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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उनतीसवाँ सर्ग

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उनतीसवाँ सर्ग

रावणका शुक और सारणको फटकारकर अपने दरबारसे निकाल देना, उसके भेजे हुए गुप्तचरोंका श्रीरामकी दयासे वानरोंके चंगुलसे छूटकर लङ्कामें आना

शुकके बताये अनुसार रावणने समस्त यूथपतियोंको देखकर श्रीरामकी दाहिनी बाँह महापराक्रमी लक्ष्मणको, श्रीरामके निकट बैठे हुए अपने भांइ विभीषणको, समस्त वानरोंके राजा भयंकर पराक्रमी सुग्रीवको, इन्द्रपुत्र वालीके बेटे बलवान् अङ्गदको, बल-विक्रमशाली हनुमान्को, दुर्जय वीर जाम्बवान्को तथा सुषेण, कुमुद, नील, वानरश्रेष्ठ नल, गज, गवाक्ष, शरभ, मैन्द एवं द्विविदको भी देखा॥ १—४ ॥

उन सबको देखकर रावणका हृदय कुछ उद्विग्न हो उठा। उसे क्रोध आ गया और उसने बात समाप्त होनेपर वीर शुक और सारणको फटकारा॥ ५ ॥

‘बेचारे शुक और सारण विनीत भावसे नीचे मुँह किये खड़े रहे और रावणने रोषगद्गद वाणीमें क्रोधपूर्वक यह कठोर बात कही— ॥ ६ ॥

‘राजा निग्रह और अनुग्रह करनेमें भी समर्थ होता है। उसके सहारे जीविका चलानेवाले मन्त्रियोंको ऐसी कोंइ बात नहीं कहनी चाहिये, जो उसे अप्रिय लगे॥ ७ ॥

‘जो शत्रु अपने विरोधी हैं और युद्धके लिये सामने आये हैं; उनकी बिना किसी प्रसङ्गके ही स्तुति करना क्या तुम दोनोंके लिये उचित था?॥ ८ ॥

‘तुमलोगोंने आचार्य, गुरु और वृद्धोंकी व्यर्थ ही सेवा की है; क्योंकि राजनीतिका जो संग्रहणीय सार है, उसे तुम नहीं ग्रहण कर सके॥ ९ ॥

‘यदि तुमने उसे ग्रहण भी किया हो तो भी इस समय तुम्हें उसका ज्ञान नहीं रह गया है—तुमने उसे भुला दिया है। तुमलोग केवल अज्ञानका बोझ ढो रहे हो। ऐसे मूर्ख मन्त्रियोंके सम्पर्कमें रहते हुए भी जो मैं अपने राज्यको सुरक्षित रख सका हूँ, यह सौभाग्यकी ही बात है॥ १० ॥

‘मैं इस राज्यका शासक हूँ। मेरी जिह्वा ही तुम्हें शुभ या अशुभकी प्राप्ति करा सकती है—मैं वाणीमात्रसे तुमपर निग्रह और अनुग्रह कर सकता हूँ; फिर भी तुम दोनोंने मेरे सामने कठोर बात कहनेका साहस किया। क्या तुम्हें मृत्युका भय नहीं है?॥ ११ ॥

‘वनमें दावानलका स्पर्श करके भी वहाँके वृक्ष खड़े रह जायें, यह सम्भव है; परंतु राजदण्डके अधिकारी अपराधी नहीं टिक सकते। वे सर्वथा नष्ट हो जाते हैं॥ १२॥

‘यदि इनके पहलेके उपकारोंको याद करके मेरा क्रोध नरम न पड़ जाता तो शत्रुपक्षकी प्रशंसा करनेवाले इन दोनों पापियोंको मैं अभी मार डालता॥ १३॥

‘अब तुम दोनों मेरी सभामें प्रवेशके अधिकारसे वञ्चित हो। मेरे पाससे चले जाओ; फिर कभी मुझे अपना मुँह न दिखाना। मैं तुम दोनोंका वध करना नहीं चाहता; क्योंकि तुम दोनोंके किये हुए उपकारोंको सदा स्मरण रखता हूँ। तुम दोनों मेरे स्नेहसे विमुख और कृतघ्न हो, अतः मरे हुएके ही समान हो’॥ १४॥

उसके ऐसा कहनेपर शुक और सारण बहुत लज्जित हुए और जय-जयकारके द्वारा रावणका अभिनन्दन करके वहाँसे निकल गये॥ १५॥

इसके पश्चात् दशमुख रावणने अपने पास बैठे हुए महोदरसे कहा— ‘मेरे सामने शीघ्र ही गुप्तचरोंको उपस्थित होनेकी आज्ञा दो।’ यह आदेश पाकर निशाचर महोदरने शीघ्र ही गुप्तचरोंको हाजिर होनेकी आज्ञा दी॥ १६॥

राजाकी आज्ञा पाकर गुप्तचर उसी समय विजयसूचक आशीर्वाद दे हाथ जोड़े सेवामें उपस्थित हुए॥ १७॥

वे सभी गुप्तचर विश्वासपात्र, शूरवीर, धीर एवं निर्भय थे। राक्षसराज रावणने उनसे यह बात कही— ‘तुमलोग अभी वानरसेनामें रामका क्या निश्चय है, यह जाननेके लिये तथा गुप्तमन्त्रणामें भाग लेनेवाले जो उनके अन्तरङ्ग मन्त्री हैं और जो लोग प्रेमपूर्वक उनसे मिले हैं— उनके मित्र हो गये हैं; उन सबके भी निश्चित विचार क्या हैं, इसकी जाँच करनेके लिये यहाँसे जाओ॥ १९॥

‘वे कैसे सोते हैं? किस तरह जागते हैं और आज क्या करेंगे?— इन सब बातोंका पूर्णरूपसे अच्छी तरह पता लगाकर लौट आओ॥ २०॥

‘गुप्तचरके द्वारा यदि शत्रुंकी गतिविधिका पता चल जाय तो बुद्धिमान् राजा थोड़े-से ही प्रयत्नके द्वारा युद्धमें उसे धर दबाते और मार भगाते हैं’॥ २१॥

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्षमें भरे हुए गुप्तचरोंने शार्दूलको आगे करके राक्षसराज रावणकी परिक्रमा की॥ २२॥

इस प्रकार वे गुप्तचर राक्षसशिरोमणि महाकाय रावणकी परिक्रमा करके उस स्थानपर गये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विराजमान थे॥ २३ ॥

सुवेल पर्वतके निकट जाकर उन गुप्तचरोंने छिपे रहकर श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषणको देखा॥

वानरोंकी उस सेनाको देखकर वे भयसे व्याकुल हो उठे। इतनेहीमें धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उन सब राक्षसोंको देख लिया॥ २५ ॥

तब उन्होंने अकस्मात् वहाँ आये हुए राक्षसोंको फटकारा और अकेले शार्दूलको यह सोचकर पकड़वा लिया कि यह राक्षस बड़ा पापी है॥ २६ ॥

फिर तो वानर उसे पीटने लगे। तब भगवान् श्रीरामने दयावश उसे तथा अन्य राक्षसोंको भी छुड़ा दिया॥ २७ ॥

बल-विक्रमसम्पन्न शीघ्र पराक्रमी वानरोंसे पीड़ित हो उन राक्षसोंके होश उड़ गये और वे हाँफते-हाँफते फिर लङ्कामें जा पहुँचे॥ २८ ॥

तदनन्तर रावणकी सेवामें उपस्थित हो चरके वेशमें सदा बाहर विचरनेवाले उन महाबली निशाचरोंने यह सूचना दी कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतके निकट डेरा डाले पड़ी है॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २९ ॥