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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ सातवाँ सर्ग

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एक सौ सातवाँ सर्ग

श्रीराम और रावणका घोर युद्ध

तदनन्तर श्रीराम और रावणमें अत्यन्त क्रूरतापूर्वक महान् द्वैरथ युद्ध आरम्भ हुआ, जो समस्त लोकोंके लिये भयंकर था॥ १ ॥

उस समय राक्षसों और वानरोंकी विशाल सेनाएँ हाथमें हथियार लिये रहनेपर भी निश्चेष्ट खड़ी रहीं— कोई किसीपर प्रहार नहीं करता था॥ २ ॥

मनुष्य और निशाचर दोनों वीरोंको बलपूर्वक युद्ध करते देख सबके हृदय उन्हींकी ओर खिंच गये; अतः सभी बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ३ ॥

दोनों ओरके सैनिकोंके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे और उनके हाथ युद्धके लिये व्यग्र थे, तथापि उस अद्भुत संग्रामको देखकर उनकी बुद्धि आश्चर्यचकित हो उठी थी; इसलिये वे चुपचाप खड़े थे। एक-दूसरेपर प्रहार नहीं करते थे॥ ४ ॥

राक्षस रावणकी ओर देख रहे थे और वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर। उन सबके नेत्र विस्मित थे; अतः निस्तब्ध खड़ी रहनेके कारण उभय पक्षकी सेनाएँ चित्रलिखित-सी जान पड़ती थीं॥ ५ ॥

श्रीराम और रावण दोनोंने वहाँ प्रकट होनेवाले निमित्तोंको देखकर उनके भावी फलका विचार करके युद्धविषयक विचारको स्थिर कर लिया था। उन दोनोंमेंसे एक-दूसरेके प्रति अमर्षका भाव दृढ़ हो गया था; इसलिये वे निर्भय-से होकर युद्ध करने लगे॥ ६ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास था कि मेरी ही जीत होगी और रावणको भी यह निश्चय हो गया था कि मुझे अवश्य ही मरना होगा; अतः वे दोनों युद्धमें अपना सारा पराक्रम प्रकट करके दिखाने लगे॥ ७ ॥

उस समय पराक्रमी दशाननने क्रोधपूर्वक बाणोंका संधान करके श्रीरघुनाथजीके रथपर फहराती हुई ध्वजाको निशाना बनाया और उन बाणोंको छोड़ दिया॥ ८ ॥

परंतु उसके चलाये हुए वे बाण इन्द्रके रथकी ध्वजातक न पहुँच सके, केवल रथशक्तिको* छूते हुए धरतीपर गिर पड़े॥ ९ ॥

तब महाबली श्रीरामचन्द्रजीने भी कुपित होकर अपने धनुषको खींचा और मन-ही-मन रावणके कृत्यका बदला चुकाने—उसके ध्वजको काट गिरानेका विचार किया॥ १०॥

रावणके ध्वजको लक्ष्य करके उन्होंने विशाल सर्पके समान असह्य और अपने तेजसे प्रज्वलित तीखा बाण छोड़ दिया॥ ११॥

तेजस्वी श्रीरामने उस ध्वजकी ओर निशाना साधकर अपना सायक चलाया और वह दशाननके उस ध्वजको काटकर पृथ्वीमें समा गया॥ १२॥

रावणके रथका वह ध्वज कटकर धरतीपर गिर पड़ा। अपने ध्वजका विध्वंस हुआ देख महाबली रावण क्रोधसे जल उठा और अमर्षके कारण विपक्षीको जलाता हुआ-सा जान पड़ा। वह रोषके वशीभूत होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ १३-१४॥

रावणने अपने तेजस्वी बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको घायल करना आरम्भ किया; परंतु वे घोड़े दिव्य थे, इसलिये न तो लड़खड़ाये और न अपने स्थानसे विचलित ही हुए। वे पूर्ववत् स्वस्थचित्त बने रहे, मानो उनपर कमलकी नालोंसे प्रहार किया गया हो॥ १५ १/२ ॥

उन घोड़ोंका घबराहटमें न पड़ना देख रावणका क्रोध और भी बढ़ गया। वह पुनः बाणोंकी वर्षा करने लगा। गदा, चक्र, परिघ, मूसल, पर्वत-शिखर, वृक्ष, शूल, फरसे तथा मायानिर्मित अन्यान्य शस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा। उसने हृदयमें थकावटका अनुभव न करके सहस्रों बाण छोड़े॥ १६—१८॥

युद्धस्थलमें अनेक शस्त्रोंकी वह विशाल वर्षा बड़ी भयानक, तुमुल, त्रासजनक और भयंकर कोलाहलसे पूर्ण थी॥ १९॥

वह शस्त्रवर्षा श्रीरामचन्द्रजीके रथको छोड़कर सब ओरसे वानर-सेनाके ऊपर पड़ने लगी। दशमुख रावणने प्राणोंका मोह छोड़कर बाणोंका प्रयोग किया और अपने सायकोंसे वहाँके आकाशको ठसाठस भर दिया॥ २० १/२ ॥

तदनन्तर रणभूमिमें रावणको बाण चलानेमें अधिक परिश्रम करते देख श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए-से तीखे बाणोंका संधान किया और उन्हें सैकड़ों तथा हजारोंकी संख्यामें छोड़ा॥ २१-२२॥

उन बाणोंको देखकर रावणने पुनः अपने बाण बरसाये और आकाशको इतना भर दिया कि उसमें तिल रखनेकी भी जगह नहीं रह गयी। उन दोनोंके द्वारा की गयी चमकीले बाणोंकी

वर्षासे वहाँका प्रकाशमान आकाश बाणोंसे बद्ध होकर किसी और ही आकाश-सा प्रतीत होता था॥ २३ १/२ ॥

उनका चलाया हुआ कोर्इ भी बाण लक्ष्यतक पहुँचे बिना नहीं रहता था, लक्ष्यको बेधे या विदीर्ण किये बिना नहीं रुकता था तथा निष्फल भी नहीं होता था। इस तरह युद्धमें शस्त्रवर्षा करते हुए श्रीराम और रावणके बाण जब आपसमें टकराते थे, तब नष्ट होकर पृथ्वीपर गिर जाते थे॥ २४-२५ ॥

वे दोनों योद्धा दायें-बायें प्रहार करते हुए निरन्तर युद्धमें लगे रहे। उन्होंने अपने भयंकर बाणोंसे आकाशको इस तरह भर दिया कि मानो उसमें साँस लेनेकी भी जगह नहीं रह गयी॥ २६ ॥

श्रीरामने रावणके घोड़ोंको और रावणने श्रीरामके घोड़ोंको घायल कर दिया। वे दोनों एक-दूसरेके प्रहारका बदला चुकाते हुए परस्पर आघात करते रहे॥ २७ ॥

इस प्रकार वे दोनों अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए उत्तम रीतिसे युद्ध करने लगे। दो घड़ीतक तो उन दोनोंमें ऐसा भयंकर संग्राम हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ २८ ॥

इस प्रकार युद्धमें लगे हुए श्रीराम तथा रावणको सम्पूर्ण प्राणी चकितचित्तसे निहारने लगे॥ २९ ॥

उन दोनोंके वे श्रेष्ठ रथ (तथा उसमें बैठे हुए रथी) समरभूमिमें अत्यन्त क्रोधपूर्वक एक-दूसरेको पीड़ा देने और परस्पर धावा करने लगे॥ ३० ॥

एक-दूसरेके वधके प्रयत्नमें लगे हुए वे दोनों वीर बड़े भयानक जान पड़ते थे। उन दोनोंके सारथि कभी रथको चक्कर काटते हुए ले जाते, कभी सीधे मार्गसे दौड़ाते और कभी आगेकी ओर बढ़ाकर पीछेकी ओर लौटाते थे। इस तरह वे दोनों अपने रथको हाँकनेमें विविध प्रकारके ज्ञानका परिचय देने लगे॥ ३१ १/२ ॥

श्रीराम रावणको पीड़ित करने लगे और रावण श्रीरामको पीड़ा देने लगा। इस प्रकार युद्धविषयक प्रवृत्ति और निवृत्तिमें वे दोनों तदनुरूप गतिवेगका आश्रय लेते थे॥ ३२ १/२ ॥

बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन दोनों वीरोंके वे श्रेष्ठ रथ जलकी धारा गिराते हुए दो जलधरोंके समान युद्धभूमिमें विचर रहे थे॥ ३३ १/२ ॥

वे दोनों रथ युद्धस्थलमें भाँति-भाँतिकी गतिका प्रदर्शन करनेके बाद फिर आमने-सामने आकर खड़े हो गये॥ ३४ १/२ ॥

उस समय वहाँ खड़े हुए उन दोनों रथोंके युगन्धर (हरसोंकी संधि) युगन्धरसे, घोड़ोंके मुख विपक्षी घोड़ोंके मुखसे तथा पताकाएँ पताकाओंसे मिल गयीं॥

तत्पश्चात् श्रीरामने अपने धनुषसे छूटे हुए चार पैने बाणोंद्वारा रावणके चारों तेजस्वी घोड़ोंको पीछे हटनेके लिये विवश कर दिया॥ ३६ १/२ ॥

घोड़ोंके पीछे हटनेपर दशमुख रावण क्रोधके वशीभूत हो गया और श्रीरामपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ३७ १/२ ॥

बलवान् दशाननके द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर भी श्रीरघुनाथजीके चेहरेपर शिकनतक न आयी और न उनके मनमें व्यथा ही हुई॥ ३८ १/२ ॥

तत्पश्चात् रावणने इन्द्रके सारथि मातलिको लक्ष्य करके वज्रके समान शब्द करनेवाले बाण छोड़े॥ ३९ १/२ ॥

वे महान् वेगशाली बाण युद्धस्थलमें मातलिके शरीरपर पड़कर उन्हें थोड़ा-सा भी मोह या व्यथा न दे सके॥ ४० १/२ ॥

रावणद्वारा मातलिके प्रति आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको जैसा क्रोध हुआ, वैसा अपनेपर किये गये आक्रमणसे नहीं हुआ था। अतः उन्होंने बाणोंका जाल-सा बिछाकर अपने शत्रुको युद्धसे विमुख कर दिया॥ ४१ १/२ ॥

वीर रघुनाथजीने शत्रुके रथपर बीस, तीस, साठ, सौ और हजार-हजार बाणोंकी वृष्टि की॥ ४२ १/२ ॥

तब रथपर बैठा हुआ राक्षसराज रावण भी कुपित हो उठा और गदा तथा मूसलोंकी वर्षासे रणभूमिमें श्रीरामको पीड़ा देने लगा॥ ४३ १/२ ॥

इस प्रकार उन दोनोंमें पुनः बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। गदाओं, मूसलों और परिघोंकी आवाजसे तथा बाणोंके पंखोंकी सनसनाती हुई हवासे सातों समुद्र विक्षुब्ध हो उठे॥ ४४-४५ ॥

उन विक्षुब्ध समुद्रोंके पातालतलमें निवास करनेवाले समस्त दानव और सहस्रों नाग व्यथित हो गये॥ ४६ ॥

पर्वतों, वनों और काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी, सूर्यकी प्रभा लुप्त हो गयी और वायुकी गति भी रुक गयी॥ ४७ ॥

देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, किन्नर और बड़े-बड़े नाग सभी चिन्तामें पड़ गये॥ ४८ ॥

सबके मुँहसे यही बात निकलने लगी— ‘गौ और ब्राह्मणोंका कल्याण हो, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले इन लोकोंकी रक्षा हो और श्रीरघुनाथजी युद्धमें राक्षसराज रावणपर विजय पावें,’॥ ४९ ॥

इस प्रकार कहते हुए ऋषियोंसहित वे देवगण श्रीराम और रावणके अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी युद्धको देखने लगे॥ ५० ॥

गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय उस अनुपम युद्धको देखकर कहने लगे— ‘आकाश आकाशके ही तुल्य है, समुद्र समुद्रके ही समान है तथा राम और रावणका युद्ध राम और रावणके युद्धके ही सदृश है’* ऐसा कहते हुए वे सब लोग राम-रावणका युद्ध देखने लगे॥

तदनन्तर रघुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरामचन्द्रजीने कुपित होकर अपने धनुषपर एक विषधर सर्पके समान बाणका संधान किया और उसके द्वारा जगमगाते हुए कुण्डलोंसे युक्त रावणका एक सुन्दर मस्तक काट डाला। उसका वह कटा हुआ सिर उस समय पृथ्वीपर गिर पड़ा, जिसे तीनों लोकोंके प्राणियोंने देखा॥

उसकी जगह रावणके वैसा ही दूसरा नया सिर उत्पन्न हो गया। शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शीघ्रकारी श्रीरामने युद्धस्थलमें अपने सायकोंद्वारा रावणका वह दूसरा सिर भी शीघ्र ही काट डाला॥ ५५ १/२ ॥

उसके कटते ही पुनः नया सिर उत्पन्न दिखायी देने लगा, किंतु उसे भी श्रीरामके वज्रतुल्य सायकोंने काट डाला॥ ५६ १/२ ॥

इस प्रकार एक-से तेजवाले उसके सौ सिर काट डाले गये, तथापि उसके जीवनका नाश होनेके लिये उसके मस्तकोंका अन्त होता नहीं दिखायी देता था॥

तदनन्तर कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता वीर श्रीरामचन्द्रजी अनेक प्रकारके बाणोंसे युक्त होनेपर भी इस प्रकार चिन्ता करने लगे— ॥

‘अहो! मैंने जिन बाणोंसे मारीच, खर और दूषणको मारा, क्रौञ्चवनके गड्ढेमें विराधका वध किया, दण्डकारण्यमें कबन्धको मौतके घाट उतारा, सालवृक्ष और पर्वतोंको विदीर्ण किया, वालीके प्राण लिये और समुद्रको भी क्षुब्ध कर दिया, अनेक बारके संग्राममें परीक्षा करके जिनकी अमोघताका विश्वास कर लिया गया है, वे ही ये मेरे सब सायक आज रावणके ऊपर निस्तेज—कुण्ठित हो गये हैं; इसका क्या कारण हो सकता है?’॥

इस तरह चिन्तामें पड़े होनेपर भी श्रीरघुनाथजी युद्धस्थलमें सतत सावधान रहे। उन्होंने रावणकी छातीपर बाणोंकी झड़ी लगा दी॥ ६२ ॥

तब रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणने भी कुपित होकर रणभूमिमें श्रीरामको गदा और मूसलोंकी वर्षासे पीड़ित करना आरम्भ किया॥ ६३ ॥

उस महायुद्धने बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। वह युद्ध कभी आकाशमें, कभी भूतलपर और कभी-कभी पर्वतके शिखरपर होता था॥ ६४ ॥

देवता, दानव, यक्ष, पिशाच, नाग और राक्षसोंके देखते-देखते वह महान् संग्राम सारी रात चलता रहा॥

श्रीराम और रावणका वह युद्ध न रातमें बंद होता था और न दिनमें। दो घड़ी अथवा एक क्षणके लिये भी उसका विराम नहीं हुआ॥ ६६ ॥

एक ओर दशरथकुमार श्रीराम थे और दूसरी ओर राक्षसराज रावण। उन दोनोंमेंसे श्रीरघुनाथजीकी युद्धमें विजय होती न देख देवराजके सारथि महात्मा मातलिने युद्धपरायण श्रीरामसे शीघ्रतापूर्वक कहा— ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७ ॥


* रथकी कलशीपरका वह बाँस जिसमें लड़ाईके रथोंकी ध्वजाएँ लगायी जाती थीं। कुछ विद्वानोंने रथशक्तिका अर्थ—रथकी अद्भुत सामर्थ्य किया है। वैसा अर्थ माननेपर यह भाव निकलता है कि रथके अद्भुत प्रभावका अनुभव करके वे बाण ध्वजतक न पहुँचकर पृथ्वीपर ही गिर पड़े।
* ‘गगनं गगनाकारं’से ‘रामरावणयोरिव’ तकके श्लोकमें अनन्वयालङ्कार है। जहाँ एक ही वस्तु उपमान और उपमेयरूपसे कही जाय, दूसरी कोई उपमा न मिल सके, वहाँ अनन्वयालङ्कार होता है।