ २० ॥

‘परंतप! आप महात्मा शत्रुघ्नसे और समस्त माताओंसे भी जाकर मिलें, अपना अभिषेक करावें और पुरवासियोंको हर्ष प्रदान करें’॥ २१ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणसे ऐसा कहकर देवराज इन्द्र सब देवताओंके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानोंद्वारा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको चले गये॥ २२ ॥

उन समस्त श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने सबको विश्राम करनेकी आज्ञा दी॥ २३ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सुरक्षित तथा हृष्ट-पुष्ट सैनिकोंसे भरी हुई वह यशस्विनी विशाल सेना चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्रकाशित होनेवाली रात्रिके समान अद्भुत शोभासे उद्भासित होती हुई विराज रही थी॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२० ॥