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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एकहत्तरवाँ सर्ग

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एकहत्तरवाँ सर्ग

कबन्धकी आत्मकथा, अपने शरीरका दाह हो जानेपर उसका श्रीरामको सीताके अन्वेषणमें सहायता देनेका आश्वासन

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकालमें मेरा रूप महान् बलपराक्रमसे सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकोंमें विख्यात था॥ १ ॥

‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्रका शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होनेपर भी मैं लोगोंको भयभीत करनेवाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूपको धारण करके इधर-उधर घूमता और वनमें रहनेवाले ऋषियोंको डराया करता था॥ २ १/२ ॥

अपने इस बर्तावसे एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षिको कुपित कर दिया। वे नाना प्रकारके जंगली फल-मूल आदिका संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूपसे डरा दिया। मुझे ऐसे विकट रूपमें देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा— ॥ ३-४ ॥

‘दुरात्मन्! आजसे सदाके लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षिसे प्रार्थना की— ‘भगवन्! इस अभिशाप (तिरस्कार) जनित शापका अन्त होना चाहिये।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा— ॥ ५ १/२ ॥

‘जब श्रीराम (और लक्ष्मण) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वनमें जलायेंगे, तब तुम पुनः अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूपको प्राप्त कर लोगे।’ लक्ष्मण! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो॥ ६-७ ॥

‘मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गणमें इन्द्रके क्रोधसे प्राप्त हुआ है। मैंने पूर्वकालमें राक्षस होनेके पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होनेका वर दिया। इससे मेरी बुद्धिमें यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे?॥ ८-९ ॥

‘ऐसे विचारका आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्धमें देवराजपर आक्रमण किया। उस समय इन्द्रने मुझपर सौ धारोंवाले वज्रका प्रहार किया। उनके छोड़े हुए उस वज्रसे मेरी जाँघें और मस्तक मेरे ही शरीरमें घुस गये॥ १० १/२ ॥

‘मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा— ‘पितामह ब्रह्माजीने जो तुम्हें दीर्घजीवी होनेके लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो’॥ ११ १/२ ॥

‘तब मैंने कहा— देवराज! आपने अपने वज्रकी मारसे मेरी जाँघें, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले। अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा?’॥

‘मेरे ऐसा कहनेपर इन्द्रने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दीं एवं तत्काल ही मेरे पेटमें तीखे दाढ़ोंवाला एक मुख बना दिया॥ १३ १/२ ॥

‘इस प्रकार मैं विशाल भुजाओंद्वारा वनमें रहनेवाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओंको सब ओरसे समेटकर खाया करता था॥ १४ १/२ ॥

‘इन्द्रने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्गमें जाओगे॥ १५ १/२ ॥

‘तात! राजशिरोमणे! इस शरीरसे इस वनके भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है॥ १६ १/२ ॥

‘इन्द्र तथा मुनिके कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़में आ जायँगे। इसी विचारको सामने रखकर मैं इस शरीरको त्याग देनेके लिये प्रयत्नशील था॥ १७ १/२ ॥

‘रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो। मैं आपके सिवा दूसरे किसीसे नहीं मारा जा सकता था। यह बात महर्षिने ठीक ही कही थी॥ १८ १/२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्निके द्वारा मेरा दाह-संस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा। आप दोनोंके लिये एक अच्छे मित्रका पता बताऊँगा’॥ १९ १/२ ॥

उस दानवके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके सामने उससे यह बात कही —॥ २० १/२ ॥

‘कबन्थ! मेरी यशस्विनी भार्या सीताको रावण हर ले गया है। उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मणके साथ सुखपूर्वक जनस्थानके बाहर चला गया था। मैं उस राक्षसका नाममात्र जानता हूँ। उसकी शक्ल-सूरतसे परिचित नहीं हूँ॥ २१-२२ ॥

‘वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बातसे हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस समय सीताका शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है। हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं। तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करनेके लिये इस विषयमें हमारा कुछ उपकार करो॥ २३ १/२ ॥

‘वीर! फिर हमलोग हाथियोंद्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्ढेमें तुम्हारे शरीरको रखकर जला देंगे॥ २४ १/२ ॥

‘अतः अब तुम हमें सीताका पता बताओ। इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक-ठीक जानते हो तो सीताका समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो’॥ २५ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें कुशल उस दानवने उन प्रवचनपटु रघुनाथजीसे यह परम उत्तम बात कही— ॥ २६ १/२ ॥

‘श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारीके विषयमें कुछ भी नहीं जानता। जब मेरे इस शरीरका दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्तिका पता बता सकूँगा, जो सीताके विषयमें आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षसको भी जानता होगा, ऐसे पुरुषका आपको परिचय दूँगा॥ २७-२८ ॥

‘प्रभो! जबतक मेरे इस शरीरका दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जाननेकी शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीताका अपहरण किया है॥ २९ ॥

‘रघुनन्दन! शाप-दोषके कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है। अपनी ही करतूतसे मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है॥ ३० ॥

‘किंतु श्रीराम! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनोंके थक जानेपर अस्त नहीं हो जाते, तभीतक मुझे गड्ढेमें डालकर शास्त्रीय विधिके अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये॥ ३१ ॥

‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढेमें मेरे शरीरका दाह हो जानेपर मैं ऐसे महापुरुषका परिचय दूँगा, जो उस राक्षसको जानते होंगे॥ ३२ ॥

‘शीघ्र पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर रघुनाथजी! न्यायोचित आचारवाले उन महापुरुषके साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये। वे आपकी सहायता करेंगे॥

‘रघुनन्दन! उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकोंमें चक्कर लगा चुके हैं’॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें एकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥