श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
अगस्त्य मुनिका श्रीरामको विजयके लिये ‘आदित्यहृदय’* के पाठकी सम्मति देना
उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्धसे थककर चिन्ता करते हुए रणभूमिमें खड़े थे। इतनेमें रावण भी युद्धके लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओंके साथ युद्ध देखनेके लिये आये थे, श्रीरामके पास जाकर बोले— ॥ १-२ ॥
‘सबके हृदयमें रमण करनेवाले महाबाहो राम! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स! इसके जपसे तुम युद्धमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय पा जाओगे॥
‘इस गोपनीय स्तोत्रका नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओंका नाश करनेवाला है। इसके जपसे सदा विजयकी प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मङ्गलोंका भी मङ्गल है। इससे सब पापोंका नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोकको मिटाने तथा आयुको बढ़ानेवाला उत्तम साधन है॥ ४-५ ॥
‘भगवान् सूर्य अपनी अनन्त किरणोंसे सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होनेवाले (समुद्यन्), देवता और असुरोंसे नमस्कृत, विवस्वान् नामसे प्रसिद्ध, प्रभाका विस्तार करनेवाले (भास्कर) और संसारके स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका [रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः—इन नाम-मन्त्रोंके द्वारा] पूजन करो॥ ६ ॥
‘सम्पूर्ण देवता इन्हींके स्वरूप हैं। ये तेजकी राशि तथा अपनी किरणोंसे जगत्को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही अपनी रश्मियोंका प्रसार करके देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं॥ ७ ॥
‘ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओंको प्रकट करनेवाले तथा प्रभाके पुञ्ज हैं॥
‘इन्हींके नाम—आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाशमें विचरनेवाले), पूषा (पोषण करनेवाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके बीज), दिवाकर
(रात्रिका अन्धकार दूर करके दिनका प्रकाश फैलानेवाले), हरिदश्व (दिशाओंमें व्यापक अथवा हरे रंगके घोड़ेवाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणोंसे सुशोभित), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), मरीचिमान् (किरणोंसे सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकारका नाश करनेवाले), शम्भु (कल्याणके उद्गमस्थान), त्वष्टा (भक्तोंका दुःख दूर करने अथवा जगत्का संहार करनेवाले), मार्तण्डक (ब्रह्माण्डको जीवन प्रदान करनेवाले), अंशुमान् (किरण धारण करनेवाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभावसे ही सुख देनेवाले), तपन (गर्मी पैदा करनेवाले), अहस्कर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुतिके पात्र), अग्निगर्भ (अग्निको गर्भमें धारण करनेवाले), अदितिपुत्र, शङ्ख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीतका नाश करनेवाले), व्योमनाथ (आकाशके स्वामी), तमोभेदी (अन्धकारको नष्ट करनेवाले), ऋग्, यजुः और सामवेदके पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टिके कारण), अपां मित्र (जलको उत्पन्न करनेवाले), विन्ध्यवीथीप्लवङ्गम (आकाशमें तीव्रवेगसे चलनेवाले), आतपी (घाम उत्पन्न करनेवाले), मण्डली (किरणसमूहको धारण करनेवाले), मृत्यु (मौतके कारण), पिङ्गल (भूरे रंगवाले), सर्वतापन (सबको ताप देनेवाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्तिके कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारोंके स्वामी, विश्वभावन (जगत्की रक्षा करनेवाले), तेजस्वियोंमें भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त) हैं। [इन सभी नामोंसे प्रसिद्ध सूर्यदेव!] आपको नमस्कार है॥ १०—१५ ॥
‘पूर्वगिरि—उदयाचल तथा पश्चिमगिरि—अस्ताचलके रूपमें आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिनके अधिपति आपको प्रणाम है॥
‘आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याणके दाता हैं। आपके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदितिके पुत्र होनेके कारण आदित्यनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है॥ १७ ॥
‘उग्र (अभक्तोंके लिये भयंकर), वीर (शक्ति-सम्पन्न) और सारंग (शीघ्रगामी) सूर्यदेवको नमस्कार है। कमलोंको विकसित करनेवाले प्रचण्ड तेजधारी मार्तण्डको प्रणाम है॥ १८ ॥
‘(परात्पर-रूपमें) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णुके भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाशसे परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देनेवाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है॥ १९ ॥
‘आप अज्ञान और अन्धकारके नाशक, जडता एवं शीतके निवारक तथा शत्रु का नाश करनेवाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नोंका नाश करनेवाले, सम्पूर्ण ज्योतियोंके स्वामी और देवस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है॥ २० ॥
‘आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्णके समान है, आप हरि (अज्ञानका हरण करनेवाले) और विश्वकर्मा (संसारकी सृष्टि करनेवाले) हैं; तमके नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत्के साक्षी हैं; आपको नमस्कार है॥ २१ ॥
‘रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण भूतोंका संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणोंसे गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं॥ २२ ॥
‘ये सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित होकर उनके सो जानेपर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषोंको मिलनेवाले फल हैं॥ २३ ॥
‘(यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले) देवता, यज्ञ और यज्ञोंके फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देनेमें ये ही पूर्ण समर्थ हैं॥
‘राघव! विपत्तिमें, कष्टमें, दुर्गम मार्गमें तथा और किसी भयके अवसरपर जो कोऽइ पुरुष इन सूर्यदेवका कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता॥ २५ ॥
‘इसलिये तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वरकी पूजा करो। इस आदित्यहृदयका तीन बार जप करनेसे तुम युद्धमें विजय पाओगे॥ २६ ॥
महाबाहो! ‘तुम इसी क्षण रावणका वध कर सकोगे।’ यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये॥ २७ ॥
उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीका शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्तसे आदित्यहृदयको धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्यकी ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजीने धनुष उठाकर रावणकी ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पानेके लिये वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावणके वधका निश्चय किया॥ २८—३० ॥
उस समय देवताओंके मध्यमें खड़े हुए भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखा और निशाचरराज रावणके विनाशका समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा—‘रघुनन्दन! अब जल्दी करो’॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ १०५ ॥
* इस ‘आदित्यहृदय’ नामक स्तोत्रका विनियोग एवं न्यासविधि इस प्रकार है—
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यहृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुप्छन्दः, आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्च्छन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः, हृदि। ॐ बीजाय नमः, गुह्ये। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयोः। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः, नाभौ।
करन्यास
इस स्तोत्रके अङ्गन्यास और करन्यास तीन प्रकारसे किये जाते हैं। केवल प्रणवसे, गायत्रीमन्त्रसे अथवा ‘रश्मिमते नमः’ इत्यादि छः नाम-मन्त्रोंसे। यहाँ नाम-मन्त्रोंसे किये जानेवाले न्यासका प्रकार बताया जाता है—
ॐ रश्मिमते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः। ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवस्वते अनामिकाभ्यां नमः। ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि अङ्गन्यास
ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्। ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्। इस प्रकार न्यास करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे भगवान् सूर्यका ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिये—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
तत्पश्चात् ‘आदित्यहृदय’ स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। ९८१