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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

चौंतीसवाँ सर्ग

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चौंतीसवाँ सर्ग

सीताके अनुरोधसे सरमाका उन्हें मन्त्रियोंसहित रावणका निश्चित विचार बताना

रावणके पूर्वोक्त वचनसे मोहित एवं संतप्त हुई सीताको सरमाने अपनी वाणीद्वारा उसी प्रकार आह्लाद प्रदान किया, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके तापसे दग्ध हुई पृथ्वीको वर्षा-कालकी मेघमाला अपने जलसे आह्लादित कर देती है॥

तदनन्तर समयको पहचानने और मुसकराकर बात करनेवाली सखी सरमा अपनी प्रिय सखी सीताका हित करनेकी इच्छा रखकर यह समयोचित वचन बोली— ॥

‘कजरारे नेत्रोंवाली सखी! मुझमें यह साहस और उत्साह है कि मैं श्रीरामके पास जाकर तुम्हारा संदेश और कुशल-समाचार निवेदन कर दूँ और फिर छिपी हुई वहाँसे लौट आऊँ॥ ३ ॥

‘निराधार आकाशमें तीव्र वेगसे जाती हुई मेरी गतिका अनुसरण करनेमें वायु अथवा गरुड़ भी समर्थ नहीं हैं’॥

ऐसी बात कहती हुई सरमासे सीताने उस स्नेहभरी मधुर वाणीद्वारा जो पहले शोकसे व्याप्त थी, इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

‘सरमे! तुम आकाश और पाताल सभी जगह जानेमें समर्थ हो। मेरे लिये जो कर्तव्य तुम्हें करना है, उसे अब बता रही हूँ, सुनो और समझो॥ ६ ॥

‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है और यदि इस विषयमें तुम्हारी बुद्धि स्थिर है तो मैं यह जानना चाहती हूँ कि रावण यहाँसे जाकर क्या कर रहा है?॥ ७ ॥

‘शत्रुओंको रुलानेवाला रावण मायाबलसे सम्पन्न है। वह दुष्टात्मा मुझे उसी प्रकार मोहित कर रहा है, जैसे वारुणी अधिक मात्रामें पी लेनेपर वह पीनेवालेको मोहित (अचेत) कर देती है॥ ८ ॥

‘वह राक्षस अत्यन्त भयानक राक्षसियोंद्वारा प्रतिदिन मुझे डाँट बताता है, धमकाता है और सदा मेरी रखवाली करता है॥ ९ ॥

‘मैं सदा उससे उद्विग्न और शङ्कित रहती हूँ। मेरा चित्त स्वस्थ नहीं हो पाता। मैं उसीके भयसे व्याकुल होकर अशोकवाटिकामें चली आयी थी॥ १० ॥

‘यदि मन्त्रियोंके साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावणका जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो। यह मुझपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी’॥ ११ ॥

ऐसी बातें कहती हुर्इ सीतासे मधुरभाषिणी सरमाने उनके आँसुओंसे भीगे हुए मुखमण्डलको हाथसे पोंछते हुए इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

‘मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनि! यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रुके अभिप्रायको जानकर अभी लौटती हूँ’॥ १३ ॥

ऐसा कहकर सरमाने उस राक्षसके समीप जाकर मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुर्इ सारी बातें सुनीं॥ १४ ॥

उस दुरात्माके निश्चयको सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोकवाटिकामें लौट आयी॥ १५ ॥

वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षामें बैठी हुर्इ जनककिशोरीको देखा, जो उस लक्ष्मीके समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथका कमल कहीं गिर गया हो॥

फिर लौटकर आयी हुर्इ प्रियभाषिणी सरमाको बड़े स्नेहसे गले लगाकर सीताने स्वयं उसे बैठनेके लिये आसन दिया और कहा—॥ १७ ॥

‘सखी! यहाँ सुखसे बैठकर सारी बातें ठीक-ठीक बताओ। उस क्रूर एवं दुरात्मा रावणने क्या निश्चय किया’॥

काँपती हुर्इ सीताके इस प्रकार पूछनेपर सरमाने मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुर्इ सारी बातें बतायीं—॥

‘विदेहनन्दिनि! राक्षसराज रावणकी माताने तथा रावणके प्रति अत्यन्त स्नेह रखनेवाले एक बूढ़े मन्त्रीने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देनेके लिये रावणको प्रेरित किया॥ २० ॥

‘राक्षसराज! तुम महाराज श्रीरामको सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो। जनस्थानमें जो अद्भुत घटना घटित हुर्इ थी, वही श्रीरामके पराक्रमको समझनेके लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है॥ २१ ॥

‘(उनके सेवकोंमें भी अद्भुत शक्ति है) हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा, सीतासे भेंट की और युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका वध किया—यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है?’॥ २२

॥

‘इस प्रकार बूढ़े मन्त्रियों तथा माताके बहुत समझानेपर भी वह तुम्हें उसी तरह छोड़नेकी इच्छा नहीं करता है, जैसे धनका लोभी धनको त्यागना नहीं चाहता है॥ २३ ॥

‘मिथिलेशकुमारी! वह युद्धमें मरे बिना तुम्हें छोड़नेका साहस नहीं कर सकता। मन्त्रियोंसहित उस नृशंस निशाचरका यही निश्चय है॥ २४ ॥

‘रावणके सिरपर काल नाच रहा है। इसलिये उसके मनमें मृत्युके प्रति लोभ पैदा हो गया है। यही कारण है कि तुम्हें न लौटानेके निश्चयपर उसकी बुद्धि सुस्थिर हो गयी है। वह जबतक युद्धमें राक्षसोंके संहार और अपने वधके द्वारा (नष्ट) नहीं हो जायगा; केवल भय दिखानेसे तुम्हें नहीं छोड़ सकता॥ २५ १/२ ॥

‘कजरारे नेत्रोंवाली सीते! इसका परिणाम यही होगा कि भगवान् श्रीराम अपने सर्वथा तीखे बाणोंसे युद्धस्थलमें रावणका वध करके तुम्हें अयोध्याको ले जायँगे’॥ २६ ॥

इसी समय भेरीनाद और शङ्खध्वनिसे मिला हुआ समस्त सैनिकोंका महान् कोलाहल सुनायी दिया, जो भूकम्प पैदा कर रहा था॥ २७ ॥

वानरसैनिकोंके उस भीषण सिंहनादको सुनकर लङ्कामें रहनेवाले राक्षसराज रावणके सेवक हतोत्साह हो गये। उनकी सारी चेष्टा दीनतासे व्याप्त हो गयी। रावणके दोषसे उन्हें भी कोई कल्याणका उपाय नहीं दिखायी देता था॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४ ॥