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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

चौवालीसवाँ सर्ग

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चौवालीसवाँ सर्ग

ब्रह्माजीका भगीरथकी प्रशंसा करते हुए उन्हें गंगाजलसे पितरोंके तर्पणकी आज्ञा देना और राजाका वह सब करके अपने नगरको जाना, गंगावतरणके उपाख्यानकी महिमा

श्रीराम! इस प्रकार गंगाजीको साथ लिये राजा भगीरथने समुद्रतक जाकर रसातलमें, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, प्रवेश किया। वह भस्मराशि जब गंगाजीके जलसे आप्लावित हो गयी, तब सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माने वहाँ पधारकर राजासे इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! महात्मा राजा सगरके साठ हजार पुत्रोंका तुमने उद्धार कर दिया। अब वे देवताओंकी भाँति स्वर्गलोकमें जा पहुँचे॥ ३ ॥

‘भूपाल! इस संसारमें जबतक सागरका जल मौजूद रहेगा; तबतक सगरके सभी पुत्र देवताओंकी भाँति स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहेंगे॥ ४ ॥

‘ये गंगा तुम्हारी भी ज्येष्ठ पुत्री होकर रहेंगी और तुम्हारे नामपर रखे हुए भागीरथी नामसे इस जगतमें विख्यात होंगी॥ ५ ॥

‘त्रिपथगा, दिव्या और भागीरथी—इन तीनों नामोंसे गंगाकी प्रसिद्धि होगी। ये आकाश, पृथ्वी और पाताल तीनों पथोंको पवित्र करती हुईं गमन करती हैं, इसलिये त्रिपथगा मानी गयी हैं॥ ६ ॥

‘नरेश्वर! महाराज! अब तुम गंगाजीके जलसे यहाँ अपने सभी पितामहोंका तर्पण करो और इस प्रकार अपनी तथा अपने पूर्वजोंद्वारा की हुईं प्रतिज्ञाको पूर्ण कर लो॥ ७ ॥

‘राजन्! तुम्हारे पूर्वज धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी राजा सगर भी गंगाको यहाँ लाना चाहते थे; किंतु उनका यह मनोरथ नहीं पूर्ण हुआ॥ ८ ॥

‘वत्स! इसी प्रकार लोकमें अप्रतिम प्रभावशाली, उत्तम गुणविशिष्ट, महर्षितुल्य तेजस्वी, मेरे समान तपस्वी तथा क्षत्रिय-धर्मपरायण राजर्षि अंशुमान्ने भी गंगाको यहाँ लानेकी इच्छा की; परंतु वे इस पृथ्वीपर उन्हें लानेकी प्रतिज्ञा पूरी न कर सके॥ ९-१० ॥

‘निष्पाप महाभाग! तुम्हारे अत्यन्त तेजस्वी पिता दिलीप भी गंगाको यहाँ लानेकी इच्छा करके भी इस कार्यमें सफल न हो सके॥ ११ ॥

‘पुरुषप्रवर! तुमने गंगाको भूतलपर लानेकी वह प्रतिज्ञा पूर्ण कर ली। इससे संसारमें तुम्हें परम उत्तम एवं महान् यशकी प्राप्ति हुई है॥ १२ ॥

शत्रुदमन! तुमने जो गंगाजीको पृथ्वीपर उतारनेका कार्य पूरा किया है, इससे उस महान् ब्रह्मलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया है, जो धर्मका आश्रय है॥

‘नरश्रेष्ठ! पुरुषप्रवर! गंगाजीका जल सदा ही स्नानके योग्य है। तुम स्वयं भी इसमें स्नान करो और पवित्र होकर पुण्यका फल प्राप्त करो॥ १४ ॥

‘नरेश्वर! तुम अपने सभी पितामहोंका तर्पण करो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने लोकको जाऊँगा। तुम भी अपनी राजधानीको लौट जाओ’॥ १५ ॥

ऐसा कहकर सर्वलोकपितामह महायशस्वी देवेश्वर ब्रह्माजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोकको लौट गये॥ १६ ॥

नरश्रेष्ठ! महायशस्वी राजर्षि राजा भगीरथ भी गंगाजीके उत्तम जलसे क्रमशः सभी सगर-पुत्रोंका विधिवत् तर्पण करके पवित्र हो अपने नगरको चले गये। इस प्रकार सफलमनोरथ होकर वे अपने राज्यका शासन करने लगे॥ १७-१८ ॥

रघुनन्दन! अपने राजाको पुनः सामने पाकर प्रजावर्गको बड़ी प्रसन्नता हुई। सबका शोक जाता रहा। सबके मनोरथ पूर्ण हुए और चिन्ता दूर हो गयी॥ १९ ॥

श्रीराम! यह गंगाजीकी कथा मैंने तुम्हें विस्तारके साथ कह सुनायी। तुम्हारा कल्याण हो। अब जाओ, मंगलमय संध्यावन्दन आदिका सम्पादन करो। देखो, संध्याकाल बीता जा रहा है॥ २० ॥

यह गंगावतरणका मंगलमय उपाख्यान आयु बढ़ानेवाला है। धन, यश, आयु, पुत्र और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा दूसरे वर्णके लोगोंको भी यह कथा सुनाता है, उसके ऊपर देवता और पितर प्रसन्न होते हैं॥ २१-२२ ॥

ककुत्स्थकुलभूषण! जो इसका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और आयुकी वृद्धि एवं कीर्तिका विस्तार होता है॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४॥