श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अठहत्तरवाँ सर्ग
अठहत्तरवाँ सर्ग
राजा श्वेतका अगस्त्यजीको अपने लिये घृणित आहारकी प्राप्तिका कारण बताते हुए ब्रह्माजीके साथ हुए अपनी वार्ताको उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषणका दान दे भूख-प्यासके कष्टसे मुक्त होना
(अगस्त्यजी कहते हैं—) रघुकुलनन्दन राम! मेरी कही हुई शुभ अक्षरोंसे युक्त बात सुनकर उन स्वर्गीय पुरुषने हाथ जोड़कर इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥
‘ब्रह्मन्! आप जो कुछ पूछ रहे हैं, वह मेरे सुख-दुःखका अलङ्घनीय कारण, जो पूर्वकालमें घटित हो चुका है, यहाँ बताया जाता है, सुनिये॥ २ ॥
‘पूर्वकालमें मेरे महायशस्वी पिता विदर्भ देशके राजा थे। उनका नाम सुदेव था। वे तीनों लोकोंमें विख्यात पराक्रमी थे॥ ३ ॥
‘ब्रह्मन्! उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके गर्भसे उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए। उनमें ज्येष्ठ मैं था। मेरी श्वेतके नामसे प्रसिद्धि हुई और मेरे छोटे भाईका नाम सुरथ था॥ ४ ॥
‘पिताके स्वर्गलोकमें चले जानेपर पुरवासियोंने राजाके पदपर मेरा अभिषेक कर दिया। वहाँ परम सावधान रहकर मैंने धर्मके अनुकूल राज्यका पालन किया॥ ५ ॥
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षे! इस तरह धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा तथा राज्यका शासन करते हुए मेरे एक सहस्र वर्ष बीत गये॥ ६ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! एक समय मुझे किसी निमित्तसे अपनी आयुका पता लग गया और मैंने मृत्यु-तिथिको हृदयमें रखकर वहाँसे वनको प्रस्थान किया॥ ७ ॥
‘उस समय मैं इसी दुर्गम वनमें आया, जिसमें न पशु हैं न पक्षी। वनमें प्रवेश करके मैं इसी सरोवरके सुन्दर तटके निकट तपस्या करनेके लिये बैठा॥ ८ ॥
‘राज्यपर अपने भाई राजा सुरथका अभिषेक करके इस सरोवरके समीप आकर मैंने दीर्घकालतक तपस्या की॥ ९ ॥
‘इस विशाल वनमें तीन हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके मैं परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ॥ १० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! परम उदार महर्षे! ब्रह्मलोकमें पहुँच जानेपर भी मुझे भूख और प्यास बड़ा कष्ट देते हैं। उससे मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठती हैं॥ ११ ॥
‘एक दिन मैंने त्रिलोकीके श्रेष्ठ देवता भगवान् ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन्! यह ब्रह्मलोक तो भूख-प्यासके कष्टसे रहित है, किंतु यहाँ भी क्षुधा-पिपासाका क्लेश मेरा पीछा नहीं छोड़ता है। यह मेरे किस कर्मका परिणाम है? देव! पितामह! मेरा आहार क्या है? यह मुझे बताइये’॥ १२-१३ ॥
यह सुनकर ब्रह्माजी मुझसे बोले—‘सुदेवनन्दन! तुम मर्त्यलोकमें स्थित अपने ही शरीरका सुस्वादु मांस प्रतिदिन खाया करो; यही तुम्हारा आहार है॥ १४ ॥
‘श्वेत! तुमने उत्तम तप करते हुए केवल अपने शरीरका ही पोषण किया है। महामते! दानरूपी बीज बोये बिना कहीं कुछ भी नहीं जमता—कोऽइ भी भोज्य-पदार्थ उपलब्ध नहीं होता है॥ १५ ॥
‘तुमने देवताओं, पितरों एवं अतिथियोंके लिये कभी कुछ थोड़ा-सा भी दान किया हो, ऐसा नहीं दिखायी देता। तुम केवल तपस्या करते थे। वत्स! इसीलिये ब्रह्मलोकमें आकर भी भूख-प्याससे पीड़ित हो रहे हो॥
‘नाना प्रकारके आहारोंसे भलीभाँति पोषित हुआ तुम्हारा परम उत्तम शरीर अमृतरससे युक्त होगा और उसीका भक्षण करनेसे तुम्हारी क्षुधा-पिपासाका निवारण हो जायगा॥ १७ ॥
‘श्वेत! जब उस वनमें दुर्धर्ष महर्षि अगस्त्य पधारेंगे, तब तुम इस कष्टसे छुटकारा पा जाओगे॥ १८ ॥
‘सौम्य! महाबाहो! वे देवताओंका भी उद्धार करनेमें समर्थ हैं, फिर भूख-प्यासके वशमें पड़े हुए तुम-जैसे पुरुषको संकटसे छुड़ाना उनके लिये कौन बड़ी बात है?’॥ १९ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माका यह निश्चय सुनकर मैं अपने शरीरका ही घृणित आहार ग्रहण करने लगा॥ २० ॥
‘ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! बहुत वर्षोंसे मेरे द्वारा उपभोगमें लाये जानेपर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता है और मुझे पूर्णतः तृप्ति प्राप्त होती है॥ २१ ॥
‘मुने! इस प्रकार मैं संकटमें पड़ा हूँ। आप मेरे दृष्टिपथमें आ गये हैं, इसलिये इस कष्टसे मेरा उद्धार कीजिये। आप ब्रह्मर्षि कुम्भजके सिवा दूसरोंकी इस निर्जन वनमें पहुँच नहीं हो
सकती (इसलिये आप अवश्य कुम्भयोनि अगस्त्य ही हैं)॥ २२ ॥
‘सौम्य! विप्रवर! आपका कल्याण हो। आप मेरा उद्धार करनेके लिये मेरे इस आभूषणका दान ग्रहण करें और आपका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो॥ २३ ॥
‘ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! यह दिव्य आभूषण सुवर्ण, धन, वस्त्र, भक्ष्य, भोज्य तथा अन्य नाना प्रकारके आभरण भी देता है॥ २४ ॥
‘मुनिश्रेष्ठ! इस आभूषणके द्वारा मैं समस्त कामनाओं (मनोवाञ्छित पदार्थों) और भोगोंको भी दे रहा हूँ। भगवन्! आप मेरे उद्धारके लिये मुझपर कृपा करें'॥ २५ ॥
स्वर्गीय राजा श्वेतकी यह दुःखभरी बात सुनकर मैंने उनका उद्धार करनेके लिये वह उत्तम आभूषण ले लिया॥ २६ ॥
ज्यों ही मैंने उस शुभ आभूषणका दान ग्रहण किया, त्यों ही राजर्षि श्वेतका वह पूर्व-शरीर (शव) अदृश्य हो गया॥ २७ ॥
उस शरीरके अदृश्य हो जानेपर राजर्षि श्वेत परमानन्दसे तृप्त हो प्रसन्नतापूर्वक सुखमय ब्रह्मलोकको चले गये॥ २८ ॥
काकुत्स्थ! उन इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा श्वेतने उस भूख-प्यासके निवारणरूप पूर्वोक्त निमित्तसे यह अद्भुत दिखायी देनेवाला दिव्य आभूषण मुझे दिया था॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८॥