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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अड़तीसवाँ सर्ग

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अड़तीसवाँ सर्ग

राजा दशरथका सीताको वल्कल धारण कराना अनुचित बताकर कैकेयीको फटकारना और श्रीरामका उनसे कौसल्यापर कृपादृष्टि रखनेके लिये अनुरोध करना

सीताजी सनाथ होकर भी जब अनाथकी भाँति चीरवस्त्र धारण करने लगीं, तब सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे— ‘राजा दशरथ! तुम्हें धिक्कार है!’॥ १ ॥

वहाँ होनेवाले उस कोलाहलसे दुःखी हो इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथने अपने जीवन, धर्म और यशकी उत्कट इच्छा त्याग दी। फिर वे गरम साँस खींचकर अपनी भार्या कैकेयीसे इस प्रकार बोले— ‘कैकेयि! सीता कुश-चीर (वल्कल-वस्त्र) पहनकर वनमें जानेके योग्य नहीं है॥ २-३ ॥

‘यह सुकुमारी है, बालिका है और सदा सुखोंमें ही पली है। मेरे गुरुजी ठीक कहते हैं कि यह सीता वनमें जाने योग्य नहीं है॥ ४ ॥

‘राजाओंमें श्रेष्ठ जनककी यह तपस्विनी पुत्री क्या किसीका भी कुछ बिगाड़ती है? जो इस प्रकार जन-समुदायके बीच किसी किंकर्तव्यविमूढ़ भिक्षुकीके समान चीर धारण करके खड़ी है?॥ ५ ॥

‘जनकनन्दिनी अपने चीर-वस्त्र उतार डाले। ‘यह इस रूपमें वन जाय’ ऐसी कोऽइ प्रतिज्ञा मैंने पहले नहीं की है और न किसीको इस तरहका वचन ही दिया है। अतः राजकुमारी सीता सम्पूर्ण वस्त्रालंकारोंसे सम्पन्न हो सब प्रकारके रत्नोंके साथ जिस तरह भी वह सुखी रह सके, उसी तरह वनको जा सकती है॥ ६ ॥

‘मैं जीवित रहनेयोग्य नहीं हूँ। मैंने तेरे वचनोंमें बँधकर एक तो यों ही नियम (शपथ) पूर्वक बड़ी क्रूर प्रतिज्ञा कर डाली है, दूसरे तूने अपनी नादानीके कारण सीताको इस तरह चीर पहनाना प्रारम्भ कर दिया। जिस प्रकार बाँसका फूल उसीको सुखा डालता है, उसी प्रकार मेरी की हुऽइ प्रतिज्ञा मुझीको भस्म किये डालती है॥ ७ ॥

‘नीच पापिनि! यदि श्रीरामने तेरा कोऽइ अपराध किया है तो (उन्हें तो तू वनवास दे ही चुकी) विदेहनन्दिनी सीताने ऐसा दण्ड पानेयोग्य तेरा कौन-सा अपकार कर डाला है?॥ ८ ॥

‘जिसके नेत्र हरिणीके नेत्रोंके समान खिले हुए हैं, जिसका स्वभाव अत्यन्त कोमल एवं मधुर है, वह मनस्विनी जनकनन्दिनी तेरा कौन-सा अपराध कर रही है?॥ ९ ॥

‘पापिनि! तूने श्रीरामको वनवास देकर ही पूरा पाप कमा लिया है। अब सीताको भी वनमें भेजने और वल्कल पहनाने आदिका अत्यन्त दुःखद कार्य करके फिर तू इतने पातक किसलिये बटोर रही है?॥ १० ॥

‘देवि! श्रीराम जब अभिषेकके लिये यहाँ आये थे, उस समय तूने उनसे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर मैंने उतनेके लिये ही प्रतिज्ञा की थी॥ ११ ॥

‘उसका उल्लङ्घन करके जो तू मिथिलेशकुमारी जानकीको भी वल्कल-वस्त्र पहने देखना चाहती है, इससे जान पड़ता है, तुझे नरकमें ही जानेकी इच्छा हो रही है’॥ १२ ॥

राजा दशरथ सिर नीचा किये बैठे हुए जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय वनकी ओर जाते हुए श्रीरामने पितासे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥

‘धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है। देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं। इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा। वरदायक नरेश! ये मेरे न रहनेसे शोकके समुद्रमें डूब जायँगी। अतः आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें॥ १४-१५ ॥

‘आप पूज्यतम पतिसे सम्मानित हो जिस प्रकार यह पुत्रशोकका अनुभव न कर सकें और मेरा चिन्तन करती हुई भी आपके आश्रयमें ही ये मेरी तपस्विनी माता जीवन धारण करें, ऐसा प्रयत्न आपको करना चाहिये॥ १६ ॥

‘इन्द्रके समान तेजस्वी महाराज! ये निरन्तर अपने बिछुड़े हुए बेटेको देखनेके लिये उत्सुक रहेंगी। कहीं ऐसा न हो मेरे वनमें रहते समय ये शोकसे कातर हो अपने प्राणोंको त्याग करके यमलोकको चली जायँ। अतः आप मेरी माताको सदा ऐसी ही परिस्थितिमें रखें, जिससे उक्त आशङ्काके लिये अवकाश न रह जाय’॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥